खून की कमी कहीं सेहत को न दे यह रोग
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दरअसल, पूरे शरीर में ऑक्सीजन का परिवहन करने के लिए हीमोग्लोबिन नाम के प्रोटीन की जरूरत होती है और यदि यह न बने या सामान्य से कम हो, तो बच्चे की थैलेसीमिया रोग से ग्रसित होन की आशंका अधिक रहती है, जिसका खून की जांच के बाद ही पता चल सकता है।
शिशु में इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। बीमार बच्चे के शरीर में खून की कमी के कारण उसे बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। खून की कमी से शरीर में लौह अधिक मात्रा में बनने लगता है, जो हार्ट, यकृत और फेफड़ों में पहुंचकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है और अंतत: प्राणघातक होता है। म्यूटेशन के प्रभाव से थैलेसीमिया को दो तरह से परिभाषित किया जा सकता है- मेजर और माइनर।
थैलेसीमिया मेजर में रोगी को बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है, जबकि माइनर एक तरह से थैलेसीमिया जीन के वाहक का काम करता है। इसलिए शादी के दौरान खून की जांच के जरिए पता चल सकता है कि पार्टनर में थैलेसीमिया जीन का वाहक है या नहीं।
पहचान और उपचार
चेहरे का सूखा पड़ना, नियमित तौर पर बीमारी, चिड़चिड़ापन, भूख न लगना, वजन नहीं बढ़ना, सामान्य विकास में देरी थैलेसीमिया के लक्षण हैं।
सूक्ष्मदर्शी यंत्र पर रक्त जांच के समय लाल रक्त कणों की संख्या में कमी और उनके बदलाव की जांच से इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है। कंप्लीट ब्लड काउंट से एनीमिया का पता चलता है। हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस से असामान्य हीमोग्लोबिन का पता चलता है। म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट के जरिए अल्फा थैलेसीमिया की जांच के बारे में जाना जा सकता है।
थैलेसीमिया का प्रभाव म्यूटेशन के प्रकार पर निर्भर करता है। इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना जरूरी है। शादी से पहले महिला-पुरुष दोनों को और प्रेग्नेंसी के दौरान भी खून जांच करवानी चाहिए।
थैलेसीमिया पीडि़त के इलाज में बाहरी खून चढ़ाने और दवाइयों की आवश्यकता पड़ती है। कई लोग ऐसा नहीं करवा पाते हैं, जिससे 12 से 15 साल में बच्चों की मृत्यु हो जाती है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट के साथ ही स्टेम सेल के जरिए भी इसके इलाज में मदद मिलती है।
क्या कहते हैं आंकड़े
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में हर साल लगभग आठ से 10 हजार थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों का जन्म होता है। केवल दिल्ली और एनसीआर में यह संख्या करीब 1500 है। देखा जाए तो भारत की कुल जनसंख्या का लगभग साढ़े तीन फीसदी भाग थैलेसीमिया ग्रस्त है।
इंग्लैंड में केवल साढ़े तीन सौ बच्चे, पाकिस्तान में एक लाख और भारत में करीब 10 लाख बच्चे इस रोग के शिकार हैं। यदि माता-पिता दोनों को माइनर थैलेसीमिया है, तो भी बच्चे को इस बीमारी के होने की 25 फीसद आशंका रहती है।
गर्भधारण से पहले खून की जांच जैसे कि सीबीसी और एचबीए 2 के जरिए पता चल सकता है कि महिला या पुरुष थैलेसीमिया जीन वाहक हैं या नहीं। गर्भधारण के 10वें हफ्ते से 12वें हफ्ते के बीच सीवीएस (क्रॉनिक विलस सैंपलिंग) जांच के जरिए पता चल सकता है कि भ्रूण थैलेसीमिया से पीडि़त है या नहीं।