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फारूक अब्दुल्ला का बड़ा बयान, बोले-'केंद्र ने 35 ए पर कश्मीर को खतरे में डाला इसलिए चुनाव बहिष्कार'
राघवेंद्र नारायण मिश्र, अमर उजाला, जम्मू
Updated Tue, 18 Sep 2018 03:55 AM IST
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फारूक अब्दुल्ला (फाइल फोटो)
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नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला अपने बयानों और स्टैंड में लगातार बदलाव के कारण सुर्खियों में रहे हैं। केंद्र सरकार ने जब पहली बार सियासी शख्सियत को जम्मू कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया तो फारूक ने इसका स्वागत किया।
इससे पहले सेना के रिटायर अधिकारी या नौकारशाह ही रियासत में गवर्नर बनते रहे हैं। राज्यपाल के रूप में सत्यापल मलिक की नियुक्ति के बाद फारूक ने एयर पोर्ट पहुंचकर उनका स्वागत किया।
फिर निकाय और पंचायत चुनाव को कश्मीर के हित में बड़ा कदम बताते हुए तकरीरें कीं। गवर्नर मलिक ने यहां तक कहा कि जब फारूक उनके साथ होते हैं तो उनका हौसला बढ़ जाता है।
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इस बदलाव के बाद नेशनल कांफ्रेंस और भाजपा की गठबंधन सरकार गठित होने के कयास लगाए जाने लगे लेकिन फारूक ने यूटर्न लेते हुए चुनाव बहिष्कार का एलान कर दिया। फारूक ने बदलते स्टैंड पर अमर उजाला से खुलकर बात की। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश-
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इससे पहले सेना के रिटायर अधिकारी या नौकारशाह ही रियासत में गवर्नर बनते रहे हैं। राज्यपाल के रूप में सत्यापल मलिक की नियुक्ति के बाद फारूक ने एयर पोर्ट पहुंचकर उनका स्वागत किया।
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फिर निकाय और पंचायत चुनाव को कश्मीर के हित में बड़ा कदम बताते हुए तकरीरें कीं। गवर्नर मलिक ने यहां तक कहा कि जब फारूक उनके साथ होते हैं तो उनका हौसला बढ़ जाता है।
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इस बदलाव के बाद नेशनल कांफ्रेंस और भाजपा की गठबंधन सरकार गठित होने के कयास लगाए जाने लगे लेकिन फारूक ने यूटर्न लेते हुए चुनाव बहिष्कार का एलान कर दिया। फारूक ने बदलते स्टैंड पर अमर उजाला से खुलकर बात की। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश-
पहले आपने निकाय और पंचायत चुनाव की वकालत की, फिर सात दिन बाद ही अचानक यूटर्न लेकर चुनाव के बहिष्कार का एलान कर दिया?
फारुक- केंद्र सरकार ने 35 ए के मुद्दे पर कश्मीर के मुख्यधारा के दलों को खतरे में डाल दिया है। हमने सबसे पहले निकाय और पंचायत चुनाव का समर्थन किया। हमने अवाम को समझाया कि यह चुनाव कश्मीर के लिए है। यह दिल्ली का चुनाव नहीं है।
इस चुनाव से कश्मीर के विकास का फैसला लेने में आम लोगों की भागीदारी बढ़ेगी। निकाय और पंचायत स्तर पर विकास योजनाएं बनेंगी। हम उस मुहिम में जुटे थे तभी केंद्र की ओर से 35 ए के मुद्दे पर खेल शुरू हो गया। दो बड़ी बातें हुईं।
पहला यह कि एडिशनल सालिसीटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में 35 ए को लैंगिग विभेद को मुद्दे से जोड़ दिया और बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोभाल ने 35 ए को असामान्य और गैरजरूरी बता दिया। इससे केंद्र की नीति पर शक पैदा हुआ। हमारे पास 35 ए पर स्थिति साफ होने तक चुनाव बहिष्कार के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा
फारुक- केंद्र सरकार ने 35 ए के मुद्दे पर कश्मीर के मुख्यधारा के दलों को खतरे में डाल दिया है। हमने सबसे पहले निकाय और पंचायत चुनाव का समर्थन किया। हमने अवाम को समझाया कि यह चुनाव कश्मीर के लिए है। यह दिल्ली का चुनाव नहीं है।
इस चुनाव से कश्मीर के विकास का फैसला लेने में आम लोगों की भागीदारी बढ़ेगी। निकाय और पंचायत स्तर पर विकास योजनाएं बनेंगी। हम उस मुहिम में जुटे थे तभी केंद्र की ओर से 35 ए के मुद्दे पर खेल शुरू हो गया। दो बड़ी बातें हुईं।
पहला यह कि एडिशनल सालिसीटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में 35 ए को लैंगिग विभेद को मुद्दे से जोड़ दिया और बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोभाल ने 35 ए को असामान्य और गैरजरूरी बता दिया। इससे केंद्र की नीति पर शक पैदा हुआ। हमारे पास 35 ए पर स्थिति साफ होने तक चुनाव बहिष्कार के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा
राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने तो कहा है कि 35 ए पर रियासत की चुनी हुई सरकार ही स्टैंड ले सकती है। इस तरह उन्होंने आपको एक तरह से आश्वासन देने की कोशिश की है। इससे बड़ा क्या आश्वासन चाहते हैं?
फारुक- देखिए। गवर्नर साहब से मेरी बातचीत हुई थी। हम एक जलसे में भी साथ थे। उन्होंने रियासत में माहौल सुधारने के लिए कदम उठाने शुरू किए। हम साथ खड़े थे। हमें लगता है कि 35 ए के मुद्दे पर उनके सुझाव से अलग स्टैंड लिए गए। कश्मीर में 35 ए अवाम की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है।
जब निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव की तैयारियां चल रहीं हों तब केंद्र के नुमांइदों की ओर से इस संवेदनशील मुद्दे पर बयानबाजी से मामला बिगड़ा। हम साथ तो तभी देंगे जब हमारी विश्वसनीयता कायम रहे।
फारुक- देखिए। गवर्नर साहब से मेरी बातचीत हुई थी। हम एक जलसे में भी साथ थे। उन्होंने रियासत में माहौल सुधारने के लिए कदम उठाने शुरू किए। हम साथ खड़े थे। हमें लगता है कि 35 ए के मुद्दे पर उनके सुझाव से अलग स्टैंड लिए गए। कश्मीर में 35 ए अवाम की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है।
जब निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव की तैयारियां चल रहीं हों तब केंद्र के नुमांइदों की ओर से इस संवेदनशील मुद्दे पर बयानबाजी से मामला बिगड़ा। हम साथ तो तभी देंगे जब हमारी विश्वसनीयता कायम रहे।
राज्यपाल ने कहा दोनों पार्टियों ने कारगिल के चुनाव में भाग लिया। 35 ए का मुद्दा तो तब भी था। फिर भी आपने कारगिल में चुनाव में शिरकत की?
फारुक- तब हालात कुछ और थे। केंद्र की ओर से ताजा बयानों के बाद अब केंद्र की नीयत पर संदेह पैदा हो रहा है। बाकी हम अपनी कार्यकारिणी की बैठक के बाद इस मुद्दे पर जवाब देंगे।
अब चुनाव की तिथियां घोषित हो चुकीं हैं। क्या चुनाव बहिष्कार के फैसले पर पुनर्विचार करेंगे?
फारुक- हम अपने स्टैंड पर कायम हैं। हमने बहिष्कार का एलान करते वक्त साफ कहा कि जबतक केंद्र 35 ए अपना स्टैंड क्लीयर नहीं करती है, हम चुनाव में शिरकत नहीं कर सकते। केंद्र की ओर से अबतक कोई कदम नहीं उठाया गया। फिर हम अपना फैसला कैसे बदल सकते हैं। गेंद केंद्र के पाले में है। केंद्र आगे आए और अपना स्टैंड साफ करे।
फारुक- तब हालात कुछ और थे। केंद्र की ओर से ताजा बयानों के बाद अब केंद्र की नीयत पर संदेह पैदा हो रहा है। बाकी हम अपनी कार्यकारिणी की बैठक के बाद इस मुद्दे पर जवाब देंगे।
अब चुनाव की तिथियां घोषित हो चुकीं हैं। क्या चुनाव बहिष्कार के फैसले पर पुनर्विचार करेंगे?
फारुक- हम अपने स्टैंड पर कायम हैं। हमने बहिष्कार का एलान करते वक्त साफ कहा कि जबतक केंद्र 35 ए अपना स्टैंड क्लीयर नहीं करती है, हम चुनाव में शिरकत नहीं कर सकते। केंद्र की ओर से अबतक कोई कदम नहीं उठाया गया। फिर हम अपना फैसला कैसे बदल सकते हैं। गेंद केंद्र के पाले में है। केंद्र आगे आए और अपना स्टैंड साफ करे।
लेकिन चर्चा है कि आपकी पार्टी के कार्यकर्ता बैकडोर से चुनाव लड़ने के मूड में हैं?
फारुक- जब जमात ही चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है तो किसी कार्यकर्ता के चुनाव लड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
निकाय और पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण केंद्र से मिलने वाले विकास फंड पर असर पड़ा है। लगभग 6000 करोड़ से अधिक राशि रुकी पड़ी है। ये विकास का पैसा है। चुनाव होंगे तो विकास फंड आएगा। ऐसे में चुनाव का बहिष्कार कहा तक
फारुक-कश्मीरी अवाम के जेहन में 35 ए के मुद्दे पर केंद्र के स्टैंड को लेकर कई शंकाएं हैं। उसे साफ करने की जरुरत है। विकास फंड का फ्लो जरूरी है लेकिन कश्मीर में सर्दियों में कई काम ऐसे भी ठप पड़ जाते हैं।
फारुक- जब जमात ही चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही है तो किसी कार्यकर्ता के चुनाव लड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
निकाय और पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण केंद्र से मिलने वाले विकास फंड पर असर पड़ा है। लगभग 6000 करोड़ से अधिक राशि रुकी पड़ी है। ये विकास का पैसा है। चुनाव होंगे तो विकास फंड आएगा। ऐसे में चुनाव का बहिष्कार कहा तक
फारुक-कश्मीरी अवाम के जेहन में 35 ए के मुद्दे पर केंद्र के स्टैंड को लेकर कई शंकाएं हैं। उसे साफ करने की जरुरत है। विकास फंड का फ्लो जरूरी है लेकिन कश्मीर में सर्दियों में कई काम ऐसे भी ठप पड़ जाते हैं।