शिफ्ट में काम करने वाले पुरुष न रहें इस खतरे से अनजान
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शिफ्ट में काम करने वाले लोगों खासकर पुरुषों को सामान्य की तुलना में सेहत से जुड़े एक बड़े खतरे का रिस्क ज्यादा होता है।
हाल में हुए शोध की मानें तो शिफ्ट में काम करने वाले पुरुषों को टाइप 2 डायबिटीज का रिस्क अधिक होता है। साथ ही जो लोग एक निर्धारित पाली की जगह बदलती हुई शिफ्ट में काम करते हैं उन्हें यह खतरा और भी ज्यादा होता है।
न्यूयॉर्क के लेनोक्स अस्पताल के क्लीनिकल मनोविज्ञानी डॉ. एलेन मेनेविट्ज कहते हैं कि यह शोध ज्यादा चौंकाने वाला नहीं है। डॉक्टर काफी समय से महसूस कर रहे थे कि अलग-अलग पालियों में काम करने से शरीर के रसायन प्रभावित होते हैं और इससे आंतों और दिल की बीमारियां हो सकती हैं।
यहां तक कि इससे कैंसर की आशंका भी रहती है। अब टाइप-2 मधुमेह को भी इस सूची में जोड़ा जा सकता है।
पुरुषों को ही अधिक खतरा क्यों?
विज्ञानियों ने निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए 12 अंतरराष्ट्रीय शोधों का सहारा लिया जिनमें लगभग सवा दो लाख लोग शामिल थे।
मुख्य शोधकर्ता चीन के वुहान में हुआजोंग यूनिवर्सिटी के जुआन ली हैं, उनका कहना है कि इसमें कर्मचारियों के कई पहलुओं को शामिल किया गया है। जैसे पाली कब से कब तक है, बाडी मास इंडेक्स (वजन और लंबाई की गणना), परिवार में किसी को मधुमेह था या नहीं और शारीरिक सक्रियता।
हालांकि नतीजे सीधे-सीधे कुछ नहीं कहते पर पाया गया कि शिफ्ट में काम करने वाले को मधुमेह होने की संभावना नौ फीसदी अधिक है। अगर कर्मी पुरुष है तो यह आंकड़ा 37 फीसदी हो सकता है।
हालांकि पुरुष मधुमेह की चपेट में क्यों ज्यादा आते हैं इसका कोई साफ कारण नहीं है लेकिन हारमोन टेस्टोस्टेरोन इसमें अहम भूमिका निभाता है।
साथ ही रोटेटिंग शिफ्ट में काम करने वाले लोगों को टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा 42 फीसदी ज्यादा होता है। टीम के अनुसार काम का समय बार-बार बदलने से शरीर के लिए सोने और जागने का समय तय करना मुश्किल हो जाता है।
साथ ही कम सोने से शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाती है जिससे डायबिटीज होती है। पहले के अध्ययन में मोटापे को मधुमेह का कारण बताया गया था। टीम का कहना है कि शिफ्ट में काम करने से कोलेस्ट्रोल और रक्तचाप बढ़ते हैं। विज्ञानियों के अनुसार समय-समय पर मधुमेह का टेस्ट कराते रहना ही इस समस्या का निदान है।
क्या है टाइप टू डायबिटीज
ज्यादातर अधेड़ों या बुजुर्गों को होती है। 95 फीसदी मधुमेह रोगी टाइप-2 से भी पीड़ित होते हैं। इसमें शरीर में ज्यादा ग्लूकोज या शुगर बनने लगता है। टाइप टू में शरीर इंसुलिन का इस्तेमाल नहीं कर पाता।
नतीजा मोटापा बढ़ने से होता है। ग्लूकोज सेल तोड़ने के लिए शरीर को ज्यादा इंसुलिन की आवश्यकता होती है। धीरे-धीरे पैंक्रियाज इंसुलिन तैयार करने की क्षमता खो देते हैं। नतीजा कई अन्य रोगों की शुरुआत।
अलग-अलग पालियों में काम करने का असर
•सोने और जागने का समय तय करना हो जाता है मुश्किल
•शरीर के रसायन होतेहैं प्रभावित
•आंतों और दिल की बीमारियां होने का खतरा
•कैंसर के अलावा टाइप-2 डायबिटीज की चपेट में भी आ सकते हैं