अपने भारत में आम हो या खास, अचार सबकी पहली पसंद है। अंग्रेजी शब्द ‘पिकल’ मध्य इंग्लैंड में सर्वप्रथम वर्ष 1400 में अस्तित्व में आया। बाद में हरी सब्जियों से लेकर फल तक, सभी के अचार बनाए जाने लगे। जमाना बदल रहा है और इसी के साथ खानपान की आदतों में भी परिवर्तन आया है। लेकिन कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनकी लज्जत किसी भी दौर में कम नहीं होती। इनका जायका हमेशा एक-सा ही बना रहता है। नाम लो और मुंह में पानी।
वक्त के साथ बदला अचार का स्वाद, जानें कितना पुराना है इसका खट्टा- मीठा मसालेदार इतिहास
प्राचीन ऐतिहासिक लेखों से पता चलता है कि 2030 ईसा पूर्व मेसोपोटामिया के लोग खीरे के अचार का उपयोग करते थे। कहा जाता है कि उस समय उत्तर भारत से कुछ लोग टिगरिस घाटी में खीरे के बीज लेकर गए थे। इसके अलावा क्लियोपेट्रा जहां खीरे के अचार की दीवानी थी, वहीं सुप्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू ने अपनी कृतियों में कहीं-कहीं खीरे के प्रभावकारी असर की तारीफ भी की है।
रोमवासियों ने जिस-जिस देश में विजय हासिल की, वहां से वे कई तरह के खाद्य-पदार्थ भी साथ लेते चले आए। सिरका, तेल और शहद तो वे विशेष तौर पर पसंद करते थे। एशिया में अचार को काफी पसंद किया जाता है। कोरिया में अचार का इतिहास करीब 3000 पूर्व माना गया है। कोरियाई चीन से अचार के कई तरीके लेकर आए और उन्हें उन्होंने अपने तरीके से बनाना आरंभ किया।
16वीं शताब्दी में यूरोप में खाद्य-पदार्थ को प्रसंस्कृत करने की एक नई मुहिम चल पड़ी थी। कई नए भोज्य-पदार्थ चलन में आ चुके थे। जल्द ही केचअप, विभिन्न प्रकार की चटनियां और मुरब्बे भी प्रचलन में आने लगे। जूलियस सीजर, सम्राट जॉन, महारानी एलिजाबेथ, सैमुअल पेपिस, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज वाशिंगटन, थॉमस जेफर्सन आदि तो विशेष रूप से अचार के दीवाने रहे हैं।
भारत में आम हो या खास, अचार सबकी पहली पसंद है। अंग्रेजी शब्द पिकल मध्य इंग्लैंड में सर्वप्रथम वर्ष 1400 में अस्तित्व में आया। शब्दकोश में जिसका अर्थ दिया गया है, स्पाइसी सॉस या ग्रेवी, जिसे मीट के साथ परोसा जाता था। दरअसल, अचार डालने की प्रक्रिया में भोज्य पदार्थ में पहले से ही उपस्थित सूक्ष्म कीटाणु विकसित नहीं होते।
अचार में शामिल किया गया खट्टापन विषाणुओं को नष्ट करता है। यदि अचार बनाते समय सब चीजें समुचित उपयोग में न लाई जाएं, तो इसमें अम्लीय स्तर बढ़ सकता है, जो हानि पहुंचा सकता है। अचार डालने के दो तरीके हैं। एक में अचार को कई सप्ताह तक कमरे के तापमान में रखा जाता है। इस दौरान खाद्य-पदार्थ के रंग और स्वाद में अभूतपूर्व परिवर्तन आ जाता है।
नमक, हल्दी, तेल और अम्लीय पदार्थ से नुकसानदेह बैक्टीरिया जन्म नहीं ले पाते और अचार महीनों तक तरोताजा रहता है। इमली के रस और सिरके से कुछ अचार जल्दी तैयार होते हैं और इन्हें जल्दी ही खाकर खत्म भी किया जाना चाहिए।
विकासशील देशों के बारे में तो कहा जाता है कि यहां की अर्थव्यवस्था और मौसम के अनुकूल है अचार। विशेषकर सर्दियों में तो अचार में शामिल मसाला और तेल गर्मी पैदा करते हैं। कहा तो यह भी जाता है कि अचार के सेवन से पाचन क्रिया भी बेहतर होती है। हर प्रांत के अचार में कुछ अलग, कुछ नया और खास होता है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक अचार के कई प्रकार हैं। हरी सब्जियों से लेकर फल तक, सभी के अचार बनाए जाते हैं।