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सुप्रीम कोर्ट: कश्मीर में टारगेट किलिंग मामले पर सुनवाई से इनकार, याचिकाकर्ता को सरकार से संपर्क करने को कहा

Sat, 03 Sep 2022 02:42 AM IST
विमल शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: विमल शर्मा Updated Sat, 03 Sep 2022 02:42 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ को केंद्र सरकार के समक्ष आवेदन देने की स्वतंत्रता प्रदान करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। याचिका में सरकार को उन पीड़ितों की गणना करने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी, जो राज्य से भागने और देश के विभिन्न हिस्सों में रहने के लिए मजबूर हुए हैं।

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Supreme Court refuses to hear target killing case in Kashmir
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

विस्तार

1990 के दौरान जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों और सिखों की लक्षित हत्या (टारगेटेड किलिंग) की जांच की मांग करने वाले एक एनजीओ ‘वी द सिटिजन’ द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इस संबंध मे एनजीओ को केंद्र सरकार से संपर्क करने को कहा है।

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जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने एनजीओ को केंद्र सरकार के समक्ष आवेदन देने की स्वतंत्रता प्रदान करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। याचिका में सरकार को उन पीड़ितों की गणना करने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी, जो राज्य से भागने और देश के विभिन्न हिस्सों में रहने के लिए मजबूर हुए हैं।
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह कश्मीर में एक लाख से अधिक हिंदुओं के नरसंहार का मामला है। उन्होंने राहुल पंडित की पुस्तक ‘अवर मून हैज ब्लड क्लॉट्स’ का हवाला दिया। 

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जिसमें कश्मीर से हिंदुओं और सिखों की हत्या, आगजनी और प्रवास की घटना का प्रत्यक्ष विवरण दिया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि पुस्तक में घटना का विस्तृत विवरण हैं और पुस्तक का लेखक स्वयं उन हमलों का शिकार था।

 तत्कालीन राज्य सरकार ने नहीं की साजिश की जांच

उन्होंने 1990 के दौरान जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल जगमोहन द्वारा लिखी गई एक पुस्तक का भी उल्लेख किया, जिसमें कश्मीरी पंडितों के खिलाफ किए गए अत्याचारों का वर्णन है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने साजिश की कभी जांच नहीं की।

वकील ने कहा कि भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता को जम्मू-कश्मीर में 2019 में लागू किया गया था जब अनुच्छेद- 370 के तहत इसकी विशेष स्थिति को निरस्त कर दिया गया था। उससे पहले वहां रणबीर दंड संहिता थी। इसलिए अपराधों के संबंध में आईपीसी और सीआरपीसी के तहत उचित कार्रवाई नहीं की गई।

उन्होंने कहा, सरकार ने हमारी दुर्दशा नहीं देखी। कोर्ट ने कहा, सरकार से संपर्क करें। हम इसे क्यों सुनें? क्या आपने भारत सरकार से संपर्क किया है? इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ता एनजीओ को सरकार के पास जाने की स्वतंत्रता दी। कश्मीरी हिंदुओं और सिखों का अंतिम पलायन 1989 में कश्मीर घाटी से शुरू हुआ था। यह सर्वोच्च स्तर का नरसंहार था।

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