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ठंड भगाए दूर, सेहत लाए भरपूर

Mon, 04 Feb 2019 07:34 PM IST
मोना नारंग पुष्पेश पंत, भारतीय खानपान के जानकार
पुष्पेश पंत, भारतीय खानपान के जानकार Published by: मोना नारंग Updated Mon, 04 Feb 2019 07:34 PM IST
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everything about jaggery and gur ki gajak
Jaggery

जाड़े के मौसम में कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ हैं, जो ठंड भगाने में हाथ बंटाने वाले समझे जाते हैं। लोहड़ी का त्योहार छोटे से अलाव के इर्द-गिर्द नाचते-गाते, हंसते-खेलते भाड़ में भुंजे मकई के दाने, गजक और गुड़पट्टी मिल बांटकर खाते-खिलाते मनाया जाता है। गरम तासीर वाले शाकाहारी या मांसाहारी व्यंजनों के अतिरिक्त ‘गुड़ की पट्टी’ का जाड़े की सौगात वाली सूची में महत्वपूर्ण स्थान है।

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यह वह मौसम है, जब ताजा गुड़ बाजार में आता है और जिस तरह मौसमी फलों का स्वागत हम बड़े उत्साह से करते हैं, वैसे ही गुड़ का लोभ भी हम संवरण नहीं कर पाते। सादा, मसालेवाला, खजूर का अथवा बंगाल का नलिन गुड़ अपने चाहने वालों में समान रूप से लोकप्रिय है। विडंबना यह है कि अकेले गुड़ को रोज-रोज या ज्यादा मात्रा में नहीं खाया जा सकता। इसलिए इसे पिघलाकर और इसमें मूंगफली मिलाकर पट्टी तैयार की जाती है।

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देहाती पट्टी मोटी और जरा मुलायम होती है

देहाती पट्टी मोटी और जरा मुलायम होती है। इसमें मूंगफली की मात्रा कम रहती है। पतली पट्टी अपेक्षाकृत सख्त होती है और मुंह में कुछ अधिक मूंगफली के दाने पहुंचाती है। पट्टी का ही परिष्कृत रूप चिक्की है। इसे थाली में जमाने सेे पहले घी की अच्छी खासी परत उसकी सतह पर बिछाई जाती है। यह चिकनाई मुंह में घुलने के बाद सोहन हलवे का मजा देने लगती है।

मुंबई में जो चिक्की चलती है, उसमें मूंगफली काफी मात्रा में होती है। गुड़ का पाग सिर्फ इन दानों को बांधने का काम करता है। जरूरी नहीं कि गुड़पट्टी मूंगफली पर ही टिकी हो। आजकल रामदाने या सफेद तिल वाली पट्टियां भी देखने-खाने को मिलने लगी हैं। यूं रेवड़ी तथा गजक बनाने के लिए भी गुड़ का इस्तेमाल होता है, पर वहां जुगलबंदी साधी जाती है तिल के साथ। गजक बनाने की पद्धति भी कुशल कारीगरी की मांग करती है।

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गुड़ तथा कुटे तिल को खींच-खींचकर पीटा जाता है
गुड़ तथा कुटे तिल को खींच-खींचकर पीटा जाता है, तब खस्ता गजक तैयार होती है। अंग्रेजी में इस प्रक्रिया को ‘पुल्ड शुगर’ कहा जाता है। सिंधी समुदाय में दामाद की खातिरदारी के लिए जो ‘माजून’ चीनी को पिघलाकर पतली पट्टी को मेवों तथा सूखे फलों से अलंकृत बनाया जाता रहा है, वह गुड़पट्टी से ही प्रेरित है। गुड़पट्टी तथा गुड़ की चिक्की जाने कब से गरीब परिवार में मिठाई की भूमिका निभाते रहे हैं।

देहाती मेलों में खोमचे पर पट्टी के ढेर, बच्चों के मुंह में पानी भर देते थे। आज इस पट्टी को नए कलेवर मे पेश किया जाने लगा है। पतली पट्टियों की परत बिछा उन्हें चौकोर टॉफी की शक्ल में पारदर्शी कागज में लपेटकर बाजार में उतारा जा चुका है। गांवों से चलकर यह महानगरों तक पहुंच चुकी है। सेहत की चिंता करने वालों को जो ‘एनर्जी बार’ आकर्षित करते हैं, देसी गुड़पट्टी गुणवत्ता में उनसे कम कतई नहीं समझी जा सकती।

तत्काल ऊर्जा प्राप्त करने के लिए गुड़पट्टी या गुड़ की चिक्की का इस्तेमाल किया जा सकता है। पोषण विज्ञान के जानकारों की राय में रिफाइन्ड सफेद मिल वाली चीनी की तुलना में गुड़ कम नुकसानदेह है। शायद इसलिए भी गुड़पट्टी के दिन बहुरने लगे हैं। लोनावाला, माथेरान, महाबलेश्वर, नैनीताल, मसूरी और मनाली जैसे पहाड़ी पर्यटक स्थलों में पट्टी या चिक्की की बिक्री बढ़ी है। दक्षिण भारत में चौकोर चपटी पट्टी के साथ-साथ लड्डू के आकार में भी ‘कड़लइ उरुनदइ’ नाम से इसे पहचाना जाता है। बिहार और बंगाल की गुड़लइया भी पट्टी का ही दूसरा रूप है।
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