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आज से बदला जम्मू-कश्मीर का इतिहास और भूगोल, इन नियमों का अस्तित्व हो जाएगा खत्म
Thu, 31 Oct 2019 03:09 PM IST
Avdhesh Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, जम्मू
अमर उजाला ब्यूरो, जम्मू
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Thu, 31 Oct 2019 03:09 PM IST
सार
- देश में कुल केंद्रशासित प्रदेशों की संख्या 9 हुई
- पहली बार कोई राज्य केंद्रशासित प्रदेश बना
- एक देश, एक विधान और एक निशान लागू
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आजादी के वक्त से ही केंद्र का हिस्सा रहा जम्मू-कश्मीर का इतिहास और भूगोल बृहस्पतिवार से बदल गया है। अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केंद्रशासित प्रदेश हो गए हैं। दोनों केंद्रशासित प्रदेश देश के पहले गृहमंत्री और 560 से ज्यादा रियासतों का विलय करने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के मौके पर वजूद में आए हैं। इसी के साथ देश में एक देश, एक विधान, एक निशान लागू हो गया है।
अब देश में कुल राज्य 28 रह जाएंगे, जबकि कुल केंद्रशासित प्रदेशों की संख्या 9 हो गई है। जम्मू-कश्मीर पुनगर्ठन विधेयक, 2019 के मुताबिक, दोनों केंद्रशासित प्रदेशों को 31 अक्तूबर से वजूद में आना था। यह पहली बार है, जब किसी राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटा गया है। इससे पहले ऐसे कई उदाहरण हैं, जब केंद्रशासित प्रदेश को पूर्ण राज्य बनाया गया या फिर एक राज्य को दो राज्यों में बांटा गया हो।
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अब दोनों केंद्रशासित प्रदेशों में रणबीर पेनल कोड की जगह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सीआरपीसी) की धाराएं काम करेंगी। नए जम्मू-कश्मीर में पुलिस व कानून-व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन होगी, जबकि भूमि व्यवस्था की देखरेख का जिम्मा निर्वाचित सरकार के तहत होगी। केंद्र सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख रीजन में जो मौजूदा साढ़े तीन लाख सरकारी कर्मचारी काम कर रहे हैं वो आने वाले कुछ महीनों तक मौजूदा व्यवस्था के तहत ही अपने-अपने इलाकों में काम करते रहेंगे।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 107 सदस्य हैं, जिनकी परिसीमन के बाद संख्या बढ़कर 114 तक हो जाएगी। वहीं, विधायिका में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के लिए पहले की तरह ही 24 सीट रिक्त रखी जाएंगी। दोनों नए केंद्र शासित राज्यों में बदलाव की ये प्रक्रिया बेहद सादगी भरे समारोह में होगी। इसके अलावा, केंद्र सरकार जल्द ही इन दोनों केंद्र शासित राज्यों के सरकारी कर्मचारियों से उनके काम करने के प्राथमिकता की जगह पूछेगी।
फिर आनेवाले दिनों में उस हिसाब से तैनाती की जाएगी। अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी सरकारी नियुक्तियां जल्द ही की जाएंगी। जम्मू-कश्मीर में सरकारी कामकाज की भाषा अब ऊर्दू नहीं हिंदी हो जाएगी। प्रशासनिक स्तर पर यह सबसे बड़ा बदलाव है। उल्लेखनीय है कि 72 साल बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने का एलान किया था। इसके मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में पुडुचेरी जैसी विधायिका होगी, जबकि लद्दाख बिना विधायिका के चंडीगढ़ जैसा होगा।
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अब देश में कुल राज्य 28 रह जाएंगे, जबकि कुल केंद्रशासित प्रदेशों की संख्या 9 हो गई है। जम्मू-कश्मीर पुनगर्ठन विधेयक, 2019 के मुताबिक, दोनों केंद्रशासित प्रदेशों को 31 अक्तूबर से वजूद में आना था। यह पहली बार है, जब किसी राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटा गया है। इससे पहले ऐसे कई उदाहरण हैं, जब केंद्रशासित प्रदेश को पूर्ण राज्य बनाया गया या फिर एक राज्य को दो राज्यों में बांटा गया हो।
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अब दोनों केंद्रशासित प्रदेशों में रणबीर पेनल कोड की जगह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सीआरपीसी) की धाराएं काम करेंगी। नए जम्मू-कश्मीर में पुलिस व कानून-व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन होगी, जबकि भूमि व्यवस्था की देखरेख का जिम्मा निर्वाचित सरकार के तहत होगी। केंद्र सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख रीजन में जो मौजूदा साढ़े तीन लाख सरकारी कर्मचारी काम कर रहे हैं वो आने वाले कुछ महीनों तक मौजूदा व्यवस्था के तहत ही अपने-अपने इलाकों में काम करते रहेंगे।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 107 सदस्य हैं, जिनकी परिसीमन के बाद संख्या बढ़कर 114 तक हो जाएगी। वहीं, विधायिका में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के लिए पहले की तरह ही 24 सीट रिक्त रखी जाएंगी। दोनों नए केंद्र शासित राज्यों में बदलाव की ये प्रक्रिया बेहद सादगी भरे समारोह में होगी। इसके अलावा, केंद्र सरकार जल्द ही इन दोनों केंद्र शासित राज्यों के सरकारी कर्मचारियों से उनके काम करने के प्राथमिकता की जगह पूछेगी।
फिर आनेवाले दिनों में उस हिसाब से तैनाती की जाएगी। अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी सरकारी नियुक्तियां जल्द ही की जाएंगी। जम्मू-कश्मीर में सरकारी कामकाज की भाषा अब ऊर्दू नहीं हिंदी हो जाएगी। प्रशासनिक स्तर पर यह सबसे बड़ा बदलाव है। उल्लेखनीय है कि 72 साल बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने का एलान किया था। इसके मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में पुडुचेरी जैसी विधायिका होगी, जबकि लद्दाख बिना विधायिका के चंडीगढ़ जैसा होगा।
150 से ज्यादा पुराने कानून खत्म, 100 से ज्यादा नए कानून लागू
जम्मू-कश्मीर राज्य के बंटवारे के साथ उसे विशेष दर्जा देने वाले 150 से ज्यादा पुराने कानून खुद ही खत्म हो जाएंगे, जबकि आधार समेत 100 से ज्यादा नए कानून लागू हो गए हैं। जो कानून लागू हो गए हैं, उनमें आधार, मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून, सूचना का अधिकार अधिनियम, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, मनरेगा, भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम, मुस्लिम महिला संरक्षण अधिनियम और शत्रु संपत्ति कानून शामिल हैं।
ये होंगे अहम बदलाव....
पुलिस व्यवस्था: जम्मू कश्मीर में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) का मौजूदा पद कायम रहेगा जबकि लद्दाख में इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस वहां के पुलिस का मुखिया होंगे। दोनों ही केंद्रशासित राज्यों की पुलिस केंद्र सरकार के निर्देश पर काम करेगी।
हाईकोर्ट: फिलहाल जम्मू-कश्मीर की श्रीनगर और जम्मू पीठ मौजूदा व्यवस्था के तहत काम करेंगी और लद्दाख के मामलों की सुनवाई भी अभी की तरह ही होगी। चंडीगढ़ की तर्ज पर इसे लागू करने का फैसला लिया गया है।
केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल: आनेवाले दिनों में भी इन दोनों केंद्रशासित प्रदेशों में केंद्र सरकार के निर्देश पर ही केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती होगी।
आयोग: जम्मू कश्मीर और लद्दाख में फिलहाल जो आयोग काम कर रहे थे अब उनकी जगह केंद्र सरकार के आयोग अपनी भूमिका निभाएंगे।
विधायिका: दोनों केंद्रशासित राज्यों में लेफ्टिनेंट की भूमिका प्रमुख होगी और उन्हीं की अनुमति से महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाएंगे।
अफसरशाही: आईएएस, आईपीएस और दूसरे केंद्रीय अधिकारियों तथा भ्रष्टाचार निरोधी ब्यूरो लेफ्टिनेंट गवर्नर के नियंत्रण में रहेंगे, न कि जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश की निर्वाचित सरकार के तहत काम करेंगे। भविष्य में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में अफसरों की नियुक्तियां अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और संघशासित कैडर से की जाएंगी।
ये होंगे अहम बदलाव....
पुलिस व्यवस्था: जम्मू कश्मीर में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) का मौजूदा पद कायम रहेगा जबकि लद्दाख में इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस वहां के पुलिस का मुखिया होंगे। दोनों ही केंद्रशासित राज्यों की पुलिस केंद्र सरकार के निर्देश पर काम करेगी।
हाईकोर्ट: फिलहाल जम्मू-कश्मीर की श्रीनगर और जम्मू पीठ मौजूदा व्यवस्था के तहत काम करेंगी और लद्दाख के मामलों की सुनवाई भी अभी की तरह ही होगी। चंडीगढ़ की तर्ज पर इसे लागू करने का फैसला लिया गया है।
केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल: आनेवाले दिनों में भी इन दोनों केंद्रशासित प्रदेशों में केंद्र सरकार के निर्देश पर ही केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती होगी।
आयोग: जम्मू कश्मीर और लद्दाख में फिलहाल जो आयोग काम कर रहे थे अब उनकी जगह केंद्र सरकार के आयोग अपनी भूमिका निभाएंगे।
विधायिका: दोनों केंद्रशासित राज्यों में लेफ्टिनेंट की भूमिका प्रमुख होगी और उन्हीं की अनुमति से महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाएंगे।
अफसरशाही: आईएएस, आईपीएस और दूसरे केंद्रीय अधिकारियों तथा भ्रष्टाचार निरोधी ब्यूरो लेफ्टिनेंट गवर्नर के नियंत्रण में रहेंगे, न कि जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश की निर्वाचित सरकार के तहत काम करेंगे। भविष्य में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में अफसरों की नियुक्तियां अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और संघशासित कैडर से की जाएंगी।
जम्मू-कश्मीर में उद्योग क्षेत्र को मिलेगा बढ़ावा
जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ यहां उद्योग जगत को बढ़ावा मिलने की उम्मीदें बढ़ गई हैं। इस केंद्र शासित राज्य में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों ने रुझान दिखाया है। राज्य में पर्यटन, इको पर्यटन, सीमेंट, हेल्थ, सेब, कृषि सहित अन्य क्षेत्रों को बढ़ावा मिलेगा। निवेशकों को नई गाइडलाइन जारी होने का इंतजार है। जिसके बाद विभिन्न औद्योगिक क्षेत्र में निवेश की भरमार आ सकती है।
जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ निवेश को लेकर कई प्रस्ताव आने की उम्मीद है। स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिसिटी, सीमेंट में महाराष्ट्र, महेंद्र समूह ने रिजार्ट, रिलायंस समूह ने दूर संचार सहित अन्य औद्योगिक समूहों ने जम्मू-कश्मीर में रुझान दिखाया है। दुनिया भर में विख्यात कश्मीर के सेब के लिए जम्मू में कोल्ड स्टोर बनाने पर भी विभिन्न कंपनियां विचार कर रही हैं। इसके अलावा स्थानीय निवेशक अपने व्यापार को बढ़ाकर अतिरिक्त यूनिट स्थापित करने की सोच रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाल ही में यूएई के लुलू समूह ने जम्मू और कश्मीर का दौरा कर कृषि सहित अन्य क्षेत्रों में निवेश करने पर सहमति जताई थी। पर्यटन क्षेत्र की बात करें तो जम्मू-कश्मीर में कई नए स्थलों पर पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। इसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों की पर्यटन स्थलों पर नए रिजार्ट, होटल सहित अन्य ढांचे का निर्माण करवाने पर नजर है।
उद्योग पर्यटन के लिहाज से 2020 में जम्मू कश्मीर में जम्मू-कश्मीर निवेशक शिखर सम्मेलन करवाया जा रहा है। इसमें देश विदेश के निवेशकों को लुभाया जाएगा। कश्मीर में हर साल 12-15 लाख के बीच देश विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। इससे कई गुना अधिक घरेलू पर्यटक भी आते हैं। जम्मू संभाग में वर्ष 2018 में 1.60 करोड़ पर्यटक पहुंचे थे।
निवेशक दिखा रहे रुझान: निदेशक
उद्योग एवं वाणिज्य विभाग की निदेशक अनु मल्होत्रा के अनुसार जम्मू-कश्मीर में विभिन्न उद्योग क्षेत्र में स्थानीय और बाहरी निवेशकों ने रुझान दिखाया है। सभी नई गाइड लाइन का इंतजार कर रहे हैं, जिससे उम्मीद है कि नई नीतियों पर भारी निवेश हो सकता है। निवेशकों की ओर से संबंधित जानकारियां मांगी जा रही हैं।
जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ निवेश को लेकर कई प्रस्ताव आने की उम्मीद है। स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिसिटी, सीमेंट में महाराष्ट्र, महेंद्र समूह ने रिजार्ट, रिलायंस समूह ने दूर संचार सहित अन्य औद्योगिक समूहों ने जम्मू-कश्मीर में रुझान दिखाया है। दुनिया भर में विख्यात कश्मीर के सेब के लिए जम्मू में कोल्ड स्टोर बनाने पर भी विभिन्न कंपनियां विचार कर रही हैं। इसके अलावा स्थानीय निवेशक अपने व्यापार को बढ़ाकर अतिरिक्त यूनिट स्थापित करने की सोच रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाल ही में यूएई के लुलू समूह ने जम्मू और कश्मीर का दौरा कर कृषि सहित अन्य क्षेत्रों में निवेश करने पर सहमति जताई थी। पर्यटन क्षेत्र की बात करें तो जम्मू-कश्मीर में कई नए स्थलों पर पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। इसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों की पर्यटन स्थलों पर नए रिजार्ट, होटल सहित अन्य ढांचे का निर्माण करवाने पर नजर है।
उद्योग पर्यटन के लिहाज से 2020 में जम्मू कश्मीर में जम्मू-कश्मीर निवेशक शिखर सम्मेलन करवाया जा रहा है। इसमें देश विदेश के निवेशकों को लुभाया जाएगा। कश्मीर में हर साल 12-15 लाख के बीच देश विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। इससे कई गुना अधिक घरेलू पर्यटक भी आते हैं। जम्मू संभाग में वर्ष 2018 में 1.60 करोड़ पर्यटक पहुंचे थे।
निवेशक दिखा रहे रुझान: निदेशक
उद्योग एवं वाणिज्य विभाग की निदेशक अनु मल्होत्रा के अनुसार जम्मू-कश्मीर में विभिन्न उद्योग क्षेत्र में स्थानीय और बाहरी निवेशकों ने रुझान दिखाया है। सभी नई गाइड लाइन का इंतजार कर रहे हैं, जिससे उम्मीद है कि नई नीतियों पर भारी निवेश हो सकता है। निवेशकों की ओर से संबंधित जानकारियां मांगी जा रही हैं।
नये जम्मू-कश्मीर में सरकार की पाई-पाई का होगा हिसाब
नये जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय फंडिंग की पाई-पाई का हिसाब होगा। पुनर्गठन के बाद केंद्र शासित प्रदेश बने जम्मू-कश्मीर में लेफ्टिनेंट गर्वनर पद पर सर्विंग ब्यूरोक्रेट की नियुक्ति इस ओर इशारा करती है। जम्मू यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और प्रदेश के सियासी हालात पर नजर रखने वाले प्रो. दीपांकर सेन गुप्ता के अनुसार जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर पद के लिए चुने गए गिरीश चंद्र मुर्मू वर्तमान में एक्सपेंडिचर सेक्रेटरी के पद पर आसीन थे। उन्हें खर्चे के हिसाब किताब से जुड़ी योजनाओं को सख्ती से लागू करने की महारत है।
प्रो. दीपांकर के अनुसार जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को ब्लैकमेलिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। यहां की पॉलिटिकल क्लास हालात को मैनेज करने के लिए केंद्र से पैसा तो लेती थी, लेकिन इसका धरातल पर अमल नजर नहीं आता था। बीते वर्ष के आंकड़े साझा करते हुए प्रो. दीपांकर कहते हैं कि पिछले एक वर्ष में हिमाचल प्रदेश ने कैपिटल एक्सपेंडिचर (आधारभूत ढांचे पर खर्च) की मद में चार हजार करोड़ खर्च किए। जबकि जम्मू-कश्मीर में 20 हजार करोड़ का खर्च दर्शाया गया।
जम्मू-कश्मीर में घर-मकान और वाहनों की संख्या हिमाचल प्रदेश के समान या उससे अधिक है, जबकि रोड कनेक्टिविटी में हिमाचल प्रदेश जम्मू-कश्मीर से पांच गुना आगे है। बिजली उत्पादन क्षेत्र में भी हिमाचल प्रदेश ने कहीं बेहतर काम किया है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय फंडिंग का कभी कोई अभाव नहीं रहा है। मामला सिर्फ खर्च के हिसाब का है, जिस पर नये जम्मू-कश्मीर में खास नजर रखी जाएगी। प्रो. दीपांकर के अनुसार केंद्रीय फंडिंग के खुर्दबुर्द वाले प्रदेश में किसी एक्सपेंडिचर सचिव को प्रशासनिक कमान देने के पीछे व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन की मंशा नजर आती है।
प्रो. दीपांकर के अनुसार जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को ब्लैकमेलिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। यहां की पॉलिटिकल क्लास हालात को मैनेज करने के लिए केंद्र से पैसा तो लेती थी, लेकिन इसका धरातल पर अमल नजर नहीं आता था। बीते वर्ष के आंकड़े साझा करते हुए प्रो. दीपांकर कहते हैं कि पिछले एक वर्ष में हिमाचल प्रदेश ने कैपिटल एक्सपेंडिचर (आधारभूत ढांचे पर खर्च) की मद में चार हजार करोड़ खर्च किए। जबकि जम्मू-कश्मीर में 20 हजार करोड़ का खर्च दर्शाया गया।
जम्मू-कश्मीर में घर-मकान और वाहनों की संख्या हिमाचल प्रदेश के समान या उससे अधिक है, जबकि रोड कनेक्टिविटी में हिमाचल प्रदेश जम्मू-कश्मीर से पांच गुना आगे है। बिजली उत्पादन क्षेत्र में भी हिमाचल प्रदेश ने कहीं बेहतर काम किया है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय फंडिंग का कभी कोई अभाव नहीं रहा है। मामला सिर्फ खर्च के हिसाब का है, जिस पर नये जम्मू-कश्मीर में खास नजर रखी जाएगी। प्रो. दीपांकर के अनुसार केंद्रीय फंडिंग के खुर्दबुर्द वाले प्रदेश में किसी एक्सपेंडिचर सचिव को प्रशासनिक कमान देने के पीछे व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन की मंशा नजर आती है।
173 वर्षों में पहली बार बदला जम्मू-कश्मीर का भूगोल
अंग्रेजों के साथ महाराजा गुलाब सिंह की वर्ष 1846 में हुई अमृतसर संधि के बाद जम्मू-कश्मीर का भूगोल अधिकृत रूप से पहली बार बदलेगा। जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है वह आज भी भारत का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के नक्शे में पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) और गिलगित व बाल्टिस्तान भी शामिल हैं। लेकिन दो केंद्र शासित प्रदेश बनने से पहली बार जम्मू-कश्मीर का नक्शे में भी विभाजन हो जाएगा।
जम्मू-यूनिवर्सिटी में प्रो. दीपांकर सेन गुप्ता के अनुसार वर्ष 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय होने के दौरान महाराजा की रियासत के अधीन कहे जाने वाले छितरल जिले (महतार आफ छितराल) को पाकिस्तान ने खैबर पख्तूनख्वा में मिला लिया। ऐसे में इसे महाराजा की रियासत से अलग मान लिया गया। लेकिन अधिकृत रूप से जम्मू-कश्मीर के नक्शे में 173 वर्ष बाद पहली मर्तबा बदलाव होगा।
जम्मू-यूनिवर्सिटी में प्रो. दीपांकर सेन गुप्ता के अनुसार वर्ष 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय होने के दौरान महाराजा की रियासत के अधीन कहे जाने वाले छितरल जिले (महतार आफ छितराल) को पाकिस्तान ने खैबर पख्तूनख्वा में मिला लिया। ऐसे में इसे महाराजा की रियासत से अलग मान लिया गया। लेकिन अधिकृत रूप से जम्मू-कश्मीर के नक्शे में 173 वर्ष बाद पहली मर्तबा बदलाव होगा।
106 केंद्रीय कानून हुए लागू
केंद्र शासित प्रदेश बनते ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में संसद की ओर से पारित 106 केंद्रीय कानून तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं। इसमें शिक्षा का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून शामिल हैं। इसके अलावा यूटी बनने पर जम्मू-कश्मीर के 164 प्रदेश स्तर पर बनाए गए कानून खत्म हो गए हैं जबकि राज्य विधानसभा से पारित 166 कानूनों को यथावत रखा गया है।
सुकून के इंतजार में है डल
राज्य पुनर्गठन की सबसे बड़ी दलील अमन बहाली दी गई है। केंद्र ने आतंकवाद, अलगाववाद और भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए पुनर्गठन को कारगर फार्मूला करार दिया है। अब देखना होगा कि अशांत रहने वाली घाटी और उसका प्रतीक केंद्र डलझील को स्थायी रूप से सुकून नसीब हो पाता है या नहीं।
अल्पसंख्यकों को मिलेंगे लाभ
जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक आयोग न होने के चलते बहुसंख्यक आबादी को अल्पसंख्यकों के लिए बनी योजनाओं का लाभ मिलता रहा है। यूटी बनते ही अल्पसंख्यक समुदाय की प्रदेश आधारित परिभाषा लागू होगी जिसमें मुस्लिम बहुल प्रदेश जम्मू-कश्मीर के अन्य समुदायों को अल्पसंख्यकों की सुविधाएं मिलेंगी।
सुकून के इंतजार में है डल
राज्य पुनर्गठन की सबसे बड़ी दलील अमन बहाली दी गई है। केंद्र ने आतंकवाद, अलगाववाद और भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए पुनर्गठन को कारगर फार्मूला करार दिया है। अब देखना होगा कि अशांत रहने वाली घाटी और उसका प्रतीक केंद्र डलझील को स्थायी रूप से सुकून नसीब हो पाता है या नहीं।
अल्पसंख्यकों को मिलेंगे लाभ
जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक आयोग न होने के चलते बहुसंख्यक आबादी को अल्पसंख्यकों के लिए बनी योजनाओं का लाभ मिलता रहा है। यूटी बनते ही अल्पसंख्यक समुदाय की प्रदेश आधारित परिभाषा लागू होगी जिसमें मुस्लिम बहुल प्रदेश जम्मू-कश्मीर के अन्य समुदायों को अल्पसंख्यकों की सुविधाएं मिलेंगी।
विधान परिषद समेत सात आयोगों का अस्तित्व खत्म
जम्मू कश्मीर विधान परिषद और राज्य के सात आयोगों का अस्तित्व खत्म हो गया है। विधान परिषद में चेयरमैन समेत 22 विधान परिषद के सदस्यों के अलावा 161 कर्मचारी और अधिकारी काम कर रहे थे। कर्मचारियों को जीएडी में शिफ्ट कर दिया गया है। राज्य जवाबदेही आयोग भी खत्म हो गया है। आयोग में 62 कर्मचारी और अधिकारी कार्यरत थे।
इसके अलावा राज्य मानवाधिकार आयोग को खत्म किया गया है। यहां पर चेयरमैन व सदस्यों के अलावा 71 अधिकारी व कर्मचारी थे। सूचना आयोग में 23 अधिकारी व कर्मचारी काम कर रहे थे। महिला व शिशु कल्याण आयोग, दिव्यांग कल्याण आयोग का भी अस्तित्व केंद्र शासित प्रदेश में नहीं रहेगा। राज्य विद्युत नियामक आयोग, उपभोक्ता आयोग भी निष्क्रिय हो गए हैं।
इन आयोगों में कार्यरत अधिकारियों व कर्मचारियों को भी अब अन्य विभागों में शिफ्ट किया जा रहा है। विधान परिषद की संपत्ति को एस्टेट विभाग व वाहनों को स्टेट मोटर गैरेज के सुपुर्द किया जा रहा है। ऐसे ही बंद हो रहे सात आयोगों की संपत्ति को अन्य विभागों व वाहनों को स्टेट मोटर गैरेज को सुपुर्द किया जा रहा है। सूचना के अनुसार 150 के करीब वाहन स्टेट मोटर गैरेज के बेड़े में बढ़ जाएंगे।
इसके अलावा राज्य मानवाधिकार आयोग को खत्म किया गया है। यहां पर चेयरमैन व सदस्यों के अलावा 71 अधिकारी व कर्मचारी थे। सूचना आयोग में 23 अधिकारी व कर्मचारी काम कर रहे थे। महिला व शिशु कल्याण आयोग, दिव्यांग कल्याण आयोग का भी अस्तित्व केंद्र शासित प्रदेश में नहीं रहेगा। राज्य विद्युत नियामक आयोग, उपभोक्ता आयोग भी निष्क्रिय हो गए हैं।
इन आयोगों में कार्यरत अधिकारियों व कर्मचारियों को भी अब अन्य विभागों में शिफ्ट किया जा रहा है। विधान परिषद की संपत्ति को एस्टेट विभाग व वाहनों को स्टेट मोटर गैरेज के सुपुर्द किया जा रहा है। ऐसे ही बंद हो रहे सात आयोगों की संपत्ति को अन्य विभागों व वाहनों को स्टेट मोटर गैरेज को सुपुर्द किया जा रहा है। सूचना के अनुसार 150 के करीब वाहन स्टेट मोटर गैरेज के बेड़े में बढ़ जाएंगे।
केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में बढ़ेंगी 7 सीटें
केंद्र शासित जम्मू कश्मीर के तौर पर अस्तित्व में आने पर विधानसभा सीटों के परिसीमन का रास्ता साफ हो जाएगा और सीटों की संख्या बढ़कर 114 हो जाएगी। जम्मू कश्मीर विधानसभा के 2026 तक विधानसभा सीटों का परिसीमन न करने का फैसला खारिज हो जाएगा। राज्य पुनर्गठन एक्ट के तहत चुनाव आयोग परिसीमन आयोग का गठन कर पाएगा।
राज्य के तौर पर जम्मू कश्मीर विधानसभा में विधानसभा सीटों की संख्या 87 थी। 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के लिए आरक्षित थीं। इनकी कु़ल संख्या 111 बनती है। लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने से संभाग की चार विधानसभा सीटों की संख्या केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में कम हो गई हैं। जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन एक्ट के तहत विधानसभा सीटों की संख्या कम होने के बजाए अब बढ़ जाएगी।
89 सीटों में अगर लद्दाख की सीटें कम कर दें तो संख्या 83 रहती है। इसमें 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के जोड़ें तो सीटों की संख्या 107 तक पहुंच जाती है। पुनर्गठन एक्ट के तहत परिसीमन कर सात ओर सीटें जम्मू कश्मीर विधानसभा में बढ़ाई जाएंगी। जम्मू कश्मीर विधानसभा की सीटों की संख्या 114 तक पहुंचेगी। इनमें से 90 सीटों पर अगला विधानसभा चुनाव होने के पूरे आसार हैं।
राज्य के तौर पर जम्मू कश्मीर विधानसभा में विधानसभा सीटों की संख्या 87 थी। 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के लिए आरक्षित थीं। इनकी कु़ल संख्या 111 बनती है। लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने से संभाग की चार विधानसभा सीटों की संख्या केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में कम हो गई हैं। जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन एक्ट के तहत विधानसभा सीटों की संख्या कम होने के बजाए अब बढ़ जाएगी।
89 सीटों में अगर लद्दाख की सीटें कम कर दें तो संख्या 83 रहती है। इसमें 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के जोड़ें तो सीटों की संख्या 107 तक पहुंच जाती है। पुनर्गठन एक्ट के तहत परिसीमन कर सात ओर सीटें जम्मू कश्मीर विधानसभा में बढ़ाई जाएंगी। जम्मू कश्मीर विधानसभा की सीटों की संख्या 114 तक पहुंचेगी। इनमें से 90 सीटों पर अगला विधानसभा चुनाव होने के पूरे आसार हैं।
विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का हो जाएगा
केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में विधानसभा का कार्यकाल छह साल के बजाए पांच साल का होगा। जम्मू कश्मीर पुनर्गठन एक्ट में इसको स्पष्ट किया गया है। लोकसभा और राज्यसभा में एक्ट पारित हो चुका है जिसे वीरवार से लागू किया जाएगा।
सांसदों की संख्या पहले जितनी ही रहेगी
विधानसभा से अलग सांसदों की संख्या जम्मू कश्मीर में पहले की तरह ही रहेगी। वर्तमान समय में जम्मू कश्मीर और लद्दाख में लोकसभा के छह और राज्य सभा के चार सांसद हैं। राज्य पुनर्गठन एक्ट के तहत इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है।
73वें और 74वां संशोधन केंद्र के विवेक पर निर्भर
केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में 73वां और 74वां संशोधन तत्काल प्रभाव से लागू हो या इसके बाद में लागू किया जाएगा। यह केंद्र सरकार के विवेक पर निर्भर करेगा।
‘उच्च शिक्षा में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा’
राज्य को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने को लेकर विभागों में होने वाले बदलाव को लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अनुच्छेद 370 और 35 ए हटने के बाद सभी विभागों में बदलाव किए जाएंगे। उच्च शिक्षा विभाग में भी कई बदलाव होने की संभावना है। जिस कारण उच्च शिक्षा विभाग में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी।
उच्च शिक्षा विभाग के स्पेशल सेक्रेटरी चौधरी राशिद आजम इंकलाबी ने बताया कि केंद्र शासित प्रदेश में उच्च शिक्षा में जो कानून लागू होते हैं वे सब जम्मू व कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लागू किए जाएंगे। राज्य के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद किसी भी कॉलेज में दाखिला लेने या नौकरी लेने के लिए उम्मीदवार के लिए प्रतिस्पर्धा दोगुनी हो जाएगी। किसी भी उच्च शिक्षा संस्थान में दाखिला लेने या नौकरी के लिए देशभर से उम्मीदवार आवेदन कर पाएंगे। उच्च शिक्षा संस्थानों में मेडिकल संस्थान, टेक्निकल संस्थान आदि भी शामिल रहेंगे।
सांसदों की संख्या पहले जितनी ही रहेगी
विधानसभा से अलग सांसदों की संख्या जम्मू कश्मीर में पहले की तरह ही रहेगी। वर्तमान समय में जम्मू कश्मीर और लद्दाख में लोकसभा के छह और राज्य सभा के चार सांसद हैं। राज्य पुनर्गठन एक्ट के तहत इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है।
73वें और 74वां संशोधन केंद्र के विवेक पर निर्भर
केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में 73वां और 74वां संशोधन तत्काल प्रभाव से लागू हो या इसके बाद में लागू किया जाएगा। यह केंद्र सरकार के विवेक पर निर्भर करेगा।
‘उच्च शिक्षा में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा’
राज्य को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने को लेकर विभागों में होने वाले बदलाव को लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अनुच्छेद 370 और 35 ए हटने के बाद सभी विभागों में बदलाव किए जाएंगे। उच्च शिक्षा विभाग में भी कई बदलाव होने की संभावना है। जिस कारण उच्च शिक्षा विभाग में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी।
उच्च शिक्षा विभाग के स्पेशल सेक्रेटरी चौधरी राशिद आजम इंकलाबी ने बताया कि केंद्र शासित प्रदेश में उच्च शिक्षा में जो कानून लागू होते हैं वे सब जम्मू व कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लागू किए जाएंगे। राज्य के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद किसी भी कॉलेज में दाखिला लेने या नौकरी लेने के लिए उम्मीदवार के लिए प्रतिस्पर्धा दोगुनी हो जाएगी। किसी भी उच्च शिक्षा संस्थान में दाखिला लेने या नौकरी के लिए देशभर से उम्मीदवार आवेदन कर पाएंगे। उच्च शिक्षा संस्थानों में मेडिकल संस्थान, टेक्निकल संस्थान आदि भी शामिल रहेंगे।
आज से अदालतों में रजिस्ट्रेशन बंद, 40 पब्लिक प्रासिक्यूटर के पद भी खत्म
जम्मू कश्मीर की अदालतों में वीरवार से बहुत कुछ बदल जाएगा। केंद्र के कानून सीधे तौर पर जम्मू कश्मीर में लागू होंगे। अदालतों में आरपीसी की जगह आईपीसी के तहत आपराधिक मामलों पर सुनवाई होगी। अदालतों में अचल संपत्ति मामलों का रजिस्ट्रेशन नहीं होगा। 40 से अधिक पब्लिक प्रासिक्यूटर के पद खत्म हो जाएंगे। हालांकि जम्मू कश्मीर और लद्दाख की न्यायिक व्यवस्था के लिए ही साझा हाईकोर्ट होगा।
जानकारी के अनुसार सेल डीड, गिफ्ट डीड, जमीनों और संपत्ति का रजिस्ट्र्रेशन सहित अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों का पंजीकरण अब तक अदालतों में न्यायिक अधिकारी करते थे। अब यह हक तहसीलदार, एसडीएम, एसीआर अधिकारियों को दिए गए हैं। हाईकोर्ट से जुड़े वरिष्ठ वकीलों ने बताया कि अब तक पंजीकरण की व्यवस्था अदालतों में थी। क्योंकि विशेष दर्जे के तहत सरकार की तरफ से यह व्यवस्था की गई थी। अब केंद्र शासित प्रदेश बनने से यह व्यवस्था खत्म हो गई है।
वकील समुदाय को होगा भारी नुकसान
केंद्र शासित प्रदेश बनने से राज्य के वकीलों को बड़ा नुकसान हुआ है। सीधे तौर पर न्यायिक व्यवस्था से रजिस्ट्र्रेशन को एग्जीक्यूटिव के पास शिफ्ट कर दिया गया है। जो वकीलों की आय पर हमला है। वकीलों का मानना है कि इससे न सिर्फ भ्रष्टाचार बढ़ेगा और आम पब्लिक को नुकसान होगा। बल्कि वकीलों की आय भी नहीं बचेगी। पहले ही यह एक सीमित राज्य है। केंद्र शासित प्रदेश बनने से अब केंद्र का एक्ट लागू होगा। जिसके तहत रजिस्ट्रेशन एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट के पास होता है।
जम्मू की बार एसोसिएशन ने बुधवार को इसे लेकर कामकाज ठप रखा। साथ ही एग्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक हुई। बैठक में निर्णय लिया गया कि लेफ्टिनेंट गवर्नर और चीफ जस्टिस से वकीलों का दल मिलेगा। 14 नवंबर को दोबारा बैठक करके अगली रणनीति तैयार करेंगे। बार एसोसिएशन के उप प्रधान रोहित भगत का कहना है कि इससे वकीलों की आय पर बहुत फर्क पड़ेगा।
वह चाहते हैं कि रजिस्ट्रेशन बेशक एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेटों के पास रहे। लेकिन रजिस्ट्र्र्रेशन अदालत परिसर में ही हो। यहां पर पहले से सेटअप तैयार हैं। एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट अदालतों में ही बैठें। कोई भी रजिस्ट्रेशन करे, अदालतों में करे। एसोसिएशन के महासचिव अभिषेक वजीर का कहना है कि लिटिगेशन पहले ही बहुत सीमित है। रजिस्ट्रेशन शिफ्ट होने से तो वकीलों का काम ही खत्म हो जाएगा। आय का कोई साधन नहीं रहेगा। इससे सिर्फ हम पर असर ही नहीं पड़ेगा। बल्कि आम पब्लिक पर भी असर पड़ेगा। वह लोग अपनी बात चीफ जस्टिस के समक्ष रखेंगे।
जानकारी के अनुसार सेल डीड, गिफ्ट डीड, जमीनों और संपत्ति का रजिस्ट्र्रेशन सहित अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों का पंजीकरण अब तक अदालतों में न्यायिक अधिकारी करते थे। अब यह हक तहसीलदार, एसडीएम, एसीआर अधिकारियों को दिए गए हैं। हाईकोर्ट से जुड़े वरिष्ठ वकीलों ने बताया कि अब तक पंजीकरण की व्यवस्था अदालतों में थी। क्योंकि विशेष दर्जे के तहत सरकार की तरफ से यह व्यवस्था की गई थी। अब केंद्र शासित प्रदेश बनने से यह व्यवस्था खत्म हो गई है।
वकील समुदाय को होगा भारी नुकसान
केंद्र शासित प्रदेश बनने से राज्य के वकीलों को बड़ा नुकसान हुआ है। सीधे तौर पर न्यायिक व्यवस्था से रजिस्ट्र्रेशन को एग्जीक्यूटिव के पास शिफ्ट कर दिया गया है। जो वकीलों की आय पर हमला है। वकीलों का मानना है कि इससे न सिर्फ भ्रष्टाचार बढ़ेगा और आम पब्लिक को नुकसान होगा। बल्कि वकीलों की आय भी नहीं बचेगी। पहले ही यह एक सीमित राज्य है। केंद्र शासित प्रदेश बनने से अब केंद्र का एक्ट लागू होगा। जिसके तहत रजिस्ट्रेशन एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट के पास होता है।
जम्मू की बार एसोसिएशन ने बुधवार को इसे लेकर कामकाज ठप रखा। साथ ही एग्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक हुई। बैठक में निर्णय लिया गया कि लेफ्टिनेंट गवर्नर और चीफ जस्टिस से वकीलों का दल मिलेगा। 14 नवंबर को दोबारा बैठक करके अगली रणनीति तैयार करेंगे। बार एसोसिएशन के उप प्रधान रोहित भगत का कहना है कि इससे वकीलों की आय पर बहुत फर्क पड़ेगा।
वह चाहते हैं कि रजिस्ट्रेशन बेशक एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेटों के पास रहे। लेकिन रजिस्ट्र्र्रेशन अदालत परिसर में ही हो। यहां पर पहले से सेटअप तैयार हैं। एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट अदालतों में ही बैठें। कोई भी रजिस्ट्रेशन करे, अदालतों में करे। एसोसिएशन के महासचिव अभिषेक वजीर का कहना है कि लिटिगेशन पहले ही बहुत सीमित है। रजिस्ट्रेशन शिफ्ट होने से तो वकीलों का काम ही खत्म हो जाएगा। आय का कोई साधन नहीं रहेगा। इससे सिर्फ हम पर असर ही नहीं पड़ेगा। बल्कि आम पब्लिक पर भी असर पड़ेगा। वह लोग अपनी बात चीफ जस्टिस के समक्ष रखेंगे।
केंद्र शासित प्रदेश बनने पर छंटेगा स्टेट सब्जेक्ट का संशय
केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू कश्मीर में स्टेट सब्जेक्ट का असमंजस भी खत्म होगा। सेना, पुलिस सहित अन्य विभागों में होने वाली भर्तियों में हिस्सा लेने के लिए अब भी स्टेट सब्जेक्ट देना पड़ रहा है। संबंधित विभाग के अधिकारियों का कहना है कि 31 अक्तूबर के बाद ही साफ हो पाएगा कि क्या बदलाव होता है। फिलहाल स्टेट सब्जेक्ट लिया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार पहले से अधिसूचित सेना और पुलिस की भर्ती में आवेदक से स्टेट सब्जेक्ट लिया जा रहा है। इस वजह से हजारों युवा भर्ती में हिस्सा नहीं ले सके हैं। दमकल विभाग में हुई भर्ती में भी स्टेट सब्जेक्ट न देने वाले उम्मीदवार हिस्सा नहीं ले सके। खासकर रिफ्यूजी युवा भर्ती से महरूम रह गए। युवा संजीव ने कहा कि तीन भर्तियां निकल गई हैं।
वह किसी में भी हिस्सा नहीं ले पाया है। इनमें स्टेट सब्जेक्ट अनिवार्य बताया गया है। सीमावर्ती इलाके सुचेतगढ़ निवासी सोहन का कहना है कि बार्डर बटालियन के लिए होने वाली भर्ती में वह आवेदन नहीं कर सका। क्योंकि इसके लिए स्टेट सब्जेक्ट मांगा जा रहा है। युवा वर्ग बेसब्री से इंतजार कर रहा है कि 31 अक्तूबर कब हो। इसके बाद देखना होगा कि स्टेट सब्जेक्ट को लेकर क्या निर्देश आते हैं।
जानकारी के अनुसार पहले से अधिसूचित सेना और पुलिस की भर्ती में आवेदक से स्टेट सब्जेक्ट लिया जा रहा है। इस वजह से हजारों युवा भर्ती में हिस्सा नहीं ले सके हैं। दमकल विभाग में हुई भर्ती में भी स्टेट सब्जेक्ट न देने वाले उम्मीदवार हिस्सा नहीं ले सके। खासकर रिफ्यूजी युवा भर्ती से महरूम रह गए। युवा संजीव ने कहा कि तीन भर्तियां निकल गई हैं।
वह किसी में भी हिस्सा नहीं ले पाया है। इनमें स्टेट सब्जेक्ट अनिवार्य बताया गया है। सीमावर्ती इलाके सुचेतगढ़ निवासी सोहन का कहना है कि बार्डर बटालियन के लिए होने वाली भर्ती में वह आवेदन नहीं कर सका। क्योंकि इसके लिए स्टेट सब्जेक्ट मांगा जा रहा है। युवा वर्ग बेसब्री से इंतजार कर रहा है कि 31 अक्तूबर कब हो। इसके बाद देखना होगा कि स्टेट सब्जेक्ट को लेकर क्या निर्देश आते हैं।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में आरपीसी खत्म, आईपीसी लागू
जम्मू कश्मीर और लद्दाख दोनों प्रदेशों में आज वीरवार से इंडियन पैनल कोड(आईपीसी) के तहत आपराधिक मामले दर्ज होंगे। जम्मू कश्मीर और लद्दाख पुलिस अब अपने-अपने प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर को रिपोर्ट करेगी। हालांकि जम्मू कश्मीर में फिलहाल अभी कुछ समय के लिए पुलिस के जो अफसर जहां तैनात हैं, वहीं पर तैनात रहेंगे। कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं होगा।
आज से लद्दाख पुलिस भी अलग होगी। हालांकि अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि लद्दाख पुलिस किसको रिपोर्ट करेगी। सूत्रों की मानें तो दोनों प्रदेशों की पुलिस व्यवस्था फिलहाल जम्मू कश्मीर पुलिस के पास ही होगी। डीजीपी दोनों प्रदेशों के लेफ्टिनेंट गवर्नर को रिपोर्ट करेंगे।
अब तक जम्मू कश्मीर और लद्दाख में रणबीर पेनल कोड (आरपीसी) के तहत केस दर्ज होते थे।
आरपीसी में आईपीसी की तुलना में कुछ विशेष अधिकार थे, जो अब खत्म हो जाएंगे। अब तक प्रदेश में कोड आफ क्रिमिनल प्रोसीजर आरपीसी के तहत काम चलता था। अब आईपीसी के तहत चलेगा। जम्मू कश्मीर और लद्दाख के 227 थानों में यह व्यवस्था लागू होगी।
कानूनी तौर पर आईपीसी लागू
फिलहाल कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अफसर जहां तैनात हैं, वहीं पर रहेंगे। यह हाल फिलहाल की व्यवस्था है। जिसका पुनर्गठन एक्ट में भी जिक्र है। पूरी व्यवस्थाएं पटरी पर लाने के लिए एक साल तक समय निर्धारित किया गया है। रही बात आरपीसी की जगह आईपीसी की, तो कानूनी तौर पर अब आईपीसी के तहत ही केस दर्ज होंगे। कुछ दिनों के भीतर पूरी स्थिति स्पष्ट होगी। एके चौधरी, एडीजीपी, कोआर्डिनेशन, जेके पुलिस
लद्दाख पुलिस पर अब भी सस्पेंस
आज से लद्दाख में कानूनी तौर पर अपनी पुलिस होगी। लेकिन यह पुलिस जम्मू कश्मीर पुलिस के अधीन रहेगी या फिर इसके लिए कोई अलग अधिकारी होगा? इस पर अभी सस्पेंस खत्म नहीं हुआ है। क्योंकि लद्दाख में सिर्फ दो जिले हैं। लेह और कारगिल जिलों में एसएसपी स्तर के अधिकारी हैं। जो इस समय कश्मीर के आईजी को रिपोर्ट करते हैं।
लद्दाख पुलिस के लिए कोई अलग से पद नहीं सृजित किया गया है। किसी आईजी या डीआईजी की तैनाती नहीं हुई है। माना जा रहा है कि जब तक लद्दाख पुलिस का पूरी तरह से गठन नहीं होता, यह जेके पुलिस के अधीन ही काम करेगी।
आज से लद्दाख पुलिस भी अलग होगी। हालांकि अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि लद्दाख पुलिस किसको रिपोर्ट करेगी। सूत्रों की मानें तो दोनों प्रदेशों की पुलिस व्यवस्था फिलहाल जम्मू कश्मीर पुलिस के पास ही होगी। डीजीपी दोनों प्रदेशों के लेफ्टिनेंट गवर्नर को रिपोर्ट करेंगे।
अब तक जम्मू कश्मीर और लद्दाख में रणबीर पेनल कोड (आरपीसी) के तहत केस दर्ज होते थे।
आरपीसी में आईपीसी की तुलना में कुछ विशेष अधिकार थे, जो अब खत्म हो जाएंगे। अब तक प्रदेश में कोड आफ क्रिमिनल प्रोसीजर आरपीसी के तहत काम चलता था। अब आईपीसी के तहत चलेगा। जम्मू कश्मीर और लद्दाख के 227 थानों में यह व्यवस्था लागू होगी।
कानूनी तौर पर आईपीसी लागू
फिलहाल कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अफसर जहां तैनात हैं, वहीं पर रहेंगे। यह हाल फिलहाल की व्यवस्था है। जिसका पुनर्गठन एक्ट में भी जिक्र है। पूरी व्यवस्थाएं पटरी पर लाने के लिए एक साल तक समय निर्धारित किया गया है। रही बात आरपीसी की जगह आईपीसी की, तो कानूनी तौर पर अब आईपीसी के तहत ही केस दर्ज होंगे। कुछ दिनों के भीतर पूरी स्थिति स्पष्ट होगी। एके चौधरी, एडीजीपी, कोआर्डिनेशन, जेके पुलिस
लद्दाख पुलिस पर अब भी सस्पेंस
आज से लद्दाख में कानूनी तौर पर अपनी पुलिस होगी। लेकिन यह पुलिस जम्मू कश्मीर पुलिस के अधीन रहेगी या फिर इसके लिए कोई अलग अधिकारी होगा? इस पर अभी सस्पेंस खत्म नहीं हुआ है। क्योंकि लद्दाख में सिर्फ दो जिले हैं। लेह और कारगिल जिलों में एसएसपी स्तर के अधिकारी हैं। जो इस समय कश्मीर के आईजी को रिपोर्ट करते हैं।
लद्दाख पुलिस के लिए कोई अलग से पद नहीं सृजित किया गया है। किसी आईजी या डीआईजी की तैनाती नहीं हुई है। माना जा रहा है कि जब तक लद्दाख पुलिस का पूरी तरह से गठन नहीं होता, यह जेके पुलिस के अधीन ही काम करेगी।
15 फीसदी पर अटका जम्मू-कश्मीर विद्युत ऊर्जा में लगाएगा बड़ी छलांग
देश भर में पनबिजली उत्पादन क्षमता के लिहाज से अग्रणी राज्यों में शुमार जम्मू-कश्मीर के एनर्जी सेक्टर को अब केंद्रीय फंडिंग के इंजन से रफ्तार मिलेगी। जम्मू-कश्मीर विद्युत विकास विभाग और जम्मू-कश्मीर स्टेट पावर डेवलपमेंट कारपोरेशन (जेकेएसपीडीसी) के पुनर्गठन का आदेश पहले ही जारी हो चुका है।
यूटी बनने पर पुनर्गठन के प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएंगे। इससे बिजली चोरी रोकने, प्राथमिकताओं पर काम तेज होने से पारदर्शिता में सुधार होगा। बिजली सुधार कार्यक्रम न होने की वजह से केंद्र की फंडिंग भी रुकी थी। विभाग के पुनर्गठन से एक ही झटके में व्यापक सुधार की नींव रखी जा चुकी है। इससे कामकाज में सुधार के साथ केंद्रीय फंडिंग के द्वार भी खुल जाएंगे।
दरअसल, जम्मू-कश्मीर राज्य में पनबिजली तैयार करने की कुल 20 हजार मेगावाट तक की क्षमता है। इसमें से 16 हजार से ज्यादा मेगावाट क्षमता की पहचान की जा चुकी है। इसकी तुलना में जम्मू-कश्मीर केंद्रीय और राज्य की परियोजनाओं से बमुश्किल 3300 मेगावाट बिजली ही तैयार कर पा रहा है। क्षमता के लिहाज से यह करीब 15 फीसदी बिजली ही बन पा रही है।
हालांकि लद्दाख के अलग यूटी बनने से अब जम्मू-कश्मीर में 16 हजार मेगावाट की पनबिजली तैयार करने की क्षमता ही रह जाएगी। जेकेएसपीडीसी के उच्च पदस्थ अधिकारी के अनुसार प्रदेश सरकार को केंद्रीय सरकार की ओर से बिजली सुधार और कार्य के लिए सुगम माहौल तैयार करने के निर्देश दिए जाते रहे हैं, लेकिन अपेक्षा के अनुरूप सुधार नहीं हुए। यूटी बनने पर अर्थव्यवस्था के लिहाज से सबसे बड़ा बदलाव विद्युत उत्पादन क्षेत्र में देखने को मिलेगा।
इस वजह से था सुस्ती का आलम
जम्मू-कश्मीर में जेकेएसपीडीसी की 22, एनएचपीसी की 7 और निजी क्षेत्र की चार बिजली परियोजनाएं चल रही हैं। अनुच्छेद 370 की वजह से केंद्रीय निगम एनएचपीसी को काम करने का खुला हाथ नहीं था। यहां तक कि एनएचपीसी के अधीन चल रहीं बिजली परियोजनाओं को वापस राज्य को देने की मांग सरकारी स्तर पर उठाई जाती रही। इसके चलते एनएचपीसी की ओर से नई परियोजनाओं में रुझान कम हुआ।
नहीं हो पाती थी बोर्ड की बैठक
जेकेएसपीडीसी की ओर से अहम फैसले लेने के लिए बोर्ड बैठक की जरूरत होती है। कायदे से हर माह में एक बैठक का होना जरूरी होता है। लेकिन कई मर्तबा तो दो वर्ष तक बोर्ड की कोई बैठक नहीं हो पाई। ऐसे में नई बिजली परियोजनाओं पर फैसले अटके रहे। राज्य पुनर्गठन के साथ बिजली महकमे का भी पुनर्गठन कर दिया गया है। बोर्ड का अध्यक्ष महकमे के सचिव को दिया गया है। अब बोर्ड बैठक का आयोजन और परियोजनाओं को मंजूरी देना आसान हो जाएगा।
हिमाचल कर रहा दोहन, जम्मू-कश्मीर पिछड़ा
हिमालयी राज्य होने की वजह से हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में जलसंसाधन की भरमार है। जम्मू-कश्मीर में पनबिजली उत्पादन की कुल क्षमता 20 हजार मेगावाट है लेकिन दोहन के मामले में मुश्किल से 15 फीसदी पर ही काम हो पाया है। वहीं हिमाचल प्रदेश में करीब साढ़े 27 हजार मेगावाट पनबिजली बनाने की क्षमता है जिसमें से हिमाचल क्षमता का एक तिहाई से ज्यादा की बिजली बनाकर अन्य राज्यों को बेच रहा है।
केंद्र की पहले से थी नजर
विद्युत उत्पादन की बड़ी संभावनाओं वाले राज्य जम्मू-कश्मीर पर केंद्र की पहले से नजर रही है। देशभर में सबसे बड़ी परियोजनाओं में शुमार सावलाकोट प्रोजेक्ट (1856 मेगावाट) विचाराधीन है। इसकी डीपीआर भी तैयार हो चुकी है। केंद्र की ओर से कई बार प्रदेश सरकार को इस परियोजना को अपने अधीन लेने के प्रस्ताव दिए जा चुके हैं लेकिन प्रदेश सरकार बीस वर्ष से अधर में लटकी इस बड़ी परियोजना को देने के लिए तैयार नहीं हुई। यूटी बनने पर सावलाकोट समेत रतले (850 मेगावाट) और अन्य कई परियोजनाएं सीधे केंद्र के अधीन हो जाएंगी।
पाकिस्तान का पानी रोकना होगा आसान
सिंधु जल समझौते के अनुसार भारत के सौ फीसदी नियंत्रण वाले नदी नालों का पानी पाकिस्तान जाने से रोकना अब आसान हो जाएगा। कठुआ जिले के उज्ज दरिया में प्रस्तावित 180 मेगावाट क्षमता वाली बहुद्देशीय पनबिजली परियोजना पहले से ही केंद्र की प्राथमिकता है। लेकिन यह प्रोजेक्ट पहले प्रदेश सरकार का था, जिससे इसके क्रियान्वयन में अड़चनें आती रहीं। इस दरिया का लगभग सारा पानी पाकिस्तान चला जाता है। बहुद्देशीय परियोजना के मूर्त रूप लेने से पानी को जम्मू-कश्मीर समेत अन्य राज्यों में सप्लाई किया जाएगा। इसके लिए पहले से योजना विचाराधीन है।
यूटी बनने पर पुनर्गठन के प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएंगे। इससे बिजली चोरी रोकने, प्राथमिकताओं पर काम तेज होने से पारदर्शिता में सुधार होगा। बिजली सुधार कार्यक्रम न होने की वजह से केंद्र की फंडिंग भी रुकी थी। विभाग के पुनर्गठन से एक ही झटके में व्यापक सुधार की नींव रखी जा चुकी है। इससे कामकाज में सुधार के साथ केंद्रीय फंडिंग के द्वार भी खुल जाएंगे।
दरअसल, जम्मू-कश्मीर राज्य में पनबिजली तैयार करने की कुल 20 हजार मेगावाट तक की क्षमता है। इसमें से 16 हजार से ज्यादा मेगावाट क्षमता की पहचान की जा चुकी है। इसकी तुलना में जम्मू-कश्मीर केंद्रीय और राज्य की परियोजनाओं से बमुश्किल 3300 मेगावाट बिजली ही तैयार कर पा रहा है। क्षमता के लिहाज से यह करीब 15 फीसदी बिजली ही बन पा रही है।
हालांकि लद्दाख के अलग यूटी बनने से अब जम्मू-कश्मीर में 16 हजार मेगावाट की पनबिजली तैयार करने की क्षमता ही रह जाएगी। जेकेएसपीडीसी के उच्च पदस्थ अधिकारी के अनुसार प्रदेश सरकार को केंद्रीय सरकार की ओर से बिजली सुधार और कार्य के लिए सुगम माहौल तैयार करने के निर्देश दिए जाते रहे हैं, लेकिन अपेक्षा के अनुरूप सुधार नहीं हुए। यूटी बनने पर अर्थव्यवस्था के लिहाज से सबसे बड़ा बदलाव विद्युत उत्पादन क्षेत्र में देखने को मिलेगा।
इस वजह से था सुस्ती का आलम
जम्मू-कश्मीर में जेकेएसपीडीसी की 22, एनएचपीसी की 7 और निजी क्षेत्र की चार बिजली परियोजनाएं चल रही हैं। अनुच्छेद 370 की वजह से केंद्रीय निगम एनएचपीसी को काम करने का खुला हाथ नहीं था। यहां तक कि एनएचपीसी के अधीन चल रहीं बिजली परियोजनाओं को वापस राज्य को देने की मांग सरकारी स्तर पर उठाई जाती रही। इसके चलते एनएचपीसी की ओर से नई परियोजनाओं में रुझान कम हुआ।
नहीं हो पाती थी बोर्ड की बैठक
जेकेएसपीडीसी की ओर से अहम फैसले लेने के लिए बोर्ड बैठक की जरूरत होती है। कायदे से हर माह में एक बैठक का होना जरूरी होता है। लेकिन कई मर्तबा तो दो वर्ष तक बोर्ड की कोई बैठक नहीं हो पाई। ऐसे में नई बिजली परियोजनाओं पर फैसले अटके रहे। राज्य पुनर्गठन के साथ बिजली महकमे का भी पुनर्गठन कर दिया गया है। बोर्ड का अध्यक्ष महकमे के सचिव को दिया गया है। अब बोर्ड बैठक का आयोजन और परियोजनाओं को मंजूरी देना आसान हो जाएगा।
हिमाचल कर रहा दोहन, जम्मू-कश्मीर पिछड़ा
हिमालयी राज्य होने की वजह से हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में जलसंसाधन की भरमार है। जम्मू-कश्मीर में पनबिजली उत्पादन की कुल क्षमता 20 हजार मेगावाट है लेकिन दोहन के मामले में मुश्किल से 15 फीसदी पर ही काम हो पाया है। वहीं हिमाचल प्रदेश में करीब साढ़े 27 हजार मेगावाट पनबिजली बनाने की क्षमता है जिसमें से हिमाचल क्षमता का एक तिहाई से ज्यादा की बिजली बनाकर अन्य राज्यों को बेच रहा है।
केंद्र की पहले से थी नजर
विद्युत उत्पादन की बड़ी संभावनाओं वाले राज्य जम्मू-कश्मीर पर केंद्र की पहले से नजर रही है। देशभर में सबसे बड़ी परियोजनाओं में शुमार सावलाकोट प्रोजेक्ट (1856 मेगावाट) विचाराधीन है। इसकी डीपीआर भी तैयार हो चुकी है। केंद्र की ओर से कई बार प्रदेश सरकार को इस परियोजना को अपने अधीन लेने के प्रस्ताव दिए जा चुके हैं लेकिन प्रदेश सरकार बीस वर्ष से अधर में लटकी इस बड़ी परियोजना को देने के लिए तैयार नहीं हुई। यूटी बनने पर सावलाकोट समेत रतले (850 मेगावाट) और अन्य कई परियोजनाएं सीधे केंद्र के अधीन हो जाएंगी।
पाकिस्तान का पानी रोकना होगा आसान
सिंधु जल समझौते के अनुसार भारत के सौ फीसदी नियंत्रण वाले नदी नालों का पानी पाकिस्तान जाने से रोकना अब आसान हो जाएगा। कठुआ जिले के उज्ज दरिया में प्रस्तावित 180 मेगावाट क्षमता वाली बहुद्देशीय पनबिजली परियोजना पहले से ही केंद्र की प्राथमिकता है। लेकिन यह प्रोजेक्ट पहले प्रदेश सरकार का था, जिससे इसके क्रियान्वयन में अड़चनें आती रहीं। इस दरिया का लगभग सारा पानी पाकिस्तान चला जाता है। बहुद्देशीय परियोजना के मूर्त रूप लेने से पानी को जम्मू-कश्मीर समेत अन्य राज्यों में सप्लाई किया जाएगा। इसके लिए पहले से योजना विचाराधीन है।
आरटीई : निजी स्कूलों में गरीब परिवार के बच्चों को मिलेगा 25 फीसदी आरक्षण
यूटी बनने पर जम्मू-कश्मीर में स्कूली स्तर की शिक्षा में भी असर देखने को मिलेगा। जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यहां पर राइट टू एजुकेशन (आरटीई) एक्ट लागू किया जाएगा। 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को अपने पड़ोस के स्कूलों में मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलेगा।
यह कानून हर एक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का अधिकार प्राप्त हो इसके लिए काम करता है। इसके लिए बच्चे को या उनके अभिभावकों से प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के लिए कोई भी स्कूल की फीस या यूनिफार्म, पाठ्य-पुस्तकें, मध्याह्न-भोजन, परिवहन शुल्क नहीं लिया जाएगा।
निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें होंगी आरक्षित
इसमें सभी निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत सीटें उन विद्यार्थियों के लिए आरक्षित होंगी जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं। प्राइवेट स्कूलों को 6-14 वर्ष की उम्र वाले 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करनी होगी। ऐसा नहीं करने पर वसूली गई फीस से 10 गुना अधिक जुर्माना और स्कूल की मान्यता भी रद्द हो सकती है।
5वीं या 8वीं कक्षा में फेल होने पर फिर से दे पाएंगे परीक्षा
इस नए विधेयक में स्कूलों में नो डिटेंशन की नीति को समाप्त करने के लिए संशोधन किया गया है। वर्तमान प्रावधान के अनुसार 8वीं कक्षा तक किसी भी छात्र को अनुत्तीर्ण नहीं किया जा सकता है। अगर कोई बच्चा कक्षा 5वीं या 8वीं में फेल हो जाता है तो दो माह के भीतर पुन: परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। फेल हुए बच्चों के बेहतर प्रदर्शन के लिए दो माह तक विशेष शिक्षण की व्यवस्था की जाएगी।
यह कानून हर एक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का अधिकार प्राप्त हो इसके लिए काम करता है। इसके लिए बच्चे को या उनके अभिभावकों से प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के लिए कोई भी स्कूल की फीस या यूनिफार्म, पाठ्य-पुस्तकें, मध्याह्न-भोजन, परिवहन शुल्क नहीं लिया जाएगा।
निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें होंगी आरक्षित
इसमें सभी निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत सीटें उन विद्यार्थियों के लिए आरक्षित होंगी जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं। प्राइवेट स्कूलों को 6-14 वर्ष की उम्र वाले 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करनी होगी। ऐसा नहीं करने पर वसूली गई फीस से 10 गुना अधिक जुर्माना और स्कूल की मान्यता भी रद्द हो सकती है।
5वीं या 8वीं कक्षा में फेल होने पर फिर से दे पाएंगे परीक्षा
इस नए विधेयक में स्कूलों में नो डिटेंशन की नीति को समाप्त करने के लिए संशोधन किया गया है। वर्तमान प्रावधान के अनुसार 8वीं कक्षा तक किसी भी छात्र को अनुत्तीर्ण नहीं किया जा सकता है। अगर कोई बच्चा कक्षा 5वीं या 8वीं में फेल हो जाता है तो दो माह के भीतर पुन: परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। फेल हुए बच्चों के बेहतर प्रदर्शन के लिए दो माह तक विशेष शिक्षण की व्यवस्था की जाएगी।