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बातचीत के लिए तैयार हुए अलगाववादी नेता, पर सरकार के सामने रखी कड़ी शर्तें

Tue, 29 May 2018 09:48 PM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, जम्मू Updated Tue, 29 May 2018 09:48 PM IST
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kashmir separatist leaders say ready to join peace talks
अलगाववादी नेता
अलगाववादियों के ज्वाइंट रेजिस्टेंस लीडरशिप (जेआरएल) ने केंद्र से बातचीत के लिए तैयार होने का एलान किया है लेकिन इसके लिए शर्तें भी रखी हैं कि दिल्ली अपने बयानों को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखे। भारत, पाकिस्तान और कश्मीर तीन हितधारक हैं। बिना किसी एक के वार्ता प्रक्रिया में शामिल हुए बगैर कोई समाधान नहीं निकल पाएगा।
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ज्वाइंट रेजिस्टेंस लीडरशिप (जेआरएल) के नेता सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज मौलवी उमर फारूक व मोहम्मद यासीन मलिक की मंगलवार को हुई बैठक में केंद्र के बातचीत के लिए तैयार होने की घोषणा और कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर विचार किया गया। हैदरपोरा स्थित गिलानी के आवास पर कई घंटे तक चली बैठक के बाद जेआरएल ने साझा बयान जारी किया। 
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बयान में कहा गया है कि पिछले कुछ दिनों से नई दिल्ली में बैठे विभिन्न लोगों की ओर से वार्ता को लेकर जो बयान सामने आए हैं वो अस्पष्ट हैं। राजनाथ सिंह कहते हैं कि पाकिस्तान और कश्मीर दोनों से बातचीत होगी। कश्मीर और कश्मीरी दोनों हमारे हैं। वहीं, सुषमा स्वराज कहती हैं जब तक आतंकवाद नहीं रुक जाता तब तक पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होगी। फिर अमित शाह कहते हैं सीजफायर आतंकियों के लिए नहीं आम जनता के लिए है। राज्य के डीजीपी का बयान आता है कि सीजफायर आतंकियों की घर वापसी के लिए है। यह सब अस्पष्ट बयान किसी उद्देश्य के साथ गंभीरता से बातचीत करने या प्रतिक्रिया देने के लिए थोड़ा सोचने पर मजबूर करती है।
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बयान में कहा गया कि यह सब बयान मोदी के श्रीनगर में दिए गए बयान के बाद सामने आए हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीर मसले का समाधान विकास और शांति है। जानबूझकर कश्मीर की समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और लाखों सैनिकों की उपस्थिति के कारण के आंतरिक और बाहरी आयामों की अनदेखी करते हुए यह बयान दिया गया। ऐसा लगता है कि मोदी ने लोगों के साथ एक क्रूर मजाक किया है। अगर राजनाथ सिंह वार्ता की बात करते हैं तो सवाल उठता है कि वह किससे वार्ता की बात करते हैं? इस वार्ता का एजेंडा क्या है? 

बयान में यह भी कहा गया है कि इस दिशा में भारत सरकार की ओर से किए गए किसी भी प्रयास से कश्मीर और पाकिस्तान में लोग मिलेंगे। सरकार को इस बात को स्पष्ट करना होगा कि वह किसे लेकर बात करना चाहती है, तभी वह वार्ता प्रक्रिया में भाग लेने के लिए तैयार हैं। कश्मीर के लोगों की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। हमने अपनी आत्मनिर्भरता के अधिकार के लिए अपने संघर्ष में भारी निवेश किया है और वे एक अस्पष्ट प्रयासों का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।

कश्मीर मसले का समाधान राजनीतिक न कि सैन्य बल का उपयोग
बयान में उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 70 सालों से जम्मू कश्मीर के लोग मुसीबतें झेल रहे हैं। वह कश्मीर मसले का समाधान राजनीतिक तौर पर चाहते हैं ना कि सैन्य बल का उपयोग कर।  हितधारकों के बीच वार्ता राजनीतिक निवारण के लिए सबसे अच्छी प्रक्रिया और विकल्प है।
 

कौन हैं गिलानी, उमर व यासीन मलिक

kashmir separatist leaders say ready to join peace talks
separatist leaders
सैयद अली शाह गिलानी हुर्रियत कांफ्रेंस (जी) के प्रमुख हैं। अलगाववादी गतिविधियों के कारण पिछले कई साल से नजरबंद हैं। इसी तरह मीरवाइज मौलवी उमर फारूक हुर्रियत कांफ्रेंस (एम) के प्रमुख हैं। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख यासीन मलिक हैं। घाटी में अलगाववादी राजनीति में तीनों को प्रमुख माना जाता है।

कौन है प्रो. अब्दुल गनी भट

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प्रो. अब्दुल गनी भट
प्रो. भट ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के पूर्व चेयरमैन और मुस्लिम कांफ्रेंस के अध्यक्ष हैं। इन्हें हुर्रियत (एम) प्रमुख मीरवाइज मौलवी उमर फारूक वाले हुर्रियत धड़े का माना जाता है। उत्तरी कश्मीर के सोपोर इलाके के बोटेंगो गांव के प्रो. भट ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से परसियन में परा स्नातक की है। विधि की भी पढ़ाई की है। सोपोर में उन्होंने वकालत भी शुरू की थी, लेकिन थोड़े ही दिनों बाद इसे छोड़ दिया। 1963 में सरकारी कालेज पुंछ में परसियन के लेक्चरर बने। 1986 में उन्हें बर्खास्त किया गया। आरोप था कि अनंतनाग में कश्मीरी पंडितों के मंदिर व घरों को जलाया। लगभग नौ महीने उन्होंने जेल में भी सजा काटी।
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