अब कैंसर की रोकथाम के लिए डेनवैक्स थेरेपी

नई दिल्ली/प्रियंका पांडेय पाडलीकर Updated Mon, 05 Nov 2012 10:26 AM IST
cancer treatment through denvax therapy
कैंसर एक लाइलाज बीमारी है लेकिन अगर सही समय पर इसकी पहचान हो जाए और उपचार की प्रक्रिया शुरू हो जाए तो कुछ विशेष प्रकार के कैंसर को एक हद तक रोकने में आसानी जरूर हो सकती है। कैंसर को सही समय पर पहचानकर उसकी रोकथाम में मददगार हो सकती है डेनवैक्स थेरेपी। यह थेरेपी रोगी की प्रतिरोधक क्षमता को काफी हद तक बढ़ा सकती है और कैंसर से लड़ने में मदद कर सकती है।

डेन्ड्रिटिक सेल्स की मदद से कैंसर के रोगी की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ानी वाली इस थेरेपी का इस्तेमाल अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो काफी समय से शुरू हो चुका है लेकिन भारत में इस विधि को आए कुछ ही साल हुए हैं। इस विधि के उपयोग से कैंसर के कई रोगियों को राहत पहुंचा चुके डॉ. जमाल ए. खान से बातचीत के आधार पर हम आपको कैंसर से लड़ने वाली इस इम्यूनोथेरेपी की जानकारी दे रहे हैं।

क्या है डेनवैक्स थेरेपी
डेनवैक्स थेरेपी एक प्रकार की इम्यूनोथेरेपी है जिसमें शरीर के रक्त में प्रवाहित होने वाली व्हाइट ब्लड सेल को कैंसर प्रतिरोधी सेल- डेन्ड्रिटिक सेल में बदला जाता है जो कैंसर से लड़ने में शरीर की सहायता करती हैं। यह थेरेपी विदेश में तो काफी समय से प्रचलन में है लेकिन हमारे देश में पिछले कुछ सालों से इसका इस्तेमाल शुरू हुआ है। इस थेरेपी का प्रयोग कैंसर के उपचार के दौरान होने वाली दूसरी थेरेपी- कीमोथेरेपी आदि के साथ करने में किसी प्रकार का नुकसान नहीं होगा इसलिए इसे प्रारंभिक चरण से शुरू किया जा सकता है।

कुछ विशेष कैंसर में उपयोगी
डेनवैक्स थेरेपी लीवर, ब्रेन (ग्लूकोमा), पैनक्रियाज, ब्रेस्ट और ओवरियन कैंसर के उपचार में उपयोगी है। चूंकि इस विधि में व्हाइट डब्ल्यू सेल्स का कल्चर किया जाता है इसलिए यह केवल सॉलिड कैंसर पर ही प्रभावी है। रक्त कैंसर की चिकित्सा में इसका उपयोग नहीं कर सकते हैं।

जटिलता के आधार पर चिकित्सा
इस विधि से कैंसर की रोकथाम करने में तकरीबन तीन से चार महीने का समय लगता है जो कैंसर की जटिलता और रोगी की प्रतिरोधी क्षमता के स्तर के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। आमतौर पर कैंसर के तीसरे चरण तक इस विधि से शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को 50 से 75 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है जबकि कैंसर के चौथे चरण में यह संभावना थोड़ी कम होती है।

कुछ साइड इफेक्ट भी हैं
इस थेरेपी के उपयोग के दौरान वैसे तो कोई बड़ा साइड इफेक्ट नहीं होता है पर हो सकता है रोगी को बुखार या कमजोरी जैसी कुछ समस्याएं हों। चूंकि इसमें रोगी की ही कोशिकाओं को परिष्कृत कर उसके शरीर में डाला जाता है इसलिए शरीर इसको आसानी से अपना लेता है और साइड इफेक्ट्स की गुंजाइश कम रहती है।

डेनवैक्स की प्रमाणिकता
डॉ. खान के मुताबिक, हमारे देश में फिलहाल सेल्यूलर थेरेपी के लिए कोई वैधानिक इकाई नहीं है लेकिन यह सरकार के प्रमाणिकता परीक्षण के विभिन्न मानदंडों पर पूरी तरह खरी है। हम पिछले आठ साल से इसकी मदद से कैंसर के रोगियों के उपचार में जुटे हैं और तकरीबन 1,500 से अधिक मामलों में हमने सफलता भी पाई है।

दरअसल, यह अमेरिका व आस्ट्रेलिया जैसे देशों में काफी उपयोग में आ चुकी है और हमने उसी विधि को डेन्ड्रिटिक सेल्स के कारण डैनवेक्स नाम दिया है। 'अमेरिकन एसोसिएशन फॉर कैंसर रिसर्च' जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने डेन्ड्रिटिक प्रणाली की उपयोगिता स्वीकर की है।           

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