संघर्षविराम का एक साल : लोग बोले- अब बेखौफ होकर खेलते हैं बच्चे, खेतों में भी बिना डरे होता है काम
एक साल पहले भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष विराम समझौते को शुक्रवार को एक साल पूरा हो गया। इस दौरान एलओसी पर बने अमन और शांति के माहौल ने स्थानीय लोगों की जिंदगी में खुशहाली लौटा दी है।
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जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर स्थित गांवों में बच्चे अब बिना खौफ के खेलते हैं। लोग खेतों में भी बिना किसी डर के खेती कर रहै हैं। इसका कारण है यहां छाई शांति। एक साल पहले भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष विराम समझौते को शुक्रवार को एक साल पूरा हो गया। इस दौरान एलओसी पर बने अमन और शांति के माहौल ने स्थानीय लोगों की जिंदगी में खुशहाली लौटा दी है।
लोग बताते हैं कि कई दशकों बाद रात में चैन की नींद सो रहे हैं। चाहते हैं कि आगे भी ऐसा ही माहौल बना रहे। एक साल पहले 22 फरवरी को हॉटलाइन पर सैन्य संचालन के महानिदेशकों (डीजीएमओ) के बीच बातचीत में दोनों पक्षों ने 24-25 फरवरी 2021 की मध्यरात्रि से एलओसी पर संघर्ष विराम का कड़ाई से पालन करने पर सहमति जताई थी।
नादर के दोनों पैर काटने पड़े थे
बांडी कमलकोट के मुनीर हुसैन (43) ने बताया कि समझौते के बाद से बच्चे आराम से बाहर घूम सकते हैं और स्थानीय लोग भी निडर होकर खेतीबाड़ी करते हैं। अब डर का माहौल खत्म हो चुका है। लोग खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। इससे पहले जब भी उनके गांव पर पाकिस्तानी गोलाबारी होती थी तो काफी नुकसान उठाना पड़ता था। 13 नवंबर, 2020 की घटना को याद करते हुए मुनीर बताते हैं कि उस दिन उनके भाई नादर हुसैन (45) गोलाबारी में बुरी तरह घायल हुए थे। घटना में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी। भाई एक माह से अधिक समय अस्पताल में रहे। उनकी दोनों टांगे काटनी पड़ीं। बता दें, इस इलाके में करीब 12-13 गांव हैं, जिनमें करीब 20 से 25 हजार आबादी गोलाबारी से प्रभावित होती आई है। इनमें बांडी, कमलकोट, दुलानजा, कुंडी बरजाला, माड़ियां, नड़ियां आदि गांव आते हैं।
ऐसा माहौल रहा तो किसी को अपनी मां नहीं गंवानी पड़ेगी
उड़ी सेक्टर में एलओसी से सटे गांव सिलिकूट के इरशाद अहमद ने बताया कि उनका गांव एलओसी के बिलकुल ही करीब है। जब भी भारत और पाकिस्तान में गोलाबारी होती थी तो हम हमेशा उसकीचपेट में आते थे। गोलाबारी में घरों से निकलना मुश्किल हो जाता था, लेकिन समझौते के बाद से यहां के लोग खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। इरशाद ने बताया कि उनका परिवार भी पाकिस्तानी गोलाबारी का शिकार हुआ है। 1 नवंबर, 2001 को पाकिस्तानी गोलाबारी में इरशाद भी घायल हुए थे और उनकी एक टांग काटनी पड़ी थी। उन्होंने बताया कि इसके बाद 8 अगस्त, 2003 को हुई पाकिस्तानी गोलाबारी में उनकी मां की मौत हो गई थी। ऐसी शांति रही तो अब किसी को अपनी मां नहीं खोनी पड़ेगी। इससे दोनों ओर एलओसी के करीब रहने वाले लोगों की जिन्दगी खुशहाल बनी रहेगी।
समझौते के बाद पाकिस्तान ने दो बार ही की गोलाबारी
वहीं सेना के एक अधिकारी ने बताया कि वर्ष 2019 में 3168 और 2020 में 4645 बार पाकिस्तान ने संघर्ष विराम का उल्लंघन किया। उन्होंने बताया कि 25 फरवरी 2021 से लागू हुए समझौते तक पाकिस्तान ने 592 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया। समझौते के बाद सितंबर और अक्तूबर 2021 में दो बार संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाएं हुईं।
गोलाबारी के डर से घर छोड़कर भागना पड़ता था
संघर्ष विराम से खुश अखनूर के जीरो लाइन की पंचायत सामोआ के लोग का कहना है कि जब से गोलाबारी थमी है, तब से अमन और चैन से रह रहे हैं। इससे पहले बहुत ही मुश्किलों का सामना किया है। शाम को जब खाना खाने बैठते या सोने की तैयारी करते तो पाकिस्तान गोलाबारी कर देता था। गोले गांवों में गिरते तो दशहत में घर छोड़कर सुरक्षित जगहों की ओर भागना पड़ता था।
स्थानीय ग्रामीणों गोपाल, दास पूर्ण चंद, मगां राम, राधा कुमारी आदि ने बताया कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी। खेती नहीं कर पाते थे, दिहाड़ीदारों का रोजगार छिन जाता था। दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल हो जाता था। कई-कई बार रिश्तेदारों के यहां शरण लेनी पड़ती थी। जब से संघर्ष विराम हुआ है, तब से हम लोग अमन और चैन के साथ जिंदगी बिता रहे हैं। बिना किसी डर के घर से लेकर खेतों तक के काम कर रहे हैं। बच्चे नियमित शिक्षा हासिल कर रहे हैं। अब हमारी सरकार से अपील है कि हमारी जो उपजाऊ भूमि कारगिल युद्ध के दौरान से सेना के अधीन है, उसे वापस दिया जाए और दोनों देशों के बीच की फेंसिंग को जीरो लाइन पर ले जाया जाए। ताकि हम लोग फेंसिंग के अंदर की बंजर बन चुकी भूमि पर फिर से खेतीबाड़ी कर सकें।
पंचायत की छात्रा संजीवनी वर्मा तथा भारती शर्मा ने बताया कि अब हम लोग बिना किसी खौफ के स्कूल जा रहे हैं। संघर्ष विराम से पहले जब हम स्कूल पहुंचते थे तो गोलाबारी शुरू हो जाती थी। कई-कई बार तो महीनों स्कूल बंद रहते थे।