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बारिश के बीच भक्तों में रहा उत्साह
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सांबा के चीची माता मंदिर मे पूजा करते पूजारी
- फोटो : SAMBA
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सांबा। कस्बे के बसंतर दरिया के किनारे स्थित चीची देवी मंदिर में बारिश के बावजूद भी श्रद्धालुओं में उत्साह देखने को मिला। प्रथम नवरात्र पर मंदिर में काफी भीड़ रही। मंदिर को पहले से ही सजाया जा चुकी। मंदिर परिसर में साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा गया। प्रसाद की दुकानों परिसर में विशेष रूप से सजाई गईं। श्रद्धालु बारिश की परवाह किए बगैर माता के दर्शन करने के लिए पहुंच रहे थे। पुलिस जवानों के साथ महिला पुलिस कर्मी भी मंदिर परिसर में तैनात रहे। मंदिर कमेटी के प्रबंधकों की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष प्रबंध किए हैं।
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मंदिर का क्या है महत्व
किवदंतियों अनुसार की मां पार्वती के पिता ने यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें भागवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। जिस पर मां पार्वती को जब पता चला तो वह बिना बुलाए ही यज्ञ में शामिल होने पहुंच गई। जब उन्होंने देखा की सभी देवता यज्ञ में विराजमान हैं केवल भगवान शिव को ही नहीं बुलाया गया। पार्वती को क्रोध आ गया। पति के अपमान को देखते हुए उन्होंने यज्ञ के हवन कुंड में छलांग दी। जैसे ही भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से देखा तो वह अति क्रोधित होकर यज्ञ स्थल पर पहुंचे व मां पार्वती के अधजले शरीर को पृथ्वी का चक्कर लगाने लगे। जहां-जहां मां पार्वती के अंग गिरे, वहां पर मंदिर बनाए गए। इस स्थान पर मां पार्वती की चीची अंगुली से रक्त गिरा था वहीं वह मंदिर का निर्माण किया गया।
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महाजन और ब्राह्मण बिरादरी की लगती है मेल
दूसरी किवदंति के अनुसार की ब्राह्मण परिवार यहां रहता था। एक कन्या अपने पिता के साथ इस जंगल में रहती थी। एक दिन कन्या का पिता जंगल में लकड़ियां लेने चला गया। कन्या पिता को ढूंढने के लिए जंगल की ओर जा रही थी। रास्ते में एक तालाब था, वहां पर कुछ औरतें थीं। कन्या ने जब उनसे पूछा कि उसके पिता को कहीं देखा है तो उन औरतों ने कहा कि तालाब की ओर जाते देखा है। कन्या ने तालाब में छलांग लगा दी। वह सती हो गई। तब से वह एक कुलदेवी के रूप में प्रकट हुई, जिस ब्राह्मण व महाजन अपनी कुलदेवी के रूप मानते आ रहे हैं आज भी महाजन व ब्राह्मण बिरादरी की मेल लगती आ रही है।
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मंदिर का क्या है महत्व
किवदंतियों अनुसार की मां पार्वती के पिता ने यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें भागवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। जिस पर मां पार्वती को जब पता चला तो वह बिना बुलाए ही यज्ञ में शामिल होने पहुंच गई। जब उन्होंने देखा की सभी देवता यज्ञ में विराजमान हैं केवल भगवान शिव को ही नहीं बुलाया गया। पार्वती को क्रोध आ गया। पति के अपमान को देखते हुए उन्होंने यज्ञ के हवन कुंड में छलांग दी। जैसे ही भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से देखा तो वह अति क्रोधित होकर यज्ञ स्थल पर पहुंचे व मां पार्वती के अधजले शरीर को पृथ्वी का चक्कर लगाने लगे। जहां-जहां मां पार्वती के अंग गिरे, वहां पर मंदिर बनाए गए। इस स्थान पर मां पार्वती की चीची अंगुली से रक्त गिरा था वहीं वह मंदिर का निर्माण किया गया।
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महाजन और ब्राह्मण बिरादरी की लगती है मेल
दूसरी किवदंति के अनुसार की ब्राह्मण परिवार यहां रहता था। एक कन्या अपने पिता के साथ इस जंगल में रहती थी। एक दिन कन्या का पिता जंगल में लकड़ियां लेने चला गया। कन्या पिता को ढूंढने के लिए जंगल की ओर जा रही थी। रास्ते में एक तालाब था, वहां पर कुछ औरतें थीं। कन्या ने जब उनसे पूछा कि उसके पिता को कहीं देखा है तो उन औरतों ने कहा कि तालाब की ओर जाते देखा है। कन्या ने तालाब में छलांग लगा दी। वह सती हो गई। तब से वह एक कुलदेवी के रूप में प्रकट हुई, जिस ब्राह्मण व महाजन अपनी कुलदेवी के रूप मानते आ रहे हैं आज भी महाजन व ब्राह्मण बिरादरी की मेल लगती आ रही है।
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