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राजोरी के पंगाई के जंगलो मे छिपे आतंकवादियों को ढेर करने के लिए अभियान जारी
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राजोरी। जिले की थन्नामंडी तहसील के पंगाई और देरा की गली के जंगलों में छिपे आतंकियों को मार गिराने के लिए सर्च ऑपरेशन लगातार जारी है। वहीं पुंछ के मेंढर में चल रही मुठभेड़ जम्मू और कश्मीर की पीर पंजाल रेंज में डेढ़ दशक की अब तक की सबसे घातक मुठभेड़ मानी जा रही है। इसमें सेना को नौ जवान शहीद हो गए, लेकिन अब तक आतंकवादियों का पता नहीं चला है।
मुठभेड़ 10 और 11 अक्टूबर की रात को देरा की गली पर्यटन स्थल के पास चमरेर वन क्षेत्र में शुरू हुई, जिसमें एक जेसीओ सहित सेना के पांच जवान आतंकवादियों और सेना की टीमों के बीच गोलीबारी के दौरान शहीद हुए थे। पुंछ के मेंढर और राजोरी के पंगाई के जंगलों में अभी भी जारी आतंकवाद विरोधी अभियान और तलाशी अभियान सोमवार को आठवें दिन में प्रवेश कर गया।
8 दिन से जारी इस मुठभेड़ में जहां सेना ने दो अधिकारियों सहित नौ जवानों को खोया है, वहीं अब तक एक भी आतंकवादी को ढेर करने में सफलता प्राप्त नहीं हुई है। वर्ष 2000 से 2005 के बीच जब आतंकवाद राजोेरी-पुंछ में चरम पर था। तभी इस तरह की मुठभेड़ हुआ करती थी, जिसमें सेना को नुकसान उठाना पड़ता था, लेकिन करीब डेढ़ दशक बाद इतनी घातक मुठभेड़ सेना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन रही है। सुलभता है कि जब तक स्थानीय लोगों की मदद आतंकवादियों को नहीं मिलती, तो इस तरह की लंबे समय तक चलने वाली मुठभेड़ सफल नहीं हो पाती। कई दिन से सेना के जवान जंगलों में आतंकवादियों की तलाश कर रहे हैं, लेकिन उन तक पहुंच पाना संभव इसलिए भी नहीं हो पा रहा, क्योंकि एक तो बहुत घने जंगल हैं और दूसरा स्थानीय लोगोें की भी उनको मदद मिल रही है।
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सूत्रों के अनुसार जब तक स्थानीय लोग या आतंकवादियों के ओवर ग्राउंड वर्कर उनकी मदद नहीं करते तब तक बाहर से आए आतंकवादियों के लिए इतने घने जंगल में छिप कर रह पाना संभव नहीं हो पाता।
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मुठभेड़ 10 और 11 अक्टूबर की रात को देरा की गली पर्यटन स्थल के पास चमरेर वन क्षेत्र में शुरू हुई, जिसमें एक जेसीओ सहित सेना के पांच जवान आतंकवादियों और सेना की टीमों के बीच गोलीबारी के दौरान शहीद हुए थे। पुंछ के मेंढर और राजोरी के पंगाई के जंगलों में अभी भी जारी आतंकवाद विरोधी अभियान और तलाशी अभियान सोमवार को आठवें दिन में प्रवेश कर गया।
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8 दिन से जारी इस मुठभेड़ में जहां सेना ने दो अधिकारियों सहित नौ जवानों को खोया है, वहीं अब तक एक भी आतंकवादी को ढेर करने में सफलता प्राप्त नहीं हुई है। वर्ष 2000 से 2005 के बीच जब आतंकवाद राजोेरी-पुंछ में चरम पर था। तभी इस तरह की मुठभेड़ हुआ करती थी, जिसमें सेना को नुकसान उठाना पड़ता था, लेकिन करीब डेढ़ दशक बाद इतनी घातक मुठभेड़ सेना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन रही है। सुलभता है कि जब तक स्थानीय लोगों की मदद आतंकवादियों को नहीं मिलती, तो इस तरह की लंबे समय तक चलने वाली मुठभेड़ सफल नहीं हो पाती। कई दिन से सेना के जवान जंगलों में आतंकवादियों की तलाश कर रहे हैं, लेकिन उन तक पहुंच पाना संभव इसलिए भी नहीं हो पा रहा, क्योंकि एक तो बहुत घने जंगल हैं और दूसरा स्थानीय लोगोें की भी उनको मदद मिल रही है।
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सूत्रों के अनुसार जब तक स्थानीय लोग या आतंकवादियों के ओवर ग्राउंड वर्कर उनकी मदद नहीं करते तब तक बाहर से आए आतंकवादियों के लिए इतने घने जंगल में छिप कर रह पाना संभव नहीं हो पाता।