फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   heavy flood in jammu and kashmir

'मोदी पर भरोसा है रियासत सरकार पर नहीं'

Sat, 27 Sep 2014 01:47 PM IST
Updated Sat, 27 Sep 2014 01:47 PM IST
विज्ञापन
heavy flood in jammu and kashmir

तीस वर्षीय जावेद बचपन से ही शिकारा चलाता रहा है। पूर्वजों का यह धंधा ऐसा मंदा पहले कभी नहीं पड़ा। सैलाब गुजर जाने के बाद से एक सप्ताह से ज्यादा निकल गया है लेकिन उसे अधैले की आमदनी भी नहीं हुई।

विज्ञापन


वह पहले की तरह ही रोज ठीक सुबह छह बजे डल लेक के नेहरू पार्क के सामने शिकारा खड़ा कर सैलानियों की इंतजार करता है लेकिन देर शाम निराश ही घर लौटना पड़ता है।
विज्ञापन


घर में इंतजार करती बीबी चेहरा देखकर ही भांप जाती है कि आज भी कमाई नहीं हुई। डल लेक से करीब दो लाख से अधिक लोगों की जिंदगी जुड़ी है। लेक ही उनके लिए सब कुछ है।
विज्ञापन
विज्ञापन

दहशत के चलते घरों में नहीं जा रहे लोग

heavy flood in jammu and kashmir

हाउसबोट के पीछे उनके लकड़ी और सीमेंट के मकान हैं, जो अब उजड़ चुके हैं। सीमेंट से बने मकानों की दीवारें गिर रही हैं। कहीं प्लास्टर उतर गया है और किसी घर की छत ही धंस चुकी है।

जान की जोखिम के कारण इन लोगों ने अपने घर छोड़ दिए हैं। कुछ ने नेहरू पार्क के पास के सरकारी कैफेटेरिया में शरण ली है और कुछ रिश्तेदारों के घर चले गए हैं।

सैलाब के बाद शंकराचार्य मंदिर की पहाड़ियां भी शरणगाह बनी थीं। अब गवर्नर हाउस के पास वाले मैदान में लगे टेंटों में भी दर्जनों लोगों ने शरण ली है। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें घर का मोह जगह छोड़ने की इजाजत नहीं देता।

जनता का राहत सामान हड़प रहे मुलाजिम

heavy flood in jammu and kashmir

शिकारा से डल लेक में हाउसबोट के पीछे वाले इलाके में तबाही ज्यादा दिखती है। मोहम्मद असगर कहते हैं अबी तक कोई रिलीफ नहीं मिला है। डल लेक के लिए चार ट्रक सामान आया था जिसमें से दो ट्रक मुलाजिमों के पास ही रह गया।

दो ट्रक का सामान बंटा लेकिन मांग ज्यादा थीं और माल कम। अधिकांश पीड़ित राहत से वंचित रह गए। चालीस वर्षीय सज्जाद हो या सत्तर साल के अब्दुल खालिद, अधिकांश पीड़ितों को मोदी सरकार पर ज्यादा भरोसा है।

वह कहते हैं कि मोदी से उम्मीद है। वह जैसा बोल रहे हैं उससे लगता है कि मदद जरूर मिलेगी। रियासत सरकार के महकमे में ऐसे लोग भी हैं जो राहत का समान खुद डकार जाएंगे।

सीआरपीएफ नहीं करती भेदभाव

heavy flood in jammu and kashmir

जब तक सेना और सीआरपीएफ के जवानों ने मदद की, तब तक ठीक था। अब पता ही नहीं चलता कि बाहर से आने वाला राहत का सामान कहां जा रहा है। डल लेक की बस्ती में शौकत अहमद मीर ने पनाह ली है।

वह डल लेक गेट इलाके में था जब उनका मकान गिर गया। चार दिन तक पूरा परिवार शिकारे में रहा। खाने को लाले पड़े थे। अपनी मां रफीका, बहन साइमा, और दादी के साथ वह रिश्तेदार के घर में पनाह लिए हुए हैं।

पीड़ित शौकत कहते हैं कि सीआरपीएफ जरूरतमंदों में भेदभाव नहीं करती। पुलिस वाले राहत का सामान खुद ही ले जाते हैं। डल लेक के अंदर की बस्तियों में अंधेरा है। बिजली जब तक नहीं आती, तब तक लालटेन के लिए मिट्टी का तेल मिलना जरूरी है।

डल लेक के मीना बाजार के पीछे वाले हिस्से में लगभग 300 परिवारों की बस्ती है। यहां रहने वाली महिला बटपुर कहती है कि वह रोज राहत सामानों की बाट जोहती है लेकिन निराशा ही हाथ आती है। मोहम्मद शैफी सुगू, हबीबुल्लाह सुगू का भी दर्द एक जैसा ही है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed