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झेलम तट पर अवैध कब्जों ने दिया आफत को न्योता

Fri, 12 Sep 2014 02:19 AM IST
Updated Fri, 12 Sep 2014 02:19 AM IST
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illegal construction on the bank of jhelum river brings tragedy

रियासत में आई सदी की सबसे विनाशकारी बाढ़ प्रकृति से अशिष्ट छेड़छाड़ का नतीजा है। कश्मीर घाटी और जम्मू संभाग में पहाड़ों में अवैध उत्खनन भूस्खलन की समस्या बढ़ा रहा है। अतिवृष्टि और अनावृष्टि भी प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ के ही नतीजे रहे है।

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लगभग सौ साल से झेलम के किनारों पर सीमेंट के जंगल बढ़ते रहे और पानी की निकासी के तमाम ड्रेनेज बंद हो गए। झेलम में जल स्तर की बढ़ोतरी के बाद यह पानी डल और अन्य लेक में पहुंचता था जिसके तमाम रास्ते अवरुद्ध होते गए।
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इन अवैध को समाप्त करने की मुहिम तो नहीं चली अलबत्ता कब्जेदारों को हुक्मरानों से संरक्षण जरूर मिलता रहा। नतीजा तबाही के रूप में सामने है।

महाराजा हरि सिंह के जमाने में बने थे तटबंध

illegal construction on the bank of jhelum river brings tragedy

झेलम के किनारे तटबंध महाराजा हरि सिंह के जमाने में बनाए गए थे। आबादी के बढ़ते दबाव के बाद इन्हें और उन्नत किया जाना चाहिए था लेकिन इसके प्रयास नहीं हुए। झेलम के दोनों किनारों में आबादी का विस्तार होता रहा।

कचरे और स्लिट से झेलम उथली होने लगी। इस बार की अतिवृष्टि को झेलम पचा नहीं पाई और पानी तेज गति से श्रीनगर शहर के सभी इलाकों में फैल गया।

रीवर चैनल लगातार संकरा होता गया। झेलम के किनारे में अंतिम बिन्दु तक लोगों के घर बनते रहे और उन्हें रोकने को कोशिश नहीं हुई।

प्रत‌िबंध‌ित इलाके में भी बना द‌िए बंगले

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झेलम के किनारे दो सौ मीटर तक निर्माण पर रोक है लेकिन बंगले बनते रहे। श्रीगर के अलावा अनंतनाग, बांदीपोरा, बारामूला जिलों में भी इसी प्रकार का अतिक्रमण हुआ। चाहे खन्ना बल हो या काकपोरा।

संबूरा हो या बिजबेहड़ा, सब जगह अतिक्रण का एक जैसा मंजर ही वहीं से दिखता रहा है। उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं से झेलम पर मा3र पड़ती रही।

जम्मू कश्मीर वाटर रिसोर्सेस रेगुलेशन एंड मैनेजमेंट एक्ट 2010 में बना जिसमें एसे अतिक्रमण को गैरकानूनी करार दिया गया। इसके बावजूद अतिक्रमण हटाने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए गए।

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स्‍थानीय लोगों ने जानबूझ कर बुलाई आफत

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डल और वुल्लर लेक में झेलम का बढ़ा पानी आता रहा है। इस निकासी से शहर का बचाव होता था। दोनों लेक अतिक्रमण के शिकार हुए हैं। सिर्फ लेक ही नहीं नाले भी अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। इस तरह महराजा के जमाने में पानी निकासी के लिए बनाए गए तमाम रास्ते बंद होते गए।

ये रास्ते सेफ्टी बल्ब के रूप में काम करते थे। पानी का स्तर बढ़ने पर निकासी हो जाती थी और श्रीनगर शहर बचा रहता था। ड्रैनेज की निकासी क्षमता सिकुड़ती चली गई और अवैध कब्जों ने पानी को शहर की ओर आने का न्योता दे दिया।

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