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Udhampur News: भद्रवाह के प्राचीन वासुकी नाग मंदिर में हुआ जगरू अनुष्ठान
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भद्रवाह। नाग मंदिर गाठा में ज़गरु नामक अनुष्ठान पूरा करते पुजारी : संवाद
- धधकते अंगारों पर स्थानीय पुजारी (चेले) चलते हैं
संवाद न्यूज एजेंसी
भद्रवाह। प्राचीन नाग संस्कृति का एक अनोखा अनुष्ठान ''जगरू'' भद्रवाह के गाठा क्षेत्र में स्थित वासुकी नाग मंदिर में रविवार को आयोजित किया गया। इस अनुष्ठान में भगवान वासुकी नाग के हजारों भक्तों की उपस्थिति में चेला (पुजारी) ने नंगे पांव विशाल अलाव में प्रवेश किया।
भारी बारिश के बावजूद प्राचीन वासुकी नाग मंदिर में मध्यरात्रि से ही मशाल (लकड़ी की मशाल) लेकर सदियों पुराने अनुष्ठान ''जगरू'' में भाग लेने के लिए भक्त जुटने लगे थे। ये मशालें शिविर की आग के रूप में रखी जाती हैं जो जल्द ही धधकते अंगारों के विशाल ढेर में बदल जाती हैं। इसके चारों ओर स्थानीय पुजारी जिन्हें चेला कहा जाता है, भोर तक नाग अनुष्ठान करते हैं।
सूर्योदय से ठीक पहले पुजारी नंगे पैर जलते अंगारों में प्रवेश करते हैं। इसे स्थानीय भाषा में ''जगरू भन्नू'' (अस्थि अग्नि तोड़ना) कहा जाता है जिसके बाद भक्त पुजारियों से आशीर्वाद लेते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस प्रक्रिया के दौरान पुजारी भविष्यवाणियां करते हैं जो आमतौर पर सच होती हैं। जगरू अनुष्ठान अनादि काल से हर साल कैलाश यात्रा के समापन के दूसरे दिन किया जाता है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
भद्रवाह। प्राचीन नाग संस्कृति का एक अनोखा अनुष्ठान ''जगरू'' भद्रवाह के गाठा क्षेत्र में स्थित वासुकी नाग मंदिर में रविवार को आयोजित किया गया। इस अनुष्ठान में भगवान वासुकी नाग के हजारों भक्तों की उपस्थिति में चेला (पुजारी) ने नंगे पांव विशाल अलाव में प्रवेश किया।
भारी बारिश के बावजूद प्राचीन वासुकी नाग मंदिर में मध्यरात्रि से ही मशाल (लकड़ी की मशाल) लेकर सदियों पुराने अनुष्ठान ''जगरू'' में भाग लेने के लिए भक्त जुटने लगे थे। ये मशालें शिविर की आग के रूप में रखी जाती हैं जो जल्द ही धधकते अंगारों के विशाल ढेर में बदल जाती हैं। इसके चारों ओर स्थानीय पुजारी जिन्हें चेला कहा जाता है, भोर तक नाग अनुष्ठान करते हैं।
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सूर्योदय से ठीक पहले पुजारी नंगे पैर जलते अंगारों में प्रवेश करते हैं। इसे स्थानीय भाषा में ''जगरू भन्नू'' (अस्थि अग्नि तोड़ना) कहा जाता है जिसके बाद भक्त पुजारियों से आशीर्वाद लेते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस प्रक्रिया के दौरान पुजारी भविष्यवाणियां करते हैं जो आमतौर पर सच होती हैं। जगरू अनुष्ठान अनादि काल से हर साल कैलाश यात्रा के समापन के दूसरे दिन किया जाता है।
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