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Udhampur News: जैतून की खेती से आत्मनिर्भर बनेंगी महिलाएं, सरकारी योजनाओं से मिलेगा लाभ
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डोडा। चिनाब नदी के किनारे बसे डोडा जिले के निचले इलाकों में जैतून की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है। बागवानी विभाग किसानों को जैतून के नए बाग लगाने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। जिले में पिछले 30 से 35 वर्षों से जैतून की खेती की जा रही है और वर्तमान में लगभग 200 से 300 किसान इससे जुड़े हुए हैं। बागवानी विभाग डोडा के अधिकारी महिंदर सिंह के अनुसार जिले के घट, ठाठरी, मोहाला, अस्सर, भागवाह और मरमत सहित निचले क्षेत्रों की जलवायु जैतून की खेती के लिए अनुकूल है। वहीं, ऊंचाई वाले इलाकों में सेब, अखरोट और खुबानी जैसे समशीतोष्ण फलों की खेती अधिक उपयुक्त रहती है। उन्होंने बताया कि जिले में कई पुराने जैतून के बाग हैं, जिनमें नए पौधे लगाने और पुराने पेड़ों के पुनरुद्धार की जरूरत है।
जैतून की खेती को बढ़ावा देने के लिए बागवानी विभाग ने राजस्थान के भरतपुर से पौधे मंगवाकर किसानों में वितरित किए हैं। इस पहल के तहत लगभग 30 से 40 एकड़ भूमि पर नए पौधे लगाए गए हैं। विभाग को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इन नए बागों से जैतून का उत्पादन बढ़ेगा और किसानों को आय का अतिरिक्त साधन मिलेगा।
एक हेक्टेयर पर 48 हजार रुपये की सहायता का प्रावधान
महिंदर सिंह ने बताया कि किसान ''नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ट्री बोर्न ऑयलसीड्स'' तथा संशोधित हाई डेंसिटी प्लांटेशन योजना के तहत उपलब्ध सहायता की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि जैतून की खेती स्थापित करने के लिए एक हेक्टेयर की परियोजना लागत 96 हजार रुपये निर्धारित बताई गई है, जिसमें 50 प्रतिशत सहायता यानी 48 हजार रुपये का प्रावधान है। हालांकि, किसानों को पात्रता, लागू दिशा-निर्देशों और जैतून की खेती पर योजना की वास्तविक उपलब्धता की पुष्टि संबंधित बागवानी विकास अधिकारी से करनी चाहिए।
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भागवाह की महिला किसान ने साझा किया अनुभव
भागवाह डोडा की महिला किसान अनुराधा ठाकुर ने बताया कि उनका परिवार पिछले 25 से 26 वर्षों से जैतून की खेती से जुड़ा हुआ है और पूर्व में इस फसल से अच्छा लाभ भी प्राप्त कर चुका है। उन्होंने कहा कि बागवानी विभाग की ओर से उनके परिसर में जैतून से तेल निकालने की मशीन उपलब्ध कराई गई है। अनुराधा ठाकुर के अनुसार, पहले जैतून का तेल निकलवाने के लिए फल को रामबन ले जाना पड़ता था और वहां कई दिनों तक रुकना पड़ता था। अब घर पर ही तेल निकालने की सुविधा मिलने से यह प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि बदलते मौसम, पर्याप्त बारिश नहीं होने और कुछ पेड़ों में फफूंद की समस्या के कारण हाल के वर्षों में उत्पादन प्रभावित हुआ है। पुराने पेड़ों की स्थिति का आकलन करने की जरूरत है और नए पौधों के लिए आवेदन भी किया गया है। उन्होंने अन्य किसानों, विशेषकर महिलाओं से जैतून की खेती अपनाने और सरकारी योजनाओं की जानकारी लेने की अपील की। उनका कहना है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए कृषि एवं बागवानी से जुड़े अवसरों का लाभ उठाना चाहिए। जिले में जैतून के नए बाग विकसित करने, किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने और पात्र किसानों तक सरकारी सहायता पहुंचाने के प्रयास सफल रहते हैं तो डोडा के निचले इलाकों में यह खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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जैतून की खेती को बढ़ावा देने के लिए बागवानी विभाग ने राजस्थान के भरतपुर से पौधे मंगवाकर किसानों में वितरित किए हैं। इस पहल के तहत लगभग 30 से 40 एकड़ भूमि पर नए पौधे लगाए गए हैं। विभाग को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इन नए बागों से जैतून का उत्पादन बढ़ेगा और किसानों को आय का अतिरिक्त साधन मिलेगा।
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एक हेक्टेयर पर 48 हजार रुपये की सहायता का प्रावधान
महिंदर सिंह ने बताया कि किसान ''नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ट्री बोर्न ऑयलसीड्स'' तथा संशोधित हाई डेंसिटी प्लांटेशन योजना के तहत उपलब्ध सहायता की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि जैतून की खेती स्थापित करने के लिए एक हेक्टेयर की परियोजना लागत 96 हजार रुपये निर्धारित बताई गई है, जिसमें 50 प्रतिशत सहायता यानी 48 हजार रुपये का प्रावधान है। हालांकि, किसानों को पात्रता, लागू दिशा-निर्देशों और जैतून की खेती पर योजना की वास्तविक उपलब्धता की पुष्टि संबंधित बागवानी विकास अधिकारी से करनी चाहिए।
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भागवाह की महिला किसान ने साझा किया अनुभव
भागवाह डोडा की महिला किसान अनुराधा ठाकुर ने बताया कि उनका परिवार पिछले 25 से 26 वर्षों से जैतून की खेती से जुड़ा हुआ है और पूर्व में इस फसल से अच्छा लाभ भी प्राप्त कर चुका है। उन्होंने कहा कि बागवानी विभाग की ओर से उनके परिसर में जैतून से तेल निकालने की मशीन उपलब्ध कराई गई है। अनुराधा ठाकुर के अनुसार, पहले जैतून का तेल निकलवाने के लिए फल को रामबन ले जाना पड़ता था और वहां कई दिनों तक रुकना पड़ता था। अब घर पर ही तेल निकालने की सुविधा मिलने से यह प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि बदलते मौसम, पर्याप्त बारिश नहीं होने और कुछ पेड़ों में फफूंद की समस्या के कारण हाल के वर्षों में उत्पादन प्रभावित हुआ है। पुराने पेड़ों की स्थिति का आकलन करने की जरूरत है और नए पौधों के लिए आवेदन भी किया गया है। उन्होंने अन्य किसानों, विशेषकर महिलाओं से जैतून की खेती अपनाने और सरकारी योजनाओं की जानकारी लेने की अपील की। उनका कहना है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए कृषि एवं बागवानी से जुड़े अवसरों का लाभ उठाना चाहिए। जिले में जैतून के नए बाग विकसित करने, किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने और पात्र किसानों तक सरकारी सहायता पहुंचाने के प्रयास सफल रहते हैं तो डोडा के निचले इलाकों में यह खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।