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श्रीनगर: अफसरों और विधायकों के बच्चों का सरकारी स्कूलों में पढ़ाना अनिवार्य नहीं, माननीयों ने खारिज किया बिल
Fri, 25 Sep 2026 12:36 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 25 Sep 2026 12:36 AM IST
सार
सरकार के कड़े विरोध के बावजूद प्रस्तावक ने अपना निजी बिल वापस लेने से इनकार कर दिया था। इसके बाद जब इसे सदन में रखाा गया तो विधायकों ने नामंजूर कर दिया।
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Jammu and Kashmir assembly/ file
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने विधायकों, मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के बच्चों का सरकारी स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य करने वाला बिल ध्वनिमत से खारिज कर दिया। सरकार के कड़े विरोध के बावजूद प्रस्तावक ने अपना निजी बिल वापस लेने से इनकार कर दिया था। इसके बाद जब इसे सदन में रखाा गया तो विधायकों ने नामंजूर कर दिया।
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यह बिल लंगेट विधायक शेख खुर्शीद अहमद ने पेश किया था। इसका उद्देश्य लोक सेवकों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों का सरकारी स्कूलों में अनिवार्य दाखिला सुनिश्चित करना था। खुर्शीद ने तर्क दिया कि केवल इमारतें और बुनियादी ढांचा सुधारने से स्कूलों की तस्वीर नहीं बदलेगी। स्कूलों में छात्रों की घटती संख्या गंभीर चिंता का विषय है। उनका मानना था कि नीति निर्माताओं को खुद उदाहरण पेश करना चाहिए। जब तक इनके बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक जमीनी स्तर पर व्यापक सुधार नहीं दिखेगा।
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सरकार की ओर से स्कूल शिक्षा मंत्री सकीना इत्तू ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि सरकार विधेयक की भावना का सम्मान करती है, लेकिन इसे कानून बनाकर लोगों पर जबरन थोपना व्यावहारिक एवं उचित नहीं है। हर बच्चे और अभिभावक को अपनी पसंद से शिक्षा हासिल करने का मौलिक अधिकार है, जिसे कानूनी बंदिशों से नहीं छीना जा सकता।
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सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का किया बचाव
शिक्षा मंत्री ने सरकारी स्कूलों का बचाव करते हुए कहा कि इन संस्थानों में बेहद योग्य, मेहनती और सक्षम शिक्षक सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने माना कि कुछ स्कूलों में बुनियादी ढांचे के सुधार की जरूरत है, जिसे सरकार चरणबद्ध तरीके से बेहतर कर रही है। केवल एक नया कानून बना देने भर से शिक्षा व्यवस्था की जटिल समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता।