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समाप्त हो रहे कुएं, बढ़ रहा जल संकट
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परगवाल में लुप्त हो रहा कुआं।
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परगवाल। करीब चार दशक पहले तक ग्रामीण इलाकों में पानी का मुख्य स्रोत कुएं हुआ करते थे। पीने के साथ-साथ सिंचाई के लिए कुएं ही साधन हुआ करते थे। हमारी संस्कृति और परंपराओं में कुओं की बड़ी महत्ता थी। मांगलिक कार्यक्रमों में भी कुओं के पास कई आयोजन हुआ करते थे, लेकिन बदलते परिवेश के चलते मौजूदा समय कुएं अंतिम सांसें गिन रहे हैं।
सरहद के साथ सटी तहसील परगवाल की 6 पंचायतों में मौजूदा समय करीब 45 कुएं हैं, लेकिन जरूरी रखरखाव आधुनिक जीवन शैली और जल के नए-नए स्रोत सृजित होने से इनकी अनदेखी बहुत पहले शुरू हो चुकी है। इस कारण कुएं खंडहर में तब्दील हो गए हैं। इनमें कुछ का भू जलस्तर नीचे चले जाने से वह सूख गए हैं। तो वहीं कुछ कुओं में पानी तो है, लेकिन इनमें गंदगी के ढेर लगे हैं। हालांकि करीब हर गांव में एक दो कुआं मिल जाएगा, लेकिन जिस तरह से इनकी अनदेखी हो रही है इससे इनका अस्तित्व खतरे में हैं।
गांव सजवाल निवासी बलवान सिंह का कहना है कि धीरे-धीरे गांवों से कुओं की महत्ता समाप्त होती जा रही है। कुओं की उपयोगिता खत्म होने के चलते गांवों में लोगों का मिलना जुलना भी कम हो गया है। पहले कई परिवारों की महिलाएं कुओं पर एकत्रित होकर आपस में भेदभाव बुलाकर काम करती थीं। अगर कुओं के मिटते अस्तित्व को संजोया नहीं गया तो ये बीते जमाने की बात होगी।
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गांव परगवाल की प्रकाशो देवी ने बताया कि कुओं का पानी दूसरे स्रोतों के मुकाबले स्वस्थ होता था। कुओं का पानी पीने से बीमारियां मिट जाती थीं, क्योंकि सूरज की किरणें सीधी कुओं के अंदर पढ़ती थीं, जो कि पानी को शुद्ध रखने में काफी कारगर होती हैं। कुआं खोदना धर्म और शान की बात समझी जाती थी, लोग एकत्रित होकर साल में एक बार कुओं का पानी बाहर निकालते थे। इसको डोगरी में काढ़ निकालना बोलते थे। उन्होंने भी सरकार से कुओं की सुध लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि अगर कुओं को बचाया नहीं गया तो आने वाली पीढ़ियां कुओं को देख नहीं पाएंगी। वो सिर्फ किताबों में ही कुओं के बारे में पढे़ंगी।
ज्ञात रहे परगवाल चिनाब से जुड़ा दूरदराज का क्षेत्र है। जहां लोग पहले कुओं का पानी ही पीते थे। आधुनिक जीवन शैली में कुएं गांवों के बीचोबीच खंडहर बनकर रह गये। हालांकि कुछ गांवों में लोगों ने इस प्राचीन जल स्रोतों को संभाल के रखा है, लेकिन जरूरी रखरखाव और साफ-सफाई के अभाव में आने वाले दिनों में यह बंद होने की कगार पर हैं। कुछ खास मौकों पर सरकार कार्यक्रम आयोजित कर वर्षा के पानी को संचयन करने की बात कहती है। इन बंद होते कुओं को जल संचयन का साधन बनाया जा सकता है। इसके लिए लोगों को जागृत करने के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर कार्य किए जाने की जरूरत है।
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सरहद के साथ सटी तहसील परगवाल की 6 पंचायतों में मौजूदा समय करीब 45 कुएं हैं, लेकिन जरूरी रखरखाव आधुनिक जीवन शैली और जल के नए-नए स्रोत सृजित होने से इनकी अनदेखी बहुत पहले शुरू हो चुकी है। इस कारण कुएं खंडहर में तब्दील हो गए हैं। इनमें कुछ का भू जलस्तर नीचे चले जाने से वह सूख गए हैं। तो वहीं कुछ कुओं में पानी तो है, लेकिन इनमें गंदगी के ढेर लगे हैं। हालांकि करीब हर गांव में एक दो कुआं मिल जाएगा, लेकिन जिस तरह से इनकी अनदेखी हो रही है इससे इनका अस्तित्व खतरे में हैं।
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गांव सजवाल निवासी बलवान सिंह का कहना है कि धीरे-धीरे गांवों से कुओं की महत्ता समाप्त होती जा रही है। कुओं की उपयोगिता खत्म होने के चलते गांवों में लोगों का मिलना जुलना भी कम हो गया है। पहले कई परिवारों की महिलाएं कुओं पर एकत्रित होकर आपस में भेदभाव बुलाकर काम करती थीं। अगर कुओं के मिटते अस्तित्व को संजोया नहीं गया तो ये बीते जमाने की बात होगी।
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गांव परगवाल की प्रकाशो देवी ने बताया कि कुओं का पानी दूसरे स्रोतों के मुकाबले स्वस्थ होता था। कुओं का पानी पीने से बीमारियां मिट जाती थीं, क्योंकि सूरज की किरणें सीधी कुओं के अंदर पढ़ती थीं, जो कि पानी को शुद्ध रखने में काफी कारगर होती हैं। कुआं खोदना धर्म और शान की बात समझी जाती थी, लोग एकत्रित होकर साल में एक बार कुओं का पानी बाहर निकालते थे। इसको डोगरी में काढ़ निकालना बोलते थे। उन्होंने भी सरकार से कुओं की सुध लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि अगर कुओं को बचाया नहीं गया तो आने वाली पीढ़ियां कुओं को देख नहीं पाएंगी। वो सिर्फ किताबों में ही कुओं के बारे में पढे़ंगी।
ज्ञात रहे परगवाल चिनाब से जुड़ा दूरदराज का क्षेत्र है। जहां लोग पहले कुओं का पानी ही पीते थे। आधुनिक जीवन शैली में कुएं गांवों के बीचोबीच खंडहर बनकर रह गये। हालांकि कुछ गांवों में लोगों ने इस प्राचीन जल स्रोतों को संभाल के रखा है, लेकिन जरूरी रखरखाव और साफ-सफाई के अभाव में आने वाले दिनों में यह बंद होने की कगार पर हैं। कुछ खास मौकों पर सरकार कार्यक्रम आयोजित कर वर्षा के पानी को संचयन करने की बात कहती है। इन बंद होते कुओं को जल संचयन का साधन बनाया जा सकता है। इसके लिए लोगों को जागृत करने के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर कार्य किए जाने की जरूरत है।