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आखिर कोई जम्मू क्यों आए! बरसों बाद भी धरातल पर नहीं उतरीं पर्यटन विकास की बड़ी परियोजनाएं

Mon, 25 Nov 2019 12:58 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Mon, 25 Nov 2019 12:58 PM IST
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Big projects of tourism development did not on ground even after years in jammu
जम्मू - फोटो : अमर उजाला

गुजरात की साबरमती नदी की तर्ज पर तवी रिवर फ्रंट, तवी में कृत्रिम झील, अमृतसर के वाघा बॉर्डर की तर्ज पर सुचेतगढ़ सीमा और हिल स्टेशन सा आकर्षण तैयार करने के लिए गंडोला (जम्मू रोपवे) प्रोजेक्ट। जम्मू शहर में लोकल टूरिस्ट सर्किट बनाने के दावों के घोषित ऐसी कई परियोजनाएं वर्षों बाद भी धरातल पर नहीं उतर सकी हैं।

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कोई योजना करीब एक दशक से अधर में लटकी है तो कोई डीपीआर के बनने के बावजूद फाइलों में धूल फांक रही है। कई परियोजनाएं सरकारी अमले की बेरुखी के चलते सिरे नहीं चढ़ सकीं, तो कुछ तकनीकी कारणों से अटकी हैं।
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सैलानियों को जम्मू में रोकने के लिए बन रहीं इन परियोजनाओं को स्वरूप न मिलने के कारण भी शहर में कारोबार उभर नहीं पा रहा है। पर्यटन कारोबार से जुड़े लोगों समेत पूरे जम्मू की निगाहें अरसे से इन परियोजनाओं पर हैं। कारोबारी वर्ग इन परियोजनाओं के सिरे नहीं चढ़ने के पीछे सरकारी उदासीनता को जिम्मेदार मानता है।

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जम्मू का वाघा बॉर्डर नहीं बन पाया सुचेतगढ़

पिछले चार साल में प्रतिष्ठित जम्मू रोपवे (केबल कार) के प्रोजेक्ट सिरे नहीं चढ़ पाया है। इस प्रोजेक्ट को वर्ष 2012 में मंजूरी मिली थी। 2015 में काम शुरू किया गया। अब तक इसे लोगों को समर्पित नहीं किया जा सका है। रोपवे पर सरकार द्वारा गठित कमेटी की ओर से निरीक्षण किया गया है।

कमेटी में चीफ इंजीनियर इलेक्ट्रिकल, चीफ इंजीनियर मेकेनिकल और एससी सिविल सुरक्षा सहित अन्य बिंदुओं को देखा है। लेकिन अब तक फाइनल रिपोर्ट नहीं दी गई है। करीब 75 करोड़ रुपये की लागत से जम्मू रोपवे में पीरखो-महामाया और बाहू-महामाया रोपवे का सफल ट्रायल हो चुका है। रोपवे पर रेस्क्यू माक ड्रिल की जा चुकी है।

जम्मू का वाघा बॉर्डर नहीं बन पाया सुचेतगढ़
18 दिसंबर 2015 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने सुचेतगढ़ बॉर्डर को वाघा सीमा की तर्ज पर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी। जम्मू मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर सुचेतगढ़ बॉर्डर को पर्यटन विकास से जोड़ा तो गया है लेकिन बुनियादी विकास के लिहाज से उदासीनता हावी है। सुचेतगढ़ सीमा के उस पार पाकिस्तान का सियालकोट है। 1947 से पहले इस रूट पर ट्रेन की आवाजाही होती थी। यह भारत और पाक की सीमा पर स्थित है। यहां आक्ट्राय पोस्ट स्थापित है।
 

जम्बू जू प्रोजेक्ट को गति देने की जरूरत

जम्मू से सटे नगरोटा (खानपुर) में निर्माणाधीन प्रतिष्ठित जम्बू जू (चिड़ियाघर) प्रोजेक्ट को गति नहीं मिल पाई है। 2013-14 में शुरू हुई प्रोजेक्ट की कवायद अधर में लटकी हुई है। प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 121 करोड़ रुपये है। राज्य प्रशासनिक परिषद ने प्रोजेक्ट के लिए 62.41 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी, जिसमें से 21 करोड़ के टेंडर हुए हैं।

सूत्रों के अनुसार इन कार्यों को दिसंबर 2020 या 2021 के शुरू में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। जम्बू जू का निर्माण करीब पांच हजार (229.5 हेक्टियर) कनाल जमीन पर किया जा रहा है। संभाग में बन रहे अपनी तरह के पहले जू में सैलानी बैटरी कार और साइकिल यात्रा से जू की सैर कर सकेंगे।

कृत्रिम झील
तवी नदी में कृत्रिम झील परियोजना का शिलान्यास वर्ष 2010 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री ताज मोहिउद्दीन ने किया था। वर्तमान में इस परियोजना की डीपीआर की फाइल आईआईटी रुड़की के पास है।

तवी रिवर फ्रंट
दिसंबर 2017 को परियोजना का शिलान्यास किया गया। फ्रंट निर्माण के लिए 150 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत है। जबकि 250 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की ओर से दिया जाना है। डीपीआर मार्च 2018 में स्वीकृत हुई थी। इसके बाद काम के लिए कंपनी को फाइनल किया जा रहा था। अब कंपनी फाइनल हो चुकी है।

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