कोरोना वायरस के कारण फैली महामारी पर नियंत्रण के लिए भारत समेत दुनियाभर के कई देशों में वैक्सीन और दवा बनाने की कोशिश जारी है। पिछले महीने भारत की अग्रणी दवा कंपनी सिप्ला ने दावा किया कि वह छह महीने के अंदर कोरोना की दवा बना लेगी। अबतक एचआईवी की दो दवाओं के अलावा और मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के भी कोरोना के इलाज में सकारात्मक असर होने की बात कही गई। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर ऐसा प्रमाण नहीं है। अब, कोरोना के इलाज में एक नई दवा ने उम्मीद दिखाई है। इस दवा का नाम है सेप्सिवैक (Sepsivac), जिसके क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी मिल गई है।
कोरोना के इलाज में उम्मीद दिखाने वाली 'सेप्सिवैक' दवा के बारे में जानें सबकुछ
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सेप्सिवैक दवा का निर्माण कैडिला फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड ने किया है। ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया (DCGI) ने इसके क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति दे दी है। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के सहयोग से तीन अस्पतालों में कोरोना के मरीजों पर ट्रायल किया जाएगा। इसके लिए देश के जिन अस्पतालों का चयन किया गया है, उनमें उनमें पोस्ट ग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ के अलावा एम्स दिल्ली और भोपाल शामिल है। सीएसआईआर के महानिदेशक डॉक्टर शेखर सी. मंडे के मुताबिक तीन अस्पतालों में से एक को ट्रायल के लिए एथिक्स कमेटी से भी अनुमति मिल गई है। बाकी दोनों अस्पतालों को अनुमति मिलते ही ट्रायल शुरू करवाया जाएगा।
दरअसल, सेप्सिवैक दवा का इस्तेमाल जिस बीमारी में किया जाता है, उसके लक्षण कोविड 19 से मिलते हैं। यह दवा सीएसआईआर की ‘न्यू मिलेनियम इंडियन टेक्नोलॉजी’ पहल के तहत एक प्रोजेक्ट का फलाफल है। सीएसआईआर के सहयोग से कैडिला फार्मास्यूटिकल्स द्वारा निर्मित इस दवा का इस्तेमाल एंटी ग्राम सेप्सिस में किया जाता है। सांस लेने में तकलीफ और फेफेड़ों में दर्द वाली ग्राम-नेगेटिव सेप्सिस बीमारी कई तरह के बैक्टीरियल संक्रमण के कारण होती है। इस बीमारी के इलाज में यह दवा इसके इलाज में कारगर पाई गई है। यह दवा इम्यून सिस्टम को बूस्ट करती है। इन्ही कारणों से कोविड-19 के इलाज के लिए इसका ट्रायल किया जा रहा है। इस दवा को पहले से ही सेप्सिस और सेप्टिक शॉक में इम्यूनोथेरेपी के इलाज के लिए ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया से अनुमति मिली हुई है।
दरअसल, सेप्सिस एक ऐसी बीमारी है जो शरीर में बैक्टीरियल संक्रमण के कारण होती है, जिसमें हमारी रोग प्रतिरोधक प्रणाली अत्यधिक सक्रिय हो जाती है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक शरीर के किसी हिस्से में खरोंच लगने, कटने या कीड़े काटने से होने वाले संक्रमण के जरिए भी यह बीमारी हो सकती है। शरीर में तेजी से संक्रमण फैलने पर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली तेज गति से काम करना शुरू कर देती है और फिर वायरस के साथ शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर भी हमला करना शुरू कर देती है। इसकी वजह से शरीर में किडनी, लीवर जैसे अंग काम करना बंद कर देते हैं। गंभीर स्थिति होने पर मौत होने की भी संभावना होती है। इस बीमारी में सेप्सिवैक दवा बहुत राहत पहुंचाती है।
सेप्सिवैक में माइकोबैक्टीरियम डब्ल्यू होता है जो सेप्सिस के मरीजों में इम्यूनिटी यानी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक सेप्सिवैक दवा सेप्सिस से होने वाली मृत्यु दर को 50 फीसदी से कम कर देता है। इसलिए कोविड 19 के लिए इसके क्लीनिकल ट्रायल पर विचार किया गया। दवा का ट्रायल कोरोना तीन तरह के मरीजों पर किया जाएगा।
- पहला ट्रायल कोविड-19 के वे मरीज, जो आईसीयू में हैं यानी जिनकी हालत ज्यादा गंभीर है।
- दूसरा ट्रायल उन पर होगा जो आईसीयू में नहीं हैं और
- तीसरा ट्रायल उन लोगों पर जो कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके हैं। यह इसलिए कि ठीक होने के बाद दोबारा इसका संक्रमण नहीं हो।
कोरोना के इलाज में यह दवा कितनी कारगर होगी, यह ट्रायल के बाद ही पता चल पाएगा, लेकिन इस दवा ने इस संकट के दौर में एक उम्मीद जरूर दिखाई है।