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घाटी से लौटे प्रवासी श्रमिकों का छलक दर्द, कहा कश्मरी जन्नत नहीं मौत का घर है 18-13-39
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कश्मीर में टारगेट किलिंग से खौफजदा प्रवासी श्रमिक घाटी छोड़ जम्मू पहुंच रहे हैं। यह श्रमिक परिवार बस और टैक्सी से गृह राज्यों के लिए लोट रहे हैं। इससे जम्मू रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर श्रमिकों की संख्या में बढ़ रही है। जम्मू रेलवे स्टेशन पर टिकट के लिए लंबी कतारें लग रही हैं। अंतर्राज्यीय बस रूट पर वाहनों की संख्या बढ़ा दी गई है।
जम्मू पहुंचे खौफजदा श्रमिकों ने कहा - सुना था कश्मीर जन्नत है, लेकिन यह हमारे जैसे गरीबों के लिए मौत का घर है। कश्मीर संभाग के बडगाम में ईंट भट्टे पर काम वाले पति-पत्नी गोविंदा और रामेश्वरी ने कहा कि सुबह छह बजे जम्मू पहुंचे हैं। आठ महीने से वहीं पर काम कर रहे थे, लेकिन आतंकी हमलों से डर गए हैं। ठेकेदार ने भी हालात ठीक होने तक चले जाने को कह दिया।
बिहार के सीतापुर के श्रमिक मोहन भगत ने कहा कि घर वाले चिंतित हैं। पहले हमें डर नहीं लगता था। इस बार हालात डराने वाले हैं। ठेकेदार ने भी बिना पैसे के भेज दिया। आठ महीने जो कमाया वह ठेकेदार के पास ही रह गया। स्थानीय लोगों ने भी हमें घर चले जाने को कहा। एक अन्य श्रमिक जयचंद ने कहा कि पांच साल से लगातार कश्मीर में ईंट भट्टे पर काम करता हूं। डर तो हमेशा रहता था, लेकिन इस बार स्थिति काफी अलग है। कई दिन से एक कमरे में बंद रहे।
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श्रमिक राकेश कुमार ने कहा कि पहली बार काम करने के लिए श्रीनगर आया था, लेकिन यहां के हालात काफी खराब हैं। भय का माहोल है। जगह-जगह सुरक्षाबलों की तैनाती से माहौल बेहद चिंताजनक है। ठेकेदार ने पैसा नहीं दिया। बच्चों के साथ जैसे तैसे जम्मू पहुंचे हैं। सरकार सुरक्षा नहीं दे सकती तो कम से कम हमारी मेहनत का पैसा तो वापस दिलवाए।
लगातार तीसरे वर्ष आपात घर वापसी
2019 में अनुच्छेद 370, 2020 में लॉकडाउन और 2021 में टारगेट किलिंग की दहशत ने लगातार तीसरे वर्ष प्रवासी श्रमिकों को घाटी में सीजन पूरा होने से पहले ही घर लौटने को मजबूर कर दिया है। श्रमिकों ने कहा कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के समय में भी ऐसा डर नहीं था, जितना आज है। जब भी कश्मीर में हालात खराब होते हैं तो ठेकेदार लोग श्रमिकों को पैसा दिए बिना ही लौटा देते हैं।
जेकेआरटीसी ने लगाईं अतिरिक्त बसें
जम्मू बस स्टैंड से अंतर्राज्यीय रूट पर जाने वाली सरकारी और निजी बसों के यात्रियों में भी प्रवासी श्रमिकों की संख्या बढ़ी है। बसों से श्रमिक गृह राज्यों की ओर रवाना हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर पथ परिवहन निगम ने यात्रियों की संख्या बढ़ते देख पंजाब के लिए अतिरिक्त बसें शुरू की हैं।
पंजाब या हिमाचल चले जाएंगे, यहां नहीं आएंगे
जम्मू। छत्तीसगढ़ की एक महिला श्रमिक ने कहा - रोजी रोटी की तलाश में कश्मीर गए थे। पहली बार यहां आकर हमें पता चल गया कश्मीर जन्नत है या जहन्नुम। एक ही पल में सब कुछ देख लिया। जैसे तैसे अब सिर्फ घर पहुंचना है। रोजी रोटी के लिए पंजाब, हिमाचल या हरियाणा में काम कर लेंगे लेकिन कश्मीर नहीं जाएंगे। पंजाब के लुधियाना से आए काला राम ने कहा कि वे पहले भी यहां आते रहे हैं। इस बार तौबा करके लौट रहे हैं। सेना ने अपने ट्रक भेजकर मदद की। हमने क्या बिगाड़ा है यह समझ नहीं आ रहा। कश्मीर में लोगाें के गंदे जूते साफ करके रोजी रोटी कमा रहे थे। अब यह काम कहीं और कर लेंगे।
घाटी के मिनी बिहार में दहशत
कुलगाम। जिले के वांपोह को मिनी बिहार कहा जाता है। यहां बिहार के श्रमिकों की ज्यादा संख्या है। बिहार के मजदूर अफजल अहमद ने कहा - मैं दस साल से यहां काम रहा हूं। पहली बार ऐसा खौफ देख रहे हैं। सुबह निकलते थे और रात को लौटते थे। पीछे घर पर सभी अच्छे से रहते थे। अब हम अपने घर जाना चाहते हैं। बहुत से मजदूरों के पास घर जाने के लिए पैसे भी नहीं है। सरकार मदद को आगे आए। एक अन्य मजदूर ने कहा कि रात को लाइट भी नहीं जला सकते। उधर, अनंतनाग में भी बड़ी संख्या में श्रमिक ट्रेन का इंतजार करते नजर आए। संवाद
थाने से फोन आया और प्लेट में ही रह गया खाना
श्रीनगर। उत्तरी कश्मीर के बारामुला के एक गांव में रहने वाले प्रवासी मजदूर मुकेश कुमार ने कहा कि रात को पुलिस स्टेशन से फोन कर बुलाया गया। वे उसे समय पहला निवाला खाने वाले थे। फोन सुनने पर खाना प्लेट में रह गया और वो फौरन थाने पहुंच गए। मुकेश ने कहा कि वह 19 लोग थे, जिसमें से 5 कल देर रात को ही चले गए थे। अब यहां कुछ भी अनहोनी हो सकती है। वह घर लौटना चाहते हैं। बिहार निवासी मोहम्मद सलाम ने कहा कि हालात ठीक नहीं हैं। कई वर्षों से यहां आ रहे हैं लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं देखा। पुलिस सुरक्षा में एक जगह ठहराया गया है। लेकिन अब यहां रहने की कोई वजह नहीं है। वे सही सलामत घर लौटना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश के रहने वाले एक अन्य मजदूर ने कहा कि गोलगप्पे वाले की हत्या के बाद सोचा था हालात ठीक हो जाएंगे। अब तो और भी हालात बिगड़ गए हैं। जहां काम किया, वहां से पैसे लेकर जैसे तैसे घर चले जाएंगे। नौगाम रेलवे स्टेशन पर बिहार के बेतिया से आए बढ़ई दीना लाल ने कहा कि 27 वर्षों से कश्मीर काम करने आते रहे हैं। सब लोगों से अच्छा प्यार मिलता रहा है। कश्मीर उनका दूसरे घर जैसा है, फिलहाल घर जाना होगा। हालात सुधरने पर फिर आना चाहेंगे।
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जम्मू पहुंचे खौफजदा श्रमिकों ने कहा - सुना था कश्मीर जन्नत है, लेकिन यह हमारे जैसे गरीबों के लिए मौत का घर है। कश्मीर संभाग के बडगाम में ईंट भट्टे पर काम वाले पति-पत्नी गोविंदा और रामेश्वरी ने कहा कि सुबह छह बजे जम्मू पहुंचे हैं। आठ महीने से वहीं पर काम कर रहे थे, लेकिन आतंकी हमलों से डर गए हैं। ठेकेदार ने भी हालात ठीक होने तक चले जाने को कह दिया।
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बिहार के सीतापुर के श्रमिक मोहन भगत ने कहा कि घर वाले चिंतित हैं। पहले हमें डर नहीं लगता था। इस बार हालात डराने वाले हैं। ठेकेदार ने भी बिना पैसे के भेज दिया। आठ महीने जो कमाया वह ठेकेदार के पास ही रह गया। स्थानीय लोगों ने भी हमें घर चले जाने को कहा। एक अन्य श्रमिक जयचंद ने कहा कि पांच साल से लगातार कश्मीर में ईंट भट्टे पर काम करता हूं। डर तो हमेशा रहता था, लेकिन इस बार स्थिति काफी अलग है। कई दिन से एक कमरे में बंद रहे।
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श्रमिक राकेश कुमार ने कहा कि पहली बार काम करने के लिए श्रीनगर आया था, लेकिन यहां के हालात काफी खराब हैं। भय का माहोल है। जगह-जगह सुरक्षाबलों की तैनाती से माहौल बेहद चिंताजनक है। ठेकेदार ने पैसा नहीं दिया। बच्चों के साथ जैसे तैसे जम्मू पहुंचे हैं। सरकार सुरक्षा नहीं दे सकती तो कम से कम हमारी मेहनत का पैसा तो वापस दिलवाए।
लगातार तीसरे वर्ष आपात घर वापसी
2019 में अनुच्छेद 370, 2020 में लॉकडाउन और 2021 में टारगेट किलिंग की दहशत ने लगातार तीसरे वर्ष प्रवासी श्रमिकों को घाटी में सीजन पूरा होने से पहले ही घर लौटने को मजबूर कर दिया है। श्रमिकों ने कहा कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के समय में भी ऐसा डर नहीं था, जितना आज है। जब भी कश्मीर में हालात खराब होते हैं तो ठेकेदार लोग श्रमिकों को पैसा दिए बिना ही लौटा देते हैं।
जेकेआरटीसी ने लगाईं अतिरिक्त बसें
जम्मू बस स्टैंड से अंतर्राज्यीय रूट पर जाने वाली सरकारी और निजी बसों के यात्रियों में भी प्रवासी श्रमिकों की संख्या बढ़ी है। बसों से श्रमिक गृह राज्यों की ओर रवाना हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर पथ परिवहन निगम ने यात्रियों की संख्या बढ़ते देख पंजाब के लिए अतिरिक्त बसें शुरू की हैं।
पंजाब या हिमाचल चले जाएंगे, यहां नहीं आएंगे
जम्मू। छत्तीसगढ़ की एक महिला श्रमिक ने कहा - रोजी रोटी की तलाश में कश्मीर गए थे। पहली बार यहां आकर हमें पता चल गया कश्मीर जन्नत है या जहन्नुम। एक ही पल में सब कुछ देख लिया। जैसे तैसे अब सिर्फ घर पहुंचना है। रोजी रोटी के लिए पंजाब, हिमाचल या हरियाणा में काम कर लेंगे लेकिन कश्मीर नहीं जाएंगे। पंजाब के लुधियाना से आए काला राम ने कहा कि वे पहले भी यहां आते रहे हैं। इस बार तौबा करके लौट रहे हैं। सेना ने अपने ट्रक भेजकर मदद की। हमने क्या बिगाड़ा है यह समझ नहीं आ रहा। कश्मीर में लोगाें के गंदे जूते साफ करके रोजी रोटी कमा रहे थे। अब यह काम कहीं और कर लेंगे।
घाटी के मिनी बिहार में दहशत
कुलगाम। जिले के वांपोह को मिनी बिहार कहा जाता है। यहां बिहार के श्रमिकों की ज्यादा संख्या है। बिहार के मजदूर अफजल अहमद ने कहा - मैं दस साल से यहां काम रहा हूं। पहली बार ऐसा खौफ देख रहे हैं। सुबह निकलते थे और रात को लौटते थे। पीछे घर पर सभी अच्छे से रहते थे। अब हम अपने घर जाना चाहते हैं। बहुत से मजदूरों के पास घर जाने के लिए पैसे भी नहीं है। सरकार मदद को आगे आए। एक अन्य मजदूर ने कहा कि रात को लाइट भी नहीं जला सकते। उधर, अनंतनाग में भी बड़ी संख्या में श्रमिक ट्रेन का इंतजार करते नजर आए। संवाद
थाने से फोन आया और प्लेट में ही रह गया खाना
श्रीनगर। उत्तरी कश्मीर के बारामुला के एक गांव में रहने वाले प्रवासी मजदूर मुकेश कुमार ने कहा कि रात को पुलिस स्टेशन से फोन कर बुलाया गया। वे उसे समय पहला निवाला खाने वाले थे। फोन सुनने पर खाना प्लेट में रह गया और वो फौरन थाने पहुंच गए। मुकेश ने कहा कि वह 19 लोग थे, जिसमें से 5 कल देर रात को ही चले गए थे। अब यहां कुछ भी अनहोनी हो सकती है। वह घर लौटना चाहते हैं। बिहार निवासी मोहम्मद सलाम ने कहा कि हालात ठीक नहीं हैं। कई वर्षों से यहां आ रहे हैं लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं देखा। पुलिस सुरक्षा में एक जगह ठहराया गया है। लेकिन अब यहां रहने की कोई वजह नहीं है। वे सही सलामत घर लौटना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश के रहने वाले एक अन्य मजदूर ने कहा कि गोलगप्पे वाले की हत्या के बाद सोचा था हालात ठीक हो जाएंगे। अब तो और भी हालात बिगड़ गए हैं। जहां काम किया, वहां से पैसे लेकर जैसे तैसे घर चले जाएंगे। नौगाम रेलवे स्टेशन पर बिहार के बेतिया से आए बढ़ई दीना लाल ने कहा कि 27 वर्षों से कश्मीर काम करने आते रहे हैं। सब लोगों से अच्छा प्यार मिलता रहा है। कश्मीर उनका दूसरे घर जैसा है, फिलहाल घर जाना होगा। हालात सुधरने पर फिर आना चाहेंगे।