राष्ट्रद्रोह में मसर्रत की जमानत याचिका खारिज
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अलगाववादी तथा कश्मीर मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मसर्रत आलम की राष्ट्रद्रोह मामले में कोर्ट ने शनिवार को जमानत याचिका खारिज कर दी। चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) बडगाम कमलेश पंडिता ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिका खारिज की।
पुलिस केस के अनुसार मसर्रत पर 15 अप्रैल को हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के स्वागत के लिए गैर कानूनी तरीके से रैली करने, सीआरपीएफ वाहन पर पथराव करने, रास्ता जाम करने तथा पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी करने पर मुकदमा दर्ज किया गया था।
इस आधार पर उसे 17 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उसकी ओर से जमानत याचिका दाखिल की गई जिसमें कहा गया कि उस पर गलत आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह सब कुछ प्रभावी राजनीतिज्ञों के इशारे पर किया गया है क्योंकि वह मुस्लिम लीग का अध्यक्ष है जो हुर्रियत (जी) का घटक है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि एक राजनीतिक नेता होने के नाते लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसे हर प्रकार के विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सीजेएम ने सरकारी वकील की भी दलीलों को सुना।
मसर्रत की ओर से अधिवक्ताओं ने कहा कि केंद्र तथा राज्य में बैठे राजनीतिज्ञों के इशारे पर मुकदमा कायम किया गया है। यह केवल उसकी आवाज को दबाने के लिए किया गया है।
कश्मीर बंद से जनजीवन प्रभावित
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि कश्मीर में पाकिस्तानी झंडा लहराना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ओर से भी अवैधानिक नहीं माना गया है और न ही यह विधि का उल्लंघन है। सीजेएम ने अपने 14 पेज के आदेश में कहा है कि दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट इस नतीजे पर पहुंची है कि उसकी जमानत याचिका खारिज करने योग्य है।
तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि वह मृत्युदंड या उम्र कैद की सजा पाने योग्य अपराध का दोषी है। अलगाववादी मसर्रत आलम को पीएसए के तहत जेल भेजे जाने के खिलाफ हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी की ओर से कश्मीर बंद के आह्वान से शनिवार को जनजीवन प्रभावित रहा।
दुकानें, व्यापारिक प्रतिष्ठान, पेट्रोल पंप तथा शिक्षण संस्थान बंद रहे। सरकारी कार्यालयों तथा बैंकों में कम उपस्थिति रही। सड़कों से वाहन नदारद रहे। कार तथा आटो रिक्शा कुछ स्थानों पर चले। गिलानी ने शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद बंद का आह्वान किया था। उनका कहना था कि मसर्रत पर पीएसए लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।