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Srinagar News: कैट ने सरकार को वरिष्ठ अभियोजक की पदोन्नति दावे पर पुनर्विचार के दिए निर्देश
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श्रीनगर। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) ने जम्मू-कश्मीर सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह जम्मू-कश्मीर अभियोजन सेवा के वरिष्ठतम मुख्य अभियोजक शेख मुजफ्फर अहमद की पदोन्नति के दावे की जांच करे। अधिकरण ने कहा है कि उन्हें हालिया पदोन्नति आदेश में बिना कोई कारण बताए बाहर रखा गया है।
कैट ने शेख मुजफ्फर अहमद की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका में सरकार के आदेश संख्या 60-होम ऑफ 2026, दिनांक 27 जनवरी 2026 को चुनौती दी गई थी। इसमें 18 अधिकारियों को उप निदेशक अभियोजन के पद पर पदोन्नत किया गया था जबकि याचिकाकर्ता को कथित रूप से बाहर रखा गया। सीएटी की बेंच के सदस्यों में (न्यायिक) एमएस लतीफ और (प्रशासनिक) प्रशांत कुमार शामिल थे
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वे सबसे वरिष्ठ पात्र अधिकारी हैं। अगस्त 2025 में निदेशक महानिदेशक अभियोजन द्वारा जारी पात्रता सूची में उनका क्रमांक एक था और जनवरी 2024 से ही वे पदोन्नति की सभी शर्तों को पूरा कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना कोई कारण बताए उनकी अनदेखी करना मनमाना, भेदभावपूर्ण व संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन है। अधिकरण ने इस स्तर पर पदोन्नति आदेश के गुण-दोषों पर फैसला करने से परहेज किया और याचिकाकर्ता के वकील की मांग पर याचिका को एक प्रतिनिधित्व के रूप में मानने का निर्देश दिया। अधिकरण ने कहा, सामान्यतः, मूल आवेदन में मांगे गए राहत के आदेश पारित करने से पहले निजी प्रतिवादियों (18 पदोन्नत अधिकारियों) को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था, क्योंकि उनके पीठ पीछे कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता जो उनके हितों को प्रभावित करे।
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अधिकरण ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करें और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप प्रतिनिधित्व पर विचार कर छह सप्ताह के भीतर निर्णय लें। संवाद
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कैट ने शेख मुजफ्फर अहमद की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका में सरकार के आदेश संख्या 60-होम ऑफ 2026, दिनांक 27 जनवरी 2026 को चुनौती दी गई थी। इसमें 18 अधिकारियों को उप निदेशक अभियोजन के पद पर पदोन्नत किया गया था जबकि याचिकाकर्ता को कथित रूप से बाहर रखा गया। सीएटी की बेंच के सदस्यों में (न्यायिक) एमएस लतीफ और (प्रशासनिक) प्रशांत कुमार शामिल थे
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याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वे सबसे वरिष्ठ पात्र अधिकारी हैं। अगस्त 2025 में निदेशक महानिदेशक अभियोजन द्वारा जारी पात्रता सूची में उनका क्रमांक एक था और जनवरी 2024 से ही वे पदोन्नति की सभी शर्तों को पूरा कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना कोई कारण बताए उनकी अनदेखी करना मनमाना, भेदभावपूर्ण व संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन है। अधिकरण ने इस स्तर पर पदोन्नति आदेश के गुण-दोषों पर फैसला करने से परहेज किया और याचिकाकर्ता के वकील की मांग पर याचिका को एक प्रतिनिधित्व के रूप में मानने का निर्देश दिया। अधिकरण ने कहा, सामान्यतः, मूल आवेदन में मांगे गए राहत के आदेश पारित करने से पहले निजी प्रतिवादियों (18 पदोन्नत अधिकारियों) को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था, क्योंकि उनके पीठ पीछे कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता जो उनके हितों को प्रभावित करे।
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अधिकरण ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करें और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप प्रतिनिधित्व पर विचार कर छह सप्ताह के भीतर निर्णय लें। संवाद