फेल हुआ मोदी का मिशन, 5 कारण
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भाजपा ने जम्मू संभाग की 37 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे और 25 पर कमल खिल गया। जबकि कश्मीर घाटी की 46 सीटों में से उसने सिर्फ 33 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। बाकी की13 सीटें भाजपा ने पीपुल्स कांफ्रेंस और पीपुल्य रिवल्यूशनरी पार्टी के लिए छोड़ दी थी।
इन 33 सीटों पर कश्मीर के लोगों ने भाजपा के उम्मीदवारों नकार दिया। भाजपा की कश्मीर में स्टार प्रत्याशी मानी जाने वाली डॉ. हिना बट, नीलम गाश और द्रक्षां अंद्राबी भी अपनी सीटों से हार गई।
जम्मू संभाग में वह 25 का आंकड़ा पार कर 36 तक पहुंच सकती थी। लेकिन बिश्नाह से विधायक अश्विनी शर्मा के खिलाफ स्थानीय मतदाताओं में तीव्र नाराजगी थी। बिश्नाह में लोगों ने भाजपा के खिलाफ नहीं अश्विनी शर्मा के खिलाफ मतदान किया है।
यहीं हाल नगरोटा में भाजपा प्रदेश प्रमुख के भाई जुगल किशोर शर्मा के भाई नंद किशोर को टिकट देना भारी पड़ा। स्थानीय मतदाताओं में से एक वर्ग सिर्फ इसलिए नाराज हो गया कि जिस वशंवाद के खिलाफ भाजपा शंखनाद कर रही है, वह उसे क्यों प्रोत्साहित कर रही है।
विस्थापित मतदाताओं की प्रति उदासीनता
भाजपा का यही हाल विस्थापित कश्मीरी पंडितों के प्रभाव वाले हब्बाकदल, खनयार, बीजबेहाड़ा, रफियाबाद और त्रल में हुआष यहां से भी भाजपा का कोई प्रत्याशी नहीं जीता।
सिवाय त्रल के अन्य चार सीटों पर कश्मीरी पंडित ही भाजपा उम्मीदवार थे। इन पांचों सीटों पर कश्मीरी विस्थापित मतदाताओं की उदासीनता ने कमल को खिलने से रोका दिया।
हब्बाकदल से पार्टी उम्मीदवार मोती कौल की अपने समुदाय में कोई मजबूत पकड़ नहीं थी। कहा तो यहां तक जाता है कि उम्मीदवारी को लेकर पूरा कश्मीरी पंडित समुदाय हैरान था।
370 पर परस्पर विरोधी बयानबाजी
अगर घाटी की अन्य सीटों की बात करे तो धारा 370 को लेकर भाजपा के परस्पर विरोधी बयानों ने भी भाजपा की नैया डुबो दी। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी के अन्य बडे नेता इस मुद्दे पर पूरे चुनाव के दौरान कुछ कहने से बचते रहे। लेकिन इसके चलते कश्मीर घाटी के मतदाता धारा 370 पर भाजपा क्या इरादे रखती है यह उन्हे भ्रमित करता रहा।
वहीं पार्टी की कश्मीर में मुस्लिम चेहरा मानी जाने वाली हिना भट का यह बयान कि अगर धारा 370 कश्मीर से हटा दी गई तो वे बंदूक उठा लेंगी। इससे भी मतदातओं के बीच यह संदेश गया कि पार्टी के अंदर ही इस मुद्दे को लेकर अंर्तकलह है। वहीं पार्टी के कुछ नेता धारा 370 पर को जरुरी बताते रहे तो कुछ मुद्दे का गोलमोल जबाव देते रहे।
मोदी के पीछे आरएसएस का छवि
कश्मीरियों में पीएम मोदी की छवि एक प्रधानमंत्री से कहीं ज्यादा आरएसएस के कैडर के तौर पर देखी जाती है, जिससे वह मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। इसके अलावा भाजपा के चुनाव प्रचार की कश्मीर में कमान आरएसएस के राममाधव के अलावा उन पूर्व पुलिस अधिकारियों के हाथ में रही जो आतंकवाद के दौर में कश्मीर में खास कारणों से जाने जाते थे।
इसके अलावा जिस तरह से कुछ मजहबी संगठनों के नेता बाहर से आकर कश्मीर में चुनाव प्रचार कर रहे थे, उससे भी कई ऐसे लोग जो पहले मतदान नहीं करते थे, मतदान को प्रेरित हुए। लेकिन भाजपा के पक्ष में नहीं बल्कि उसके खिलाफ।
हुर्रियत और जमायत से सहानुभूति रखने वाले लोग ही थे जो यह सोचकर वोट डालने आए थे कि मोदी को रोकने के लिए नेकां या पीडीपी का जीतना जरूरी है।
भाजपा के खिलाफ ध्रुवीकरण
हिंदू-मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण भा भाजपा के मिशन 44 की राह का रोड़ा बना। इसके लिए भाजपा ने इंद्रवाल और बनिहाल में प्रत्याशी मुस्लिम भी उतारे थे, लेकिन स्थानीय मुस्लिमों में भाजपा के प्रति आशंका वह दूर नहीं कर पाए।
उधमपुर की सीट पार्टी की अंतर्कलह खा गई। वहां से निर्दलीय जीते पवन कुमार गुप्ता का टिकट अंतिम समय पर कटा और वह पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार पवन खजूरिया की हार का कारण बन गए।
बीते कुछ सालों से राजौरी में लगातार बढ़ रहे सांप्रदायिक तनाव के बीच मुस्लिम मतदाताओं ने भी तालिब हुसैन का साथ पूरा नहीं दिया। कांग्रेस से आए पूर्व मंत्री ठॉ. पूर्ण सिंह को लेकर भी पार्टी कैडर नाराज था।