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Jammu News: रेत में बिखरा पुल, नाव के भरोसे 200 परिवारों की जिंदगी
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फोटो ट्रैक पर है...
- बाढ़ में पुल टूटने के एक साल बाद भी कट्टल बटाल के 200 परिवार सुरक्षित रास्ते से महरूम
अंकित कुमार मिश्र
जम्मू। गोद में बीमार बच्चा, सामने नदी और उसे पार करने के लिए टूटी-फूटी नाव। करीब 35 वर्षीय रेवती के लिए यह किसी एक दिन की परेशानी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष है। जम्मू शहर से 21 किलोमीटर दूर कट्टल बटाल में रहने वाली रेवती को जब अपने बच्चे को अस्पताल ले जाना होता है तो उपचार से पहले नदी पार करने की चुनौती से गुजरना पड़ता है।
बाढ़ में गांव को जोड़ने वाला झूला पुल टूटने के बाद से सुरक्षित आवाजाही का रास्ता बंद है। ऐसे में नाव ही ग्रामीणों का सहारा बनी हुई है, लेकिन इस जोखिम भरे सफर में हर समय अनहोनी का डर बना रहता है।
रेवती की तरह गांव के करीब दो हजार लोग पिछले एक साल से इस परेशानी को झेल रहे हैं। नदी के उस पार रहने वाले लगभग 200 परिवारों के लिए पुल का टूटना केवल आवागमन की समस्या नहीं, बल्कि जिंदगी की बुनियादी जरूरतों तक पहुंचने में बाधा बन गया है। बच्चों को अस्पताल ले जाना हो, घर के लिए जरूरी सामान लाना हो या रोजमर्रा के काम निपटाने हों, हर बार नदी पार करने का जोखिम उठाना पड़ता है।
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नदी की रेत पर बिखरे पुल के टूटे हिस्से आज भी सुरक्षित रास्ते की बहाली का इंतजार दिखा रहे हैं। एक तरफ बीमार बच्चे को समय पर इलाज दिलाने की चिंता है, तो दूसरी तरफ ग्रामीणों के सामने रोजाना नदी पार करने की मजबूरी। सवाल यह है कि शहर से महज 21 किलोमीटर दूर बसे गांव के लोगों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा के लिए आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा?
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33 करोड़ के प्रस्ताव के
बाद भी काम शुरू नहीं हुआ
डिप्टी सीएम सुरिंदर चौधरी के दौरे के बाद क्षेत्र के लिए 33 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इससे ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि उनकी समस्या का जल्द समाधान होगा और सुरक्षित रास्ते की बहाली के लिए काम शुरू किया जाएगा। हालांकि, अब तक प्रस्ताव पर काम शुरू नहीं हो पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब समस्या प्रशासन के संज्ञान में है और समाधान के लिए प्रस्ताव भी तैयार किया जा चुका है, तो निर्माण कार्य में देरी क्यों हो रही है। उनकी मांग है कि प्रस्ताव को जल्द मंजूरी देकर जमीन पर काम शुरू कराया जाए और पुल निर्माण पूरा होने की समय सीमा भी तय की जाए।
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झिड़ी मेले से पहले बढ़ी सुरक्षा की चिंता
24 नवंबर से शुरू होने वाले झिड़ी मेले को देखते हुए कट्टल बटाल में सुरक्षित आवाजाही की व्यवस्था करना और भी जरूरी हो गया है। मेले के दौरान श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने की संभावना है। स्थानीय लोगों के अनुसार, मेले में रोजाना दो हजार से अधिक श्रद्धालु आते हैं। ऐसे में नदी पार करने के लिए मौजूदा जोखिम भरी व्यवस्था सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों की मांग है कि मेले से पहले नदी पार करने के लिए सुरक्षित वैकल्पिक इंतजाम किए जाएं, ताकि श्रद्धालुओं के साथ स्थानीय लोगों को भी राहत मिल सके।
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परेशानी ग्रामीणों की जुबानी
एक साल से गांव के लोग परेशानी झेल रहे हैं। प्रशासन जल्द पुल निर्माण शुरू करवाए और काम पूरा होने की समयसीमा बताए, ताकि लोगों को इस मुश्किल से राहत मिल सके।
- केवल शर्मा, नाव चालक
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33 करोड़ रुपये के प्रस्ताव पर जल्द फैसला लिया जाए। सिर्फ प्रस्ताव बनाने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक जमीन पर काम शुरू नहीं होगा, तब तक ग्रामीणों की परेशानी दूर नहीं होगी।
- रिंकू कुमार, स्थानीय निवासी
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झिड़ी मेले से पहले नदी पार करने के सुरक्षित इंतजाम किए जाएं। इससे श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और गांव के लोगों को भी रोजाना नदी पार करने के जोखिम से राहत मिलेगी।
- स्वर्ण सिंह, स्थानीय निवासी
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- बाढ़ में पुल टूटने के एक साल बाद भी कट्टल बटाल के 200 परिवार सुरक्षित रास्ते से महरूम
अंकित कुमार मिश्र
जम्मू। गोद में बीमार बच्चा, सामने नदी और उसे पार करने के लिए टूटी-फूटी नाव। करीब 35 वर्षीय रेवती के लिए यह किसी एक दिन की परेशानी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष है। जम्मू शहर से 21 किलोमीटर दूर कट्टल बटाल में रहने वाली रेवती को जब अपने बच्चे को अस्पताल ले जाना होता है तो उपचार से पहले नदी पार करने की चुनौती से गुजरना पड़ता है।
बाढ़ में गांव को जोड़ने वाला झूला पुल टूटने के बाद से सुरक्षित आवाजाही का रास्ता बंद है। ऐसे में नाव ही ग्रामीणों का सहारा बनी हुई है, लेकिन इस जोखिम भरे सफर में हर समय अनहोनी का डर बना रहता है।
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रेवती की तरह गांव के करीब दो हजार लोग पिछले एक साल से इस परेशानी को झेल रहे हैं। नदी के उस पार रहने वाले लगभग 200 परिवारों के लिए पुल का टूटना केवल आवागमन की समस्या नहीं, बल्कि जिंदगी की बुनियादी जरूरतों तक पहुंचने में बाधा बन गया है। बच्चों को अस्पताल ले जाना हो, घर के लिए जरूरी सामान लाना हो या रोजमर्रा के काम निपटाने हों, हर बार नदी पार करने का जोखिम उठाना पड़ता है।
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नदी की रेत पर बिखरे पुल के टूटे हिस्से आज भी सुरक्षित रास्ते की बहाली का इंतजार दिखा रहे हैं। एक तरफ बीमार बच्चे को समय पर इलाज दिलाने की चिंता है, तो दूसरी तरफ ग्रामीणों के सामने रोजाना नदी पार करने की मजबूरी। सवाल यह है कि शहर से महज 21 किलोमीटर दूर बसे गांव के लोगों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा के लिए आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा?
33 करोड़ के प्रस्ताव के
बाद भी काम शुरू नहीं हुआ
डिप्टी सीएम सुरिंदर चौधरी के दौरे के बाद क्षेत्र के लिए 33 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इससे ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि उनकी समस्या का जल्द समाधान होगा और सुरक्षित रास्ते की बहाली के लिए काम शुरू किया जाएगा। हालांकि, अब तक प्रस्ताव पर काम शुरू नहीं हो पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब समस्या प्रशासन के संज्ञान में है और समाधान के लिए प्रस्ताव भी तैयार किया जा चुका है, तो निर्माण कार्य में देरी क्यों हो रही है। उनकी मांग है कि प्रस्ताव को जल्द मंजूरी देकर जमीन पर काम शुरू कराया जाए और पुल निर्माण पूरा होने की समय सीमा भी तय की जाए।
झिड़ी मेले से पहले बढ़ी सुरक्षा की चिंता
24 नवंबर से शुरू होने वाले झिड़ी मेले को देखते हुए कट्टल बटाल में सुरक्षित आवाजाही की व्यवस्था करना और भी जरूरी हो गया है। मेले के दौरान श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने की संभावना है। स्थानीय लोगों के अनुसार, मेले में रोजाना दो हजार से अधिक श्रद्धालु आते हैं। ऐसे में नदी पार करने के लिए मौजूदा जोखिम भरी व्यवस्था सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों की मांग है कि मेले से पहले नदी पार करने के लिए सुरक्षित वैकल्पिक इंतजाम किए जाएं, ताकि श्रद्धालुओं के साथ स्थानीय लोगों को भी राहत मिल सके।
परेशानी ग्रामीणों की जुबानी
एक साल से गांव के लोग परेशानी झेल रहे हैं। प्रशासन जल्द पुल निर्माण शुरू करवाए और काम पूरा होने की समयसीमा बताए, ताकि लोगों को इस मुश्किल से राहत मिल सके।
- केवल शर्मा, नाव चालक
33 करोड़ रुपये के प्रस्ताव पर जल्द फैसला लिया जाए। सिर्फ प्रस्ताव बनाने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक जमीन पर काम शुरू नहीं होगा, तब तक ग्रामीणों की परेशानी दूर नहीं होगी।
- रिंकू कुमार, स्थानीय निवासी
झिड़ी मेले से पहले नदी पार करने के सुरक्षित इंतजाम किए जाएं। इससे श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और गांव के लोगों को भी रोजाना नदी पार करने के जोखिम से राहत मिलेगी।
- स्वर्ण सिंह, स्थानीय निवासी