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Gandhi Jayanti 2020: गांधीजी से जुड़ी कुछ रोचक कहानियां, जो शायद ही जानते होंगे आप

Fri, 02 Oct 2020 01:05 PM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: सोनू शर्मा Updated Fri, 02 Oct 2020 01:05 PM IST
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Gandhi Jayanti 2020 interesting story of Mahatma Gandhi Facts
महात्मा गांधी की मूर्ति (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

महात्मा गांधी की छवि आम तौर पर एक धीर-गंभीर विचारक, आध्यात्मिक महापुरुष और एक कड़क अनुशासन प्रिय राजनेता की रही है, लेकिन उनकी विनोदप्रियता और हाजिरजवाबी का भी कोई जवाब नहीं था। अपने हास्य और व्यंग्य से वे बड़े-बड़े लोगों को लाजवाब कर देते थे। वह खुलकर हंसते थे और हंसते वक्त ही पता चलता था कि उनके कई दांत उम्र के साथ गायब हो चुके हैं। महात्मा गांधी चुटीले सवालों का जवाब उसी चुलबुले अंदाज में देने माहिर थे। एक बार उन्होंने खुद कहा था 'अगर मुझमें हास्य-विनोद (सेंस ऑफ ह्यूमर) ना होता तो मैं अब तक आत्महत्या कर चुका होता।' 



नेहरू भी थे कायल

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- 'जिसने महात्माजी की हास्य मुद्रा नहीं देखी, वह बेहद कीमती चीज देखने से वंचित रह गया है।' सरोजनी नायडू तो महात्मा गांधी को प्यार से 'मिकी माउस' बुलाती थीं। गांधीजी भी अपने पत्रों में उनके लिए 'डियर बुलबुल', 'डियर मीराबाई' तो यहां तक कि कभी-कभी मजाक में 'अम्माजान' और 'मदर' भी लिखते थे। आजाद भारत के दूसरे और आखिरी गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी गांधी के बारे में कहते थे- 'ही इज ए मैन ऑफ लाफ्टर।'

अपनी किताब 'महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग' लिखते वक्त गांधी पर मेरे अध्ययन ने मुझे कई अर्थों में बदल डाला और गांधी दर्शन का कायल बना दिया। चीजों को बारीकी से समझने और दुनिया को उसे समझाने की गांधी की कला का मैं मुरीद हो गया। गांधी बड़े अध्येता थे, विचारक थे। उनकी याददाश्त गजब की थी। 

Gandhi Jayanti 2020 interesting story of Mahatma Gandhi Facts
महात्मा गांधी की मूर्ति (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : फाइल फोटो

हास्य-व्यंग्य को बनाया हथियार

वे बड़े से बड़े किताबी विचार को जमीन पर उतारने की क्षमता रखते थे। यही वजह थी कि सविनय अवज्ञा आंदोलन या सत्याग्रह को वे दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में प्रभावी ढंग से शुरू कर पाए और चला पाए। वो प्रतीकों को अपना हथियार बनाते थे और हास्य-व्यंग्य को माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करते थे। उनके ये प्रयोग काफी हद तक सटीक रहे। गांधी यह बात खुद कहते थे कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विरोध और असहमति भी मैं अधिकतर विनोद के जरिए ही प्रकट करता हूं। इस पर एक ब्रिटिश पत्रकार ने तंज कसते हुए कहा था कि 'इसका मतलब है कि आपके मनोविनोद या दिल्लगी को आपकी झुंझलाहट या खीज समझी जाए'। 

गांधी ने कहा, 'जिन विषम और विकट परिस्थितियों में मैं काम करता हूं, अगर मुझ में इतना अधिक 'सेन्स ऑफ ह्यूमर' ना होता, तो मैं अब तक पागल हो गया होता।' 'चरखा' और 'अर्धनग्नता' ब्रिटिश साम्राज्य के लिए हमेशा से एक अबूझ पहेली थी। असली भारत की खोज के लिए उन्होंने ट्रेन के सफर में तीसरे दर्जे में बैठकर देशभर की यात्रा की थी। इसी दौरान उनके मन में चरखा सिद्धांत आया और इस चरखे ने ब्रिटेन के लैंकशायर के सूती वस्त्र उद्योग को सीधी चुनौती दे दी। 

वे खुद घुटने के ऊपर की छोटी धोती पहनकर, जिसे यूरोप के मीडिया ने अंग्रेजी में लोइनक्लॉथ (लंगोट) नाम दिया, ब्रिटेन के बादशाह जार्ज पंचम के बर्मिघम पैलेस पहुंच गए। दरअसल ये लंगोट, एक प्रतीकात्मक विरोध था कि दुनिया देखे ब्रिटिश राज में भारत की आम जनता का क्या हाल है? 

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महात्मा गांधी की मूर्ति (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Facebook/Madhu Priya

चर्चिल ने उड़ाया मजाक

इसी से तिलमिला कर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल को गांधी को 'अधनंगा फकीर' कहकर मजाक उड़ाना शुरू किया था। उन्हें लगता था कि लंदन में पढ़ाई कर चुका एक मामूली वकील कैसे इतने भव्य ब्रिटिश राज को इतनी बड़ी चुनौती दे सकता है। महात्मा गांधी की विनोदप्रियता और हाजिरजवाबी के सबसे ज्यादा किस्से उस वक्त दुनिया के सामने आए जब दूसरे गोलमेज सम्मेलन में वे लंदन गए। इस दौरान उनका कई बार दुनिया की मीडिया से सामना हुआ और उन्होंने अपनी हाजिरजवाबी से पत्रकारों का दिल जीत लिया। 

सितंबर 1931 में राजपूताना जहाज में सफर करते हुए महात्मा लंदन जा रहे थे। तमाम अखबारों के पत्रकार गांधी जी से बार-बार सवाल पूछते कि क्या वे इंग्लैंड के बादशाह से मिलने बकिंगम पैलेस जाएंगे. गांधीजी हंसकर कहते- 'मैं ब्रिटिश सरकार का बंदी हूं, बल्कि कहूं खुशी से बंदी हूं। अगर बादशाह ने मिलने के लिए आमंत्रित किया तो जरूर जाऊंगा।'

एक बार जहाज के डेक पर जब फोटोग्राफर ने उन्हें तस्वीर खींचने के लिए ऊपर की ओर देखने का आग्रह करते तो गांधी हंसकर बोले- 'मैं अखबारों में अपनी तस्वीरें कभी नहीं देखता। मैं अपने केबिन में जा रहा हूं।' उन्होंने इवनिंग स्टैंटर्ड के रिपोर्टर से कहा- 'लंदन में मैं अपनी लंगोट (छोटी धोती) में रहूंगा। ज्यादा ठंड होने पर शॉल या कंबल ओढ़ लूंगा। मैं वैसा मनहूस बूढ़ा आदमी नहीं हूं जैसा मुझे चित्रित किया जाता है। सच तो यह है कि मैं बहुत खुशमिजाज आदमी हूं। (इवनिंग स्टैंडर्ड, 12 सितंबर, 1931) 

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महात्मा गांधी की मूर्ति (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Facebook/German Consulate General Bengaluru

बर्मिंघम के बिशप विज्ञान और मशीनों की जबरदस्त वकालत करते थे जबकि गांधीजी का सारा दर्शन मशीनों और पश्चिमी सभ्यता के उलट था। इंग्लैंड दौरे पर बिशप गांधीजी से मिलने आए। मशीनी सभ्यता पर दोनों में बहस शुरू हो गई। मशीनों की वकालत करते हुए बिशप ने तर्क दिया कि इससे मनुष्य का वक्त बचता है और वह अधिक बौद्धिक काम कर सकता है। गांधीजी ने बिशप से मुस्कुराते हुए कहा, 'हमारे यहां कहावत है खाली वक्त शैतान का।' इस पर बिशप ने कहा, 'मैं तो दिनभर में केवल एक घंटे शारीरिक काम करता हूं और बाकी वक्त बौद्धिक काम में लगा रहता हूं।' इस पर गांधीजी ने हंसते हुए कहा, 'मैं जानता हूं, लेकिन अगर सभी लोग बिशप बन जाएंगे तो आपका धंधा ही चौपट हो जाएगा।' (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ गांधी, खंड 54, पेज 41) 

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महात्मा गांधी की मूर्ति (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Facebook/CMO Rajasthan

अपने दौर के बहुत बड़े व्यंग्यकार जार्ज बर्नाड शॉ भी तब लंदन में ही थे। वे मजाक-मजाक में बहुत गहरी बातें कर जाते थे। बर्नाड शॉ की महात्मा गांधी से मिलने की बहुत इच्छा थी। बड़ी मुश्किल से उन्हें लंदन में गांधीजी से मिलने का मौका मिला। दोनों ने करीब एक घंटा बातचीत की। अपनी बातचीत के दौरान शॉ अपनी हाजिर-जवाबी और तंज की फुलझड़ियां छोड़ते रहे। उन्होंने गांधी जी से कहा- 'मैं आपके बारे में थोड़ी-बहुत बातें जानता था और उनसे मुझे लगा कि आप और मेरे बीच कहीं कोई भाव-सामान्य है। हम दुनिया के उस समुदाय के जीव हैं जिसके सदस्यों की संख्या बहुत कम है।' (यंग इंडिया, नवंबर, 1931)

इस मुलाकात के बाद पत्रकारों ने गांधीजी से शॉ के बारे में उनकी राय पूछी तो गांधी ने उन्हें 'यूरोप का सबसे बड़ा जोकर बताया।' गांधीजी ने कहा, 'उनमें नटखट बालक जैसा उत्साह, उदार और चिर तरूण हृदय है।' इस मुलाकात के बाद शॉ भी गांधी के मुरीद हो गए थे। कुछ साल बाद भारत के राजनीतिक उत्तराधिकार पर लंदन के एक क्लब में बुद्धिजीवियों में चर्चा चल रही थी। इसमें आम राय थी कि गांधी को अब अपनी लीडरशिप नेहरू को सौंप देनी चाहिए। 

एक किनारे दूसरी टेबल पर बैठे बर्नाड शॉ खामोशी से ये सब चर्चा सुन रहे थे। सिगरेट पीते हुए बर्नाड शॉ अपनी जगह से उठे और चर्चा कर रहे लोगों के पास पहुंचे। बोले, 'लीडरशिप कोई सिगरेट नहीं कि पीते-पीते दूसरे को पकड़ा दी जाए। यह लीडरशिप है, इसे अपने दम पर हासिल किया जाता है और जिसमें योग्यता होती है, वह खुद-ब-खुद हासिल कर लेता है।' 

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