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द कश्मीर फाइल्स: ...तो न कश्मीर लहूलुहान होता और न पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ती, टारगेट लिस्ट में था नाम, पढ़ें सतीश महालदार की आपबीती

Wed, 30 Mar 2022 10:33 AM IST
दुष्यंत शर्मा बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 30 Mar 2022 10:33 AM IST
सार

टारगेट लिस्ट में नाम आने के बाद घाटी छोड़ने को मजबूर हुए सतीश महालदार की जुबानी। आतंकियों ने एनटीपीसी इंजीनियर मौसा की जीप को आग लगाकर की थी मारने की कोशिश। तंकी मसूद अजहर व मुश्ताक जरगर को न छोड़ा गया होता तो खूनखराबा न होता रहता।
 

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So Kashmir would not have bled nor would the Pandits have to leave the valley.
Satish Mahaldar - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

तब मैं 17 साल का था। पूरा कश्मीर जल रहा था। मस्जिदों से एलान हो रहे थे। हर ओर निजाम-ए-मुस्तफा के नारे गूंज रहे थे। डरे-सहमे कश्मीरी पंडित घरों में कैद थे। घंटा-घड़ियाल का शोर थम गया था। मंत्रोच्चार की आवाज धीमी पड़ गई थी। पता नहीं कब आतंकी धमक पड़ें। मेरा नाम भी टारगेट लिस्ट में शामिल था। घर के पास की एक मस्जिद में टारगेट लिस्ट चिपकाए जाने के बाद परिवार वालों ने कश्मीर से सुरक्षित निकाल दिया। बाद में उनके परिवार समेत पूरी घाटी ही धीरे-धीरे कश्मीरी पंडितों से खाली हो गई। यह कहना है विस्थापन का मंजर देखने वाले कश्मीरी पंडित सतीश महालदार का।

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सतीश नवंबर 1989 के उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि उनका पैतृक घर जवाहर नगर में है। मां-बाप और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ खुशी-खुशी रह रहे थे। इस बीच आतंक का दौर शुरू हो गया। उनका नाम टारगेट लिस्ट में शामिल हो गया और यह लिस्ट जवाहर नगर मस्जिद में चिपकाई गई। परिवार वालों को पता चला तो उन्होंने जम्मू भेज दिया, लेकिन परीक्षा का समय था। फिर 3-4 माह बाद कश्मीर गया। तब तक स्थिति और बिगड़ गई थी। उनके मौसा एसके धर एनटीपीसी में इंजीनियर थे।
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आतंकियों ने जवाहर नगर में उनकी जीप को आग लगा दी। जान लेने की कोशिश की, लेकिन वे बाल-बाल बच गए। इसके बाद दहशत और बढ़ गई। मार्च 1990 में तो घर से निकलना भी मुश्किल हो गया। पड़ोसी मुसलमान परिवार भी दहशत में था कि पता नहीं क्या हो जाएगा। चारों ओर असुरक्षा का वातावरण, सड़कों पर दहशतगर्दों का आतंक, असहाय कानून-व्यवस्था की स्थिति के बीच एक दिन परिवार को कश्मीर छोड़ना पड़ा। यह दर्द अब भी पूरा परिवार महसूस करता है। यदि सरकार ने प्रयास किए होते तो पंडितों को घाटी नहीं छोड़नी पड़ती और न ही व्यापक पैमाने पर खूनखराबा का दौर चलता।
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उनका कहना है कि यदि आतंकी मसूद अजहर और मुश्ताक जरगर लटरम को न छोड़ा गया होता तो कश्मीर लहूलुहान न होता रहता। उस समय केंद्र में भाजपा की मदद से वीपी सिंह की सरकार थी। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 70 आतंकियों को पकड़ा था, लेकिन उन्हें छोड़ दिया गया। आखिर उन्हें क्यों और किसके आदेश पर छोड़ा गया, इसकी जांच होनी चाहिए।  

अवंतिपोरा, बनिहाल, बारामुला में रोकने के प्रबंध के आग्रह को नहीं मिली तवज्जो
सतीश बताते हैं कि जिस दौरान कश्मीरी पंडितों का विस्थापन शुरू हुआ तो प्रशासन उन परिस्थितियों को संभालने में चूक गया। तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन से पंडितों ने घाटी छोड़ने के बजाय अवंतिपोरा, बनिहाल व बारामुला में सुरक्षा के साथ रुकने का प्रबंध करने का आग्रह किया था। लेकिन उनके आग्रह को स्वीकार नहीं किया गया। आखिर क्या वजह थी कि उन्हें इन जगहों पर रोकने का प्रबंध करने के बजाय जम्मू भेज दिया गया।  


पूरा सच सामने लाने के लिए आयोग का हो गठन
फिल्म द कश्मीर फाइल्स को लेकर मचे हंगामे के बीच सतीश ने कहा कि फिल्म में सच्चाई दिखाई गई है। लेकिन अभी यह अधूरी है। इसमें 90 फीसदी बात तो अभी रह ही गई है। पंडितों ने उस दौर में कितने जुल्म सहे, कितना खून का घूंटकर पीकर पल-पल काटे यह बयां नहीं किया जा सकता। सरकार को चाहिए कि यह पूरा सच देश-दुनिया के सामने आए। इसके लिए जांच आयोग का गठन किया जाना चाहिए।

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