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मच्छेल मुठभेड़ में एक और जवान को सजा

Sat, 14 Mar 2015 09:55 AM IST
Updated Sat, 14 Mar 2015 09:55 AM IST
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one more jawan sentenced in machil fake encounter

सेना की एक विशेष अदालत ने मच्छेल मुठभेड़ में शामिल सेना के एक और जवान को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इस सैन्यकर्मी को सभी प्रकार की सेवा के लाभ से वंचित रखा जाएगा। मच्छेल में तीन मई, 2010 को हुई मुठभेड़ पर हुए बवाल के बाद 23 दिसंबर, 2013 को कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू हुई थी। कोर्ट मार्शल की कार्रवाई गत सितंबर माह में पूरी हुई, जिसमें कुपवाड़ा स्थित सेना की 68 माउंटेन ब्रिगेड के ब्रिगेडियर दीपक मेहरा ने कोर्ट मार्शल की सुनवाई की।

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इसके बाद जीसीएम (जनरल कोर्ट मार्शल) ने 13 नवंबर 2014 को चार राजपूत रेजीमेंट के तत्कालीन कमान अधिकारी कर्नल डीके पठानिया और कैप्टन उपेंद्र सिंह के अलावा अन्य तीन सैन्यकर्मियों को दोषी करार देकर सजा सुनाई थी, लेकिन उस समय जीसीएम ने टेरिटोरियल आर्मी के अब्बास हुसैन शाह को बरी कर दिया था।
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सेना के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, उत्तरी कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा ने शाह की भूमिका को दोबारा से जांचने के आदेश जारी किए थे। उसने मारे गए युवाओं को नौकरी दिलाने का झांसा दिया था।

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दोबारा जांच में अब्बास भी दोषी करार

one more jawan sentenced in machil fake encounter

दोबारा जांच के बाद अब्बास को भी दोषी पाया गया। गौरतलब है कि सेना के साथ काम करने वाले दो नागरिकों बशीर अहमद लोन और अब्दुल हमीद बट ने टेरिटोरियल आर्मी के जवान अब्बास और चार राजपूत रेजीमेंट के तत्कालीन कमान अधिकारी के साथ मिलकर एक साजिश रची।

इसके बाद बशीर, अब्दुल और अब्बास ने रफियाबाद के नादिहाल इलाके के रहने वाले तीन बेरोजगार युवकों शहजाद अहमद,  मोहम्मद शफी लोन और रियाज अहमद को सेना में नौकरी दिलाने का झांसा देकर बुलाया था।

इसी दौरान 29 अप्रैल, 2010 को इन युवकों के परिजनों ने नजदीकी पुलिस स्टेशन में उनके लापता होने की रिपोर्ट लिखवाई। तीन मई, 2010 को सेना ने मच्छेल के नादिहाल में तीन घुसपैठियों को मार गिराने का दावा किया।

जब उनकी तस्वीरें अखबारों में छपी तो मारे गए तीनों विदेशी आतंकी नादिहाल के लापता युवक निकले। इस घटना के बाद पूरी घाटी में बवाल मच गया था।

क्या है मच्छेल मुठभेड़?

one more jawan sentenced in machil fake encounter

कुपवाड़ा जिले के मच्छेल सेक्टर में 30 अप्रैल 2010 में कुछ युवकों और सेना के बीच मुठभेड़ हुई थी। इसमें तीन युवकों की मौत हो गई थी। सेना ने युवकों को सीमा पार से आए आतंकवादी बताया था। तीनों युवक रफियाबाद के रहने वाले थे और सोना पिंडी में सेना की गोली लगने से उनकी मौत हुई थी।

इसके विरोध में हुर्रियत कांफ्रेंस ने फर्जी मुठभेड़ बताते हुए आंदोलन चलाया था। इस दौरान सेना और सुरक्षा बलों पर जगह-जगह पथराव करने के अलावा सरकारी इमारतों में तोड़फोड़ और वाहनों को आग लगा दी गई थी। प्रशासन ने घाटी में कई दिनों तक कर्फ्यू लगाए रखा।

हिंसात्मक आंदोलन के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 112 लोगों की मौत हो गई थी। बड़ी संख्या में लोग जख्मी हुए। सुरक्षा बलों पर आरोप है कि उन्होंने तीनों युवकों को काम देने के लिए कैंप में बुलाया और फर्जी मुठभेड़ में उनकी हत्या कर दी। सिंतबर 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अलगाववादी नेताओं को बातचीत के जरिए मामले का हल करने को कहा।

तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम के नेतृत्व में संसद का 39 सदस्यीय सर्व दल प्रतिनिधिमंडल घाटी पहुंचा था। नवंबर 2014 में दो अफसरों सहित पांच सैन्य कर्मियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गई थी।

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