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Srinagar News: हाईकोर्ट ने उड़ी नार्को टेरर केस में डिफॉल्ट बेल की नामंजूरी को सही ठहराया
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने उड़ी में हथियार, विस्फोटक, हेरोइन और कैश बरामद होने से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल नार्को-टेरर केस में दो आरोपियों की डिफॉल्ट बेल नामंजूर करने के फैसले को सही ठहराया है।
कोर्ट ने फैसला दिया कि प्रॉसिक्यूशन ने जांच के लिए समय बढ़ाने की मंजूरी सही तरीके से ली थी और कानूनी तौर पर तय समय सीमा के अंदर ही चार्जशीट दाखिल कर दी थी। जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने रियाज अहमद हाजम और एक अन्य आरोपी की अपील को खारिज कर दिया। इस अपील में उन्होंने बारामूला की स्पेशल एनआईए/यूएपीए कोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी थी जिनमें उनकी कानूनी या डिफॉल्ट बेल की अर्जी को नामंजूर कर दिया गया था।
यह मामला उड़ी में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। 18 जून, 2021 को पुलिस ने एक गाड़ी को रोका था और कथित तौर पर उससे चीनी पिस्तौल की मैगजीन, कारतूस, ग्रेनेड, हेरोइन और तीन लाख रुपये कैश बरामद किए थे। इसके बाद हुई जांच में कई आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया और हथियार, विस्फोटक, नशीले पदार्थ और कैश की और भी बरामदगियां हुईं।
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अपील करने वालों ने दलील दी कि एनडीपीएस एक्ट के तहत चार्जशीट 27 दिसंबर, 2021 को ही दाखिल कर दी गई थी जबकि गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) एक्ट के तहत अपराधों से जुड़ी चार्जशीट काफी बाद में, 12 मार्च 2022 को दाखिल की गई। उन्होंने यह भी कहा कि प्रॉसिक्यूशन कानूनी तौर पर तय समय सीमा के अंदर जांच पूरी करने में नाकाम रहा और उसने जान-बूझकर टुकड़ों में चार्जशीट दाख़िल की ताकि आरोपियों के डिफॉल्ट बेल के अधिकार को खत्म किया जा सके।
इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने फैसला दिया कि स्पेशल कोर्ट ने जांच की प्रगति और प्रॉसिक्यूशन की ओर से बताए गए कारणों से संतुष्ट होने के बाद, एनडीपीएस एक्ट की धारा 36ए के तहत जांच की समय सीमा को 15 दिनों के लिए कानूनी तौर पर बढ़ा दिया था। बेंच ने यह भी कहा कि ज़ब्त किए गए मोबाइल फोन की एक्सपर्ट जांच रिपोर्ट अभी आनी बाकी थी, कुछ और आरोपियों को अभी गिरफ्तार किया जाना बाकी था और यूएपीए के तहत मंजूरी मिलने की प्रक्रिया अभी चल ही रही थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि एनडीपीएस एक्ट और यूएपीए, दोनों ही विशेष कानून हैं और इनकी व्याख्या एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाते हुए ही की जानी चाहिए। कोर्ट ने फैसला दिया कि स्पेशल कोर्ट के पास एनडीपीएस एक्ट के तहत जांच की समय सीमा बढ़ाने का पूरा अधिकार है, भले ही वह ऐसा मामला हो जिसमें दोनों ही कानूनों के तहत अपराध शामिल हों।
यह मानते हुए कि अपीलकर्ताओं को डिफॉल्ट जमानत का कोई अटूट अधिकार प्राप्त नहीं हुआ था, हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेशों में कोई भी गैर-कानूनी बात या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं पाई और अपील के साथ-साथ सभी संबंधित आवेदनों को खारिज कर दिया। यदि कोई अंतरिम निर्देश थे तो उन्हें भी रद्द कर दिया गया।
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने उड़ी में हथियार, विस्फोटक, हेरोइन और कैश बरामद होने से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल नार्को-टेरर केस में दो आरोपियों की डिफॉल्ट बेल नामंजूर करने के फैसले को सही ठहराया है।
कोर्ट ने फैसला दिया कि प्रॉसिक्यूशन ने जांच के लिए समय बढ़ाने की मंजूरी सही तरीके से ली थी और कानूनी तौर पर तय समय सीमा के अंदर ही चार्जशीट दाखिल कर दी थी। जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने रियाज अहमद हाजम और एक अन्य आरोपी की अपील को खारिज कर दिया। इस अपील में उन्होंने बारामूला की स्पेशल एनआईए/यूएपीए कोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी थी जिनमें उनकी कानूनी या डिफॉल्ट बेल की अर्जी को नामंजूर कर दिया गया था।
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यह मामला उड़ी में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। 18 जून, 2021 को पुलिस ने एक गाड़ी को रोका था और कथित तौर पर उससे चीनी पिस्तौल की मैगजीन, कारतूस, ग्रेनेड, हेरोइन और तीन लाख रुपये कैश बरामद किए थे। इसके बाद हुई जांच में कई आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया और हथियार, विस्फोटक, नशीले पदार्थ और कैश की और भी बरामदगियां हुईं।
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अपील करने वालों ने दलील दी कि एनडीपीएस एक्ट के तहत चार्जशीट 27 दिसंबर, 2021 को ही दाखिल कर दी गई थी जबकि गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) एक्ट के तहत अपराधों से जुड़ी चार्जशीट काफी बाद में, 12 मार्च 2022 को दाखिल की गई। उन्होंने यह भी कहा कि प्रॉसिक्यूशन कानूनी तौर पर तय समय सीमा के अंदर जांच पूरी करने में नाकाम रहा और उसने जान-बूझकर टुकड़ों में चार्जशीट दाख़िल की ताकि आरोपियों के डिफॉल्ट बेल के अधिकार को खत्म किया जा सके।
इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने फैसला दिया कि स्पेशल कोर्ट ने जांच की प्रगति और प्रॉसिक्यूशन की ओर से बताए गए कारणों से संतुष्ट होने के बाद, एनडीपीएस एक्ट की धारा 36ए के तहत जांच की समय सीमा को 15 दिनों के लिए कानूनी तौर पर बढ़ा दिया था। बेंच ने यह भी कहा कि ज़ब्त किए गए मोबाइल फोन की एक्सपर्ट जांच रिपोर्ट अभी आनी बाकी थी, कुछ और आरोपियों को अभी गिरफ्तार किया जाना बाकी था और यूएपीए के तहत मंजूरी मिलने की प्रक्रिया अभी चल ही रही थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि एनडीपीएस एक्ट और यूएपीए, दोनों ही विशेष कानून हैं और इनकी व्याख्या एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाते हुए ही की जानी चाहिए। कोर्ट ने फैसला दिया कि स्पेशल कोर्ट के पास एनडीपीएस एक्ट के तहत जांच की समय सीमा बढ़ाने का पूरा अधिकार है, भले ही वह ऐसा मामला हो जिसमें दोनों ही कानूनों के तहत अपराध शामिल हों।
यह मानते हुए कि अपीलकर्ताओं को डिफॉल्ट जमानत का कोई अटूट अधिकार प्राप्त नहीं हुआ था, हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेशों में कोई भी गैर-कानूनी बात या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं पाई और अपील के साथ-साथ सभी संबंधित आवेदनों को खारिज कर दिया। यदि कोई अंतरिम निर्देश थे तो उन्हें भी रद्द कर दिया गया।