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अदालतें अभियोजन की जुबान बनकर काम नहीं कर सकतीं : हाईकोर्ट
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जेएंडके और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने का फैसला करते समय अदालत सिर्फ अभियोजन की बात मानकर उसकी जुबान नहीं बन सकती। उसे रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि आरोपी के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार हैं या नहीं।
सरकार की ओर से दायर एक क्रिमिनल रिविजन याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस संजय धर की बेंच ने भ्रष्टाचार के एक मामले में मंजूर अहमद डार को बरी करने के फैसले को सही ठहराया। यह मामला विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन कश्मीर की ओर से दर्ज एफआईआर से जुड़ा था जिसमें डार (जो सुंबल के तहसील ऑफिस में अर्दली थे) भी आरोपी थे।
यह मामला इन आरोपों से जुड़ा था कि तत्कालीन ऑफिस कानूनगो नजीर अहमद वानी और तहसीलदार सैयद शब्बीर अहमद अंद्राबी ने रेवेन्यू म्यूटेशन (राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव) लागू करने के लिए एक शिकायतकर्ता से 40,000 रुपये की रिश्वत मांगी और ली थी। प्रॉसिक्यूशन के अनुसार, 35,000 रुपये का भुगतान एक बेयरर चेक के जरिए किया गया था जिसे कथित तौर पर नजीर अहमद वानी ने मंज़ूर अहमद डार को कैश कराने के लिए दिया था।
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श्रीनगर। जेएंडके और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने का फैसला करते समय अदालत सिर्फ अभियोजन की बात मानकर उसकी जुबान नहीं बन सकती। उसे रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि आरोपी के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार हैं या नहीं।
सरकार की ओर से दायर एक क्रिमिनल रिविजन याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस संजय धर की बेंच ने भ्रष्टाचार के एक मामले में मंजूर अहमद डार को बरी करने के फैसले को सही ठहराया। यह मामला विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन कश्मीर की ओर से दर्ज एफआईआर से जुड़ा था जिसमें डार (जो सुंबल के तहसील ऑफिस में अर्दली थे) भी आरोपी थे।
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यह मामला इन आरोपों से जुड़ा था कि तत्कालीन ऑफिस कानूनगो नजीर अहमद वानी और तहसीलदार सैयद शब्बीर अहमद अंद्राबी ने रेवेन्यू म्यूटेशन (राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव) लागू करने के लिए एक शिकायतकर्ता से 40,000 रुपये की रिश्वत मांगी और ली थी। प्रॉसिक्यूशन के अनुसार, 35,000 रुपये का भुगतान एक बेयरर चेक के जरिए किया गया था जिसे कथित तौर पर नजीर अहमद वानी ने मंज़ूर अहमद डार को कैश कराने के लिए दिया था।
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