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बेड रेस्ट भी नहीं तोड़ पाया उर्दू से प्यार

Mon, 18 Jul 2016 01:34 PM IST
रवि वर्मा, अमर उजाला/राजोरी
रवि वर्मा, अमर उजाला/राजोरी Updated Mon, 18 Jul 2016 01:34 PM IST
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bashindey story on mehar talat rajouri
- फोटो : Amar Ujala

करीब 70 वर्ष की उम्र। ब्लड प्रेशर, शुगर, हाइपरटेंशन से रोज-ब-रोज स्वास्थ्य समस्या से जूझता कमजोर शरीर। डाक्टरों ने कहा बेड रेस्ट। परिवार की आर्थिक हालत ऐसी कि किसी तरह गुजर-बसर हो रहा है। पति के बिना सूनी जिंदगी और बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी। यह सब शायद किसी भी आम इंसान को मानसिक तौर पर इतना परेशान कर दे कि वह और कुछ नया सोच ही न पाए। 

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साहित्य सृजन और अन्य रचनात्मक कार्यों की तो बात ही अलग, लेकिन, राजोरी की मेहर तलत जिंदगी के प्रति अपने आशावादी नजरिए की बदौलत न सिर्फ अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं, साहित्य का सृजन कर रही हैं। और 8वीं, 10वीं, 12वीं, स्नातक, परास्नातक और पीएचडी के विद्यार्थियों को उर्दू भाषा का ज्ञान बांट रही हैं। और वह भी नि:शुल्क। 
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चेन्नई के वेल्लोर जिले की अंबूर शहर की निवासी मेहर तलत मद्रास विश्वविद्यालय से उर्दू भाषा में एमए करने के बाद वर्ष 1975 में जिले के दरहाल क्षेत्र के एक सैन्य अधिकारी से विवाह कर दरहाल पहुंचीं। विवाह के महज सात वर्ष बाद ही दिल का दौरा पड़ने से उनके पति की मौत हो गई। इसके बाद वे एकदम अकेली हो गईं। मेहर की उनके सैन्य पति से यह दूसरी शादी थी। 
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पति की मौत के बाद हर प्रकार की सुविधाएं पहली पत्नी को ही मिलीं। इसके बाद मेहर अपने तीन बच्चों को साथ लेकर राजोरी आ गईं और एक प्राइवेट स्कूल में काम करना शुरू कर दिया। जिंदगी में इतना दुख होते हुए भी मेहर ने हौसला नहीं खोया और यहीं से शुरू हुआ उनकी उर्दू लघुकथाओं का चढ़ान का सिलसिला। उर्दू से प्यार तो उन्हें पहले भी था, लेकिन इस मुकाम पर वह परवान चढ़ा। 

उन्होंने गरीब और जरूरतमंद विद्यार्थियों को उर्दू भाषा पढ़ाना शुरू कर किया। वे पिछले करीब चार दशकों से गरीब घरों से ताल्लुक रखने वाले विद्यार्थियों में उर्दू का ज्ञान बाट रही हैं। खुद किराए के मकान में रहती हैं, लेकिन बच्चों से कोई फीस नहीं लेतीं। डॉक्टर उन्हें बेड रेस्ट करने को कहते हैं, लेकिन वे उनकी एक नहीं सुनतीं। आज उनका बेटा व बेटी आरईटी शिक्षक हैं। 

दोनों के वेतन से घर का गुजर-बसर हो जाती है। कई बीमारियों के चलते वे बेहद कमजोरी महसूस करती हैं, लेकिन उर्दू के प्रति उनके प्यार और बच्चों को पढ़ाने के लिए उनके पास समय में कभी कमी नहीं आई। बातचीत में मेहर ने बताया कि पढ़ाना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा मकसद है। जब तक सांसें चलेंगी वे उर्दू का ज्ञान बांटतीं रहेंगी। 


उर्दू के रसालों में प्रकाशित हो चुकी हैं दर्जनों कहानियां
मेहर ने बताया कि अब तक उनकी दर्जनों लघुकथाएं उर्दू के रसालों में प्रकाशित हो चुकी हैं। दर्जनों अप्रकाशित लघुकथाएं अल्मारी में रखी हैं। कहानियां लिखने का यह सिलसिल बढ़ता ही जा रहा है। अब तक दर्जन भर पीएचडी कर रहे विद्यार्थी भी उनसे मदद लेकर अपनी पीएचडी की डिग्री पूरी कर चुके हैं।  

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