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कश्मीर का वो इलाका, जहां कदम रखते ही कहते हैं जनाब! रुक जाएं, आगे छोटा पाकिस्तान है

Fri, 18 May 2018 12:48 PM IST
दयाशंकर शुक्ला सागर, अमर उजाला, जम्मू
दयाशंकर शुक्ला सागर, अमर उजाला, जम्मू Updated Fri, 18 May 2018 12:48 PM IST
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GROUND REPORT OF APPLE TOWN SHOPIAN JAMMU AND KASHMIR
SHOPIAN - फोटो : AMAR UJALA

यह सचमुच एक खतरनाक मंजर है। कश्मीर में भारतीय सेना एक ऐसे दुश्मन से लड़ रही है जिसकी अपनी कोई वर्दी नहीं। जो युद्ध के कोई नियम नहीं मानता। यह दुश्मन नकाब में चेहरा छुपाकर बुर्कापोश महिलाओं, छोटे बच्चों और आम नागरिकों की आड़ में हमले करता है और फिर उन्हीं के पीछे छुप जाता है।

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ये गुरिल्ला युद्ध नहीं और न ही आजादी की जंग है। हिजबुल मुजाहिदीन के शब्दों में कहें तो ये ‘अल जिहाद’ है, जो युवाओं को आजादी का झूठा सपना दिखाकर कश्मीर को तबाह और बर्बाद करने पर उतारु है। यह इलाका हमेशा से संवेदनशील रहा है। तब वे अनंतनाग को ‘इस्लामाबाद’ कहते थे। पर ये नब्बे के दशक के आतंकवाद की बात है।
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मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की विधानसभा सीट अनंतनाग से कोई पचास किलोमीटर दूर से शुरू हो रहे शोपियां जिले को अब यहां के लोग ‘छोटा पाकिस्तान’ कहते हैं। आतंकियों की पनाहगाह और पत्थरबाजी के लिए बदनाम इस इलाके में हर तरफ  खौफ का लबादा ओढ़े एक अजीब सन्नाटा है। हालात किसी भी पल खराब हो सकते हैं।
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इसके लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं। कोई गैर-शोपियां इस इलाके में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता। पडोस के अनंतनाग का नेशनल मीडिया से जुड़ा कोई लोकल रिपोर्टर भी नहीं। यह इलाका पाकिस्तानी और कश्मीरी आतंकियों का गढ़ है। सुरक्षा बलों ने 6 मई को यहां सद्दाम पाडर और कश्मीर विवि के समाजशास्त्र के प्रो. डा. मोहम्मद रफी भट समेत पांच आतंकियों को ढेर कर दिया था।

सद्दाम यहां की आतंक की दुनिया का बड़ा नाम था। वह शोपियां का ही था। आपरेशन के दौरान देखते-देखते सैकडों पत्थरबाजों की भीड़ यहां इकट्ठी हो गई। सुरक्षाबलों पर चारों तरफ से पत्थर बरसने शुरू हो गए। इस हिंसा में पांच पत्थरबाज मारे गए। जबकि सौ से ज्यादा लोग जख्मी हो गए। 

यहां के पत्थरबाज किस कदर खतरनाक हो गए हैं इसका नजारा बीती दो मई को दिखा जब पत्थरबाजों ने अपने ही जिले के एक कान्वेंट स्कूल की बस को घेर कर पत्थरबाजी शुरू कर दी, जिसमें दो बच्चे बुरी तरह जख्मी हो गए जबकि कई घायल हुए। ये बच्चे शोपियां के ही थे।

पत्थरबाजों की नाराजगी सिर्फ  इस बात की थी कि स्कूलवालों ने उनके बंद के हुक्म को क्यों नहीं माना? इसी आतंक के कारण कश्मीर के टैक्सी वाले भी आपको यहां घुमाने के लिए तैयार नहीं होंगे। बड़ी मुश्किल से एक टैक्सीवाला तैयार हुआ, जिसकी गाड़ी की अगला हिस्सा दो दिन पहले ही पत्थरबाजी में शहीद हो चुका था।

उसने साफ चेतावनी दी ‘जनाब, आगे मत जाएं वो छोटा पाकिस्तान है।’ फिर इसरार करने पर उसने दो शर्तें सामने रख दीं। एक आप अपनी पत्रकार वाली पहचान नहीं बताएंगे और दूसरे वह कहीं बीच सड़क में अपनी टैक्सी नहीं रोकेगा। चलता रहेगा जब तक जिले की सरहद खत्म नहीं हो जाती।

पूरा कश्मीर इस समय छावनी बना है। हर चालीस कदम पर आपको यहां केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान गश्त करते मिल जाएंगे। लेकिन शोपियां जिले में आपको ये नजारा नहीं मिलेगा। जिले में कोई पच्चीस किलोमीटर हम सीधे चलते गए, सड़क पर न सीआरपीएफ  का जवान मिला, न कोई फौजी और न कोई पुलिसकर्मी। सीआरपीएफ  के एक कमांडेंट ने बताया-‘अकेले ड्यूटी करता कोई भी जवान यहां सुरक्षित नहीं।

किसी भी वक्त कोई भी पीछे या सामने से हमला कर सकता है। इस इलाके में हम पूरे लाव लश्कर के साथ तभी घुसते हैं जब किसी आपरेशन में हमारी जरूरत होती है।’ अभी पिछले हफ्ते हुए एनकाउंटर में सेना के 23 पैरा कमांडो, 3 व 34 राष्ट्रीय रायफल, सीआरपीएफ  की तीन टुकड़ियां और जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल आपरेशन ग्रुप के जवान शामिल थे।

थाने और चौकियां यहां बंकरों में तब्दील हो चुकी हैं। पुलिस तब निकलती है, जब सीआरपीएफ  उनके साथ होती है। यह खतरनाक संकेत हैं। जैसा कि शोपियां के एमएलसी शौकत गनई कहते हैं कि ऐसा कभी नहीं हुआ। वह सवाल उठाते हैं कि ये आग किसने लगाई? वे कहते हैं उम्मीद की किरण नहीं दिखती। कोई सुनने को तैयार नहीं। आने वाले दिन और डरावने हो सकते हैं।

सेबों का शहर बना आतंकियों की नर्सरी

जो शोपियां अभी दो साल पहले तक मीठे और रसीले ‘सेब के शहर’ के नाम से जाना जाता था, आज वह आतंकियों की नर्सरी बन गया है। सेना के एक आधिकारी इसकी दो वजह बताते हैं। एक शोपियां की भौगोलिक स्थिति।

खास तौर से यहां के जंगलात, सेब के बागान और पहाड़ी इलाका, जो इन आतंकियों को छुपने की महफूज जगह देता है। दूसरा यहां के नागरिकों का दहशतगर्दों को अंधा समर्थन। इन आतंकियों के आगे स्थानीय युवा और महिलाएं न केवल ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं बल्कि सामने से सुरक्षाबलों पर पत्थर बरसाना शुरू कर देते हैं। बिना इस डर के कि वे उनकी गोली का निशाना बन सकते हैं।


नेता भी डरते हैं यहां फटकने से
आलम ये है कि अब अधिकारी भी जिले में आने से डरने लगे हैं। सोमवार को जिला बोर्ड की बैठक थी। स्थानीय विधायक पहुंचे पर सत्तर फीसदी अफसर नदारद थे। विकास के काम बंद पड़े हैं। स्थानीय नेता भी इस इलाके में आने से डरते हैं।

जिले की मुख्य सड़क टूटी फूटी है। निर्माण के लिए पथरीले बोल्डर सड़क के किनारे ही पड़े हैं। सड़क तो बनने से रही लेकिन ये पत्थर, पत्थरबाजों के लिए हथियार और सुरक्षाबलों के लिए मुसीबत बन गए हैं।  

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