जलवायु परिवर्तन और इसके कारण होने वाली समस्याओं को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिक लगातार चिंता जताते रहे हैं। इसका इंसानी सेहत पर भी कई तरह से नकारात्मक असर देखा जा रहा है। जिस तरह से हाल के वर्षों में भीषण गर्मी का प्रभाव देखा गया है, इससे होने वाली समस्याओं को लेकर विशेषज्ञ सभी लोगों को अलर्ट कर रहे हैं।
हेल्थ अलर्ट: सेहत पर भी पड़ रहा जलवायु परिवर्तन का असर, दिल्ली-मुंबई जैसे शहर के लोगों में बढ़ रही ये दिक्कत
जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में गर्म और उमस भरी रातें बढ़ रही हैं, जिससे लोगों की नींद प्रभावित हो रही है। क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट में दक्षिण भारत और बड़े शहर सबसे ज्यादा प्रभावित मिले। चेन्नई में सालाना नींद की कमी करीब 93 घंटे तक पहुंच गई है, जिसका स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।
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मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि अच्छी सेहत के लिए जितना जरूरी पौष्टिक खाना और नियमित व्यायाम है, उतना ही जरूरी है रात में अच्छी नींद लेना। ऐसे में अगर हर साल आपकी नींद कम हो रही है तो क्या होगा?
- स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, शुरुआत में इससे आपको सिर्फ थकान महसूस हो सकती है।
- इसके अलावा दिन में नींद आने, काम में मन न लगने या सुबह उठने में परेशानी हो सकती है।
- लेकिन लगातार नींद पूरी न होने का असर इससे कहीं बड़ा हो सकता है।
- ये ब्लड प्रेशर, दिल की सेहत, मेटाबॉलिज्म से लेकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के खतरे को बढ़ाने वाली हो सकती है।
रिपोर्ट में चेन्नई, मुंबई, कोलकाता और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी गर्म रातों के कारण नींद में हो रही कमी को लेकर अलर्ट किया गया है। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में स्थिति और भी गंभीर बताई गई है।
अध्ययन में क्या पता चला?
क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट के अनुसार, गर्म और उमस भरी रातों के कारण देश के कई हिस्सों में लोग हर साल दर्जनों घंटे की नींद कम ले पा रहे हैं। मसलन जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह लोगों की नींद, स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को भी प्रभावित कर रहा है।
- अध्ययनों से पता चलता है कि स्वस्थ शरीर के लिए हर व्यक्ति को सालभर में 2920-3000 घंटे की नींद चाहिए होती है।
- रिपोर्ट के मुताबिक पुडुचेरी के लोग सालभर में औसतन 92 घंटे की नींद कम ले पा रहे हैं।
- आंध्र प्रदेश के लोगों में औसतन 88.6 घंटे और केरल में 88.3 घंटे की नींद कम हो गई है।
बड़े शहरों में भी गर्म रातों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। चेन्नई इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां एक व्यक्ति सालाना औसतन 93 घंटे तक कम सो पा रहा है। मुंबई में यह आंकड़ा 84 घंटे, कोलकाता में 80 घंटे और दिल्ली में 66 घंटे है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के फैलाव ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।
50 साल में दोगुनी बढ़ गई है समस्या
रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया के 1,338 शहरों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के अनुसार, 1970 के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली नींद की कमी लगभग दोगुनी हो चुकी है। साल 2020 से 2025 के बीच दुनिया भर में प्रत्येक व्यक्ति ने औसतन 56 घंटे की नींद के साथ समझौता किया, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक कमी का संबंध सीधे जलवायु परिवर्तन से पाया गया।
- जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवाश्म ईंधनों के बढ़ते उपयोग और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने तापमान में लगातार वृद्धि की है। यदि उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर होगी।
वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब रात का तापमान अधिक रहता है तो शरीर दिनभर की गर्मी से उबर नहीं पाता और गहरी नींद लेने में कठिनाई होती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, स्ट्रोक, डायबिटीज, मोटापा, मानसिक तनाव-अवसाद जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
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स्रोत:
Climate Change is Costing People Sleep
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