विश्व स्वास्थ्य दिवस: स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में असमानता और भारत की सेहत का आईना
भारत का कुल स्वास्थ्य बजट 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 2.1% है, जबकि WHO का मानक न्यूनतम 5% है। यह बजट अपेक्षाकृत कम है, खासकर तब जब हम देखते हैं कि भारत में एक बड़े हिस्से को अभी भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
विस्तार
हर वर्ष 7 अप्रैल को जब विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है, तो यह अवसर केवल औपचारिकता नहीं होना चाहिए, बल्कि यह आत्ममंथन का दिन होना चाहिए। विशेष रूप से भारत जैसे देश के लिए जहां स्वास्थ्य सेवाएं आज भी बहुसंख्यक आबादी के लिए दुर्लभ और असमान हैं।
एक ओर चमकते शहरों में आधुनिक अस्पताल हैं, तो दूसरी ओर करोड़ों गरीब नागरिक ऐसे हैं जो बुनियादी चिकित्सा सुविधा तक नहीं पहुंच पाते। भारत में स्वास्थ्य आज भी एक सेवा नहीं, संघर्ष है- गरीबी, कुपोषण, असमानता और उपेक्षा से जूझते लोगों के लिए यह दिवस एक चेतावनी है कि विकास की दौड़ में पीछे छूट गए लोगों की सेहत की सुध लेना अब टालना संभव नहीं।
स्वास्थ्य सेवाओं में भारत की स्थिति: उपलब्धि और विडंबना
भारत ने पिछले कुछ दशकों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। पोलियो उन्मूलन, कोविड-19 के दौरान टीकाकरण अभियान और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के जरिए सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। लेकिन ये सफलता की कहानियां केवल कहानी बन कर न रह जाएं, इसके लिए जरूरी है कि हम आंकड़ों की तह में जाकर असलियत को देखें।
भारत का कुल स्वास्थ्य बजट 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 2.1% है, जबकि डब्ल्यूएचओ का मानक न्यूनतम 5% है। यह बजट अपेक्षाकृत कम है, खासकर तब जब हम देखते हैं कि भारत में एक बड़े हिस्से को अभी भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। गांवों में तो सरकारी अस्पताल अक्सर डॉक्टर, दवा और उपकरणों के अभाव में सिर्फ इमारत बनकर रह जाते हैं।
भारत में स्वास्थ्य और गरीबी का संबंध इतना गहरा है कि अक्सर ये दोनों एक-दूसरे को जन्म देते हैं। जो लोग गरीब हैं, उन्हें पौष्टिक भोजन नहीं मिलता, वे अस्वच्छ माहौल में रहते हैं और चिकित्सा सुविधाओं तक उनकी पहुंच सीमित रहती है। जब वे बीमार पड़ते हैं, तो उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा इलाज में चला जाता है, जिससे वे और गरीब हो जाते हैं। यह एक चक्रव्यूह है, जिससे निकलना आसान नहीं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत की लगभग 35% जनसंख्या अब भी कुपोषण से ग्रस्त है और बालकों में स्टंटिंग (लंबाई कम होना) और वेस्टिंग (वजन कम होना) जैसी समस्याएं आम हैं। इस कुपोषण का सीधा संबंध गरीबी से है, जो स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के साथ मिलकर एक भयावह तस्वीर प्रस्तुत करता है।
बाल और मातृ मृत्यु दर
भारत ने बाल मृत्यु दर में कमी लाने के प्रयास किए हैं, लेकिन अब भी यह दर कई विकसित देशों की तुलना में बहुत अधिक है। NFHS-5 के अनुसार, भारत में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 28 शिशुओं की मृत्यु हो जाती है। मातृ मृत्यु दर भी चिंताजनक है—हर 100,000 जन्मों पर 97 महिलाओं की मृत्यु होती है, जो बताता है कि गर्भावस्था और प्रसव भारत में अब भी जोखिमपूर्ण अनुभव है।
इसका मुख्य कारण है- स्वास्थ्य केंद्रों की कमी, प्रसव पूर्व देखभाल का अभाव, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता में कमी और समाज में महिला स्वास्थ्य के प्रति उपेक्षा। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह है जहां महिलाएं अक्सर बिना किसी चिकित्सीय मदद के घर पर ही प्रसव करने को मजबूर होती हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच: शहर बनाम गांव
भारत की स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे बड़ा अंतर शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच है। शहरों में निजी अस्पतालों की भरमार है, जो महंगे हैं, लेकिन आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। वहीं गांवों में सरकारी अस्पताल भी दूर-दराज हैं और वहां योग्य डॉक्टरों की भारी कमी है। ग्रामीण भारत की लगभग 70% आबादी केवल 30% डॉक्टरों पर निर्भर है। यही नहीं, भारत में प्रति 1000 लोगों पर केवल 0.8 डॉक्टर उपलब्ध हैं, जबकि WHO का मानक 1:1000 है।
स्वास्थ्य सेवाएं कितनी सुलभ हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में केवल 30% लोग ही किसी न किसी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा से कवर हैं। बाकी लोग बीमारी की स्थिति में जेब से खर्च करने को मजबूर होते हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 6 करोड़ लोग सिर्फ इलाज पर खर्च के चलते गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। सरकार की आयुष्मान भारत योजना एक बड़ी पहल है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके लाभार्थियों को लेकर पारदर्शिता, अस्पतालों की भागीदारी और धोखाधड़ी की शिकायतें भी देखने को मिलती हैं।
क्या विश्व स्वास्थ्य दिवस केवल औपचारिकता है?
यह सवाल हर भारतीय को खुद से पूछना चाहिए। अगर यह दिवस केवल भाषण, रंगोली प्रतियोगिता और सेमिनारों तक सीमित रह गया, तो यह एक खोखली परंपरा बनकर रह जाएगा। लेकिन अगर इस दिन को स्वास्थ्य नीति पर पुनर्विचार, बजट में वृद्धि, और गरीबों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतरी की दिशा में उठाया गया कदम बना दिया जाए- तो इसका असल महत्व सिद्ध होगा।
यह दिवस एक अवसर है याद दिलाने का कि स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। भारत जैसे देश के लिए यह अवसर है सामाजिक विषमता के खिलाफ आवाज उठाने का, और एक ऐसे तंत्र को विकसित करने का जहां स्वास्थ्य सुविधा जाति, धर्म, वर्ग या क्षेत्र के आधार पर नहीं, बल्कि मानवता के आधार पर उपलब्ध हो।
भारत एक युवा देश है, लेकिन अगर उसकी युवा शक्ति कुपोषण, मानसिक तनाव, और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझती रहेगी, तो यह जनसंख्या बोझ बन जाएगी। हमें याद रखना चाहिए कि केवल आर्थिक विकास, बुलेट ट्रेन या स्मार्ट सिटी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ नागरिक ही किसी देश की असली ताकत होता है।
इस विश्व स्वास्थ्य दिवस पर हमें सिर्फ जागरूक होने की नहीं, जवाबदेही तय करने की जरूरत है- सरकार, समाज और स्वयं अपनी भी। क्योंकि जब तक भारत का आखिरी नागरिक भी स्वस्थ नहीं होगा, तब तक हम सच्चे अर्थों में एक विकसित राष्ट्र नहीं बन सकते।
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