जम्मू-कश्मीर: गोमांस बैन लागू के पीछे का मकसद?
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जम्मू-कश्मीर में गोमांस की बिक्री और कारोबार पर लगे प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने के हाई कोर्ट के आदेश के बाद ये सवाल उठ रहे हैं कि राज्य में मौजूद गोमांस कानून को हटाने या फिर कानून में संशोधन करने की कभी पहल क्यों नहीं की गई?
ये सवाल सीधे तौर पर उन राजनीतिक दलों से है जिन्होंने सूबे में लंबे समय तक सरकारें चलाईं हैं। सवाल ये भी उठ रहे हैं कि राज्य में बीजेपी की सरकार बनने के बाद अदालत के जरिए इस कानून को लागू करने के आदेश के पीछे क्या मक़सद है?
जम्मू-कश्मीर में गोमांस पर वर्ष 1932 से रणबीर पैनल कोड के तहत प्रतिबंध लागू है। अदालत ने आदेश दिया है कि क़ानून को सख्ती से लागू किया जाए।
मुद्दा जानबूझ कर एक राजनीतिक कोशिश
जम्मू-कश्मीर में सब से ज्यादा समय तक यानि 30 वर्ष तक नेशनल कांफ्रेंस ने हुकूमत की है। नेशनल कांफ्रेंस राज्य में गोमांस पर मौजूदा कानून को मुद्दा मानती है।
उनके नजदीक ये मुद्दा जानबूझ कर एक राजनीतिक कोशिश के नतीजे में उठाया गया है, जिस की कोई जरुरत नहीं है। 30 वर्ष के दौर में नेशनल कांफ्रेंस ने इस मसले पर कभी भी बात नहीं की है।
सत्तारूढ़ पार्टी पीडीपी ने भी पिछले 10 सालों के दौरान इस मुद्दे पर कभी मुंह नहीं खोला है।
राजनीतिक कदम
नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता डॉक्टर मुस्तफा कमाल कहते हैं, 'गोहत्या पर राज्य में कानून मौजूद है, आज जिस तरह से इस को जिंदा किया गया है वह सब राजनीति है।'
वो आगे बताते हैं, 'ये सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में बीजेपी ने अपने कदम जमाए हैं और पीडीपी उस की मदद कर रही है। नेशनल कांफ्रेंस को आज तक इस कानून को ज़िंदा करने या मारने की जरूरत नहीं पड़ी।'
इसी दौरान नेशनल कांफ्रेंस ने 11 सितंबर 2015 को प्रेस को जारी एक बयान में बताया है कि वो भविष्य में इस तरह के हालात पैदा ना होने देने के मद्देनज़र क़ानूनी विशेषज्ञों को साथ लेकर रणबीर पैनल कोड में कुछ उचित संशोधन करने की पहल करेंगें।
पीडीपी मानती है कि ये मुद्दा चिंता का विषय है। पीडीपी के नजदीक ये मसला निजी आजादी का मामला है। मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के राजनीतिक सलाहकार वहीद पार्रा कहते हैं, 'ये धार्मिक मामला है, और चिंता का विषय है।
कुछ लोग हैं जो इस तरह के मसलों को जिंदा रखना चाहते हैं।' कश्मीर के राजनीतिक विश्लेषक जम्मू-कश्मीर में गोमांस पर प्रतिबंध को राजनीतिक क़दम मानते हैं।
गर्म राजनीति
संपादक और राजनीतिक विश्लेषक कासिम सज्जाद कहते हैं, 'नेशनल कांफ्रेंस अगर आज बीजेपी को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रही है तो नेशनल कांफ्रेंस खुद भी तो इसी भाजपा का हिस्सा एक जमाने में रही है।'
वो सवाल खड़ा करते हैं कि अगर वो इसे भाजपा और पीडीपी की साजिश बता रही है तो जब वो सरकार में थे तो उन्होंने इस मुद्दे पर कोई क़दम क्यों नहीं उठाया?
उन्होंने कहा, 'ये ताज़ा क़दम तो जम्मू-कश्मीर में लोगों को धार्मिक बुनियाद पर बांटने की एक कोशिश है। हाई कोर्ट को आदेश जारी करने से पहले सब को विश्वास में लेना चाहिए था।'
साल 1986 में भी घाटी के अनंतनाग में उस समय के गवर्नर जगमोहन ने जन्माष्टमी पर गोहत्या को अपराध करार दिया था, जिसके नतीजे में दक्षिणी कश्मीर अनंतनाग के लाल चौक में गोहत्या की गई थी, जिसके बाद कश्मीर के हालात बहुत दिनों तक खराब रहे थे। कारण चाहे जो भी है फिलहाल इस मसले पर घाटी में राजनीति गर्म है।