जम्मू-कश्मीर: ईटीटी घोटाले में पूर्व शिक्षा मंत्रियों, आयुक्तों व बोर्ड अध्यक्षों की भूमिका की भी होगी जांच
वर्ष 2013 में शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन ने ईटीटी घोटाले की शिकायत की थी। वर्ष 2011 में ही पेरेंट को-ऑर्डिनेशन कमेटी ने श्रीनगर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर इस मामले की जांच की मांग कर दी थी। अब इस मामले की सुनवाई हो रही है।
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दस साल पुराने एलिमेंट्री टीचर ट्रेनिंग (ईटीटी) घोटाले में वर्ष 2000 के बाद के शिक्षा मंत्रियों, शिक्षा विभाग के आयुक्तों और शिक्षा बोर्ड के अध्यक्षों की भूमिका की भी जांच होगी। एंटी करप्शन कोर्ट जम्मू ने पुलिस के विशेष डीजी (अपराध) को एक आईपीएस अधिकारी की अध्यक्षता में एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया है।
एसआईटी मामले में आगे की जांच दो महीने के भीतर पूरी करेगी और 15 दिन में जांच की स्टेटस रिपोर्ट भी पेश करेगी। कोर्ट का मानना है कि इतना बड़ा घोटाला इन सबके बिना होना संभव नहीं लगता। लिहाजा इनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।अदालत ने मामले में प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद मामले में आरोप तय करने को टाल दिया और कहा कि उचित न्याय करने के लिए मामले में आगे की जांच अनिवार्य है।
लिहाजा क्राइम ब्रांच इस मामले की जांच को आगे बढ़ाए। यह मामला 2013 में सामने आया था। तब क्राइम ब्रांच ने दो एफआईआर दर्ज की थीं। यह एफआईआर जम्मू-कश्मीर शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन की तरफ से की गई शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थीं।
क्राइम ब्रांच ने इस मामले में 2015 में विशेष भ्रष्टाचार रोधी अदालत, जम्मू में बशीर अहमद डार, तत्कालीन निदेशक अकादमिक, शिक्षा बोर्ड के खिलाफ वर्ष 2002-04 में भ्रष्टाचार करने की चार्जशीट पेश की। डार के अलावा पांच अन्य अभियुक्तों के नाम भी इसमें शामिल थे, जो ईटीटी संस्थानों के प्रमोटर/मालिक कहलाने वाले लाभार्थी थे।
यह चार्जशीट ज्यादातर सत्र 2003 से 2005 के दाखिले पर आधारित कथित घोटाले से संबंधित है। साथ ही क्राइम ब्रांच जम्मू ने शैक्षणिक सत्र 2005-07, 2007-09 आदि के आधार पर कुछ सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी दायर कीं। उक्त सभी चार्जशीट एसीबी की विशेष अदालत में 2015 से निपटान के लिए लंबित हैं।
क्राइम ब्रांच की जांच घटिया और सिर्फ दिखावा
एंटी करप्शन कोर्ट की विशेष अदालत के जज ताहिर खुर्शीद रैना ने कहा, मामले के जांच अधिकारी और तत्कालीन एसएसपी क्राइम की देखरेख में इस घोटाले और उच्च स्तर के घोटाले में घटिया और दिखावे की जांच की गई थी। यहां तक कि क्राइम ब्रांच ने श्रीनगर हाईकोर्ट के आदेशों का पालन भी नहीं किया और इसका उल्लंघन करते हुए इस तरह की जांच की।
चेयरमैन की शिकायत से पहले लोग पहुंचे चुके थे कोर्ट
बता दें कि वर्ष 2013 में शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन ने ईटीटी घोटाले की शिकायत की थी। जबकि वर्ष 2011 में ही पेरेंट को-ऑर्डिनेशन कमेटी ने श्रीनगर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर इस मामले की जांच की मांग कर दी थी। 2019 में इस मामले में चार्जशीट पेश हो गई थी और हाईकोर्ट ने इस मामले का निपटान कर दिया था। तब सरकार ने ईटीटी संस्थानों के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए थे।
बिना किसी पॉलिसी, नियम के 22 संस्थान चलाने की अनुमति दे दी
बिना किसी पॉलिसी के तब रहे निदेशक बशीर अहमद डार ने 22 ईटीटी संस्थानों को चलाने की अनुमति दे दी। इसमें किसी दिशानिर्देश का पालन नहीं किया गया। किसी संस्थान की इंस्पेक्शन तक नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि 2002 और 2003 में सरकार ने एक कमेटी गठित कर ईटीटी संस्थानों को एनओसी लेने के लिए दिशा निर्देश दिए थे।
फिर कैसे शिक्षा विभाग के सचिव ने 22 संस्थानों की एनओसी देखे बिना इनको चलाने की अनुमति मंजूर कर ली। वर्ष 2000 का स्कूल शिक्षा अधिनियम साफ कहता है कि किसी ट्रेनिंग स्कूल को मंजूरी सरकार की तरफ दी जा सकती है।
फिर कैसे निदेशक स्तर के अफसर ने ऐसा कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह सब शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष, शिक्षा विभाग के आयुक्त सचिव और मंत्री कर सहमति के बिना नहीं हो सकते। लिहाजा इन सबकी भूमिकाओं की जांच भी करें।