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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   one training who will change life of soldier

ये है वो ट्रेनिंग जो बनाती है फौजियों को सबसे तेज

Tue, 31 Dec 2013 11:34 AM IST
राघवेंद्र नारायण मिश्र, जम्मू
राघवेंद्र नारायण मिश्र, जम्मू Updated Tue, 31 Dec 2013 11:34 AM IST
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one training who will change life of soldier

भारत-पाक नियंत्रण रेखा की अग्रिम चौकी से। दुश्मन की चुनौतियां जितनी जटिल होती हैं, जवानों का हौसला उतना ही बढ़ता है।

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एलओसी पर तैनात जवानों का सिर्फ एक ही मकसद है कि किसी भी कीमत पर आतंकी घुसपैठ को रोकना और दुश्मन को करारा जवाब। आतंकी घुसपैठ रोकने के लिए छह स्तरीय पुख्ता व्यवस्था है। दुश्मन को पहले अग्रिम चौकियां रोकती हैं। जहां रोकने का मतलब होता है-दुश्मन को ढेर करना।

सपोर्ट देने के लिए भी अलग से चौकियां
इन चौकियों को सपोर्ट देने के लिए भी अलग से चौकियां हैं। एलओसी पर कुछ इलाकों में बिछाई गई माइंस भी आतंकी घुसपैठ को रोकती हैं। इन सब बाधाओं को पार कर दुश्मन अंदर आ गया तो घात लगाए जवानों की गोलियां उनका काम तमाम करती हैं।
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इसके बाद तारबंदी है, जो चार स्तरीय है। इनमें आवश्यकता अनुसार करंट भी प्रवाहित किया जाता है। इन्हें रात में रोशन रखने के लिए इसके किनारे लाइंटिग की व्यवस्था है, जिसके लिए दर्जनों बड़े जेनरेटर रात भर चलते हैं।
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इस तारबंदी के गेट बंद कर देने के बाद आतंकी के अंदर दाकिल होने की आशंका समाप्त हो जाती है। हालांकि कई बार आतंकी इन सारी व्यवस्था और बाधाओं को पार करने में सफल हो जाते हैं लेकिन सेना की अथक कोशिश से इसकी संभावना कम ही रहती है।

अग्रिम चौकियों पर अंधेरा रहता है लेकिन तारबंदी (फेंसिंग) रोशन रहती है। तारबंदी पर कुछ हरकत होते ही सर्विलांस पर पता चल जाता है।

सूचना तंत्र चौकियों को खबर दे देता है। पुंछ से आगे एक चौकी के पास ही हमारे दौरे के दौरान एक ग्रेनेड मिला जो पुराना था। फिर रात में ही तीन फायरिंग होने और घुसपैठ की आशंका की खबर मिली। रात भर हमारे साथ घूम रहे सीओ तुरंत घटना वाले इलाके को कूच कर गए।

इस सूचना से हर कोने पर तेज हो गया तलाशी अभियान। चूंकि आतंकियों को कई बार स्थानीय संरक्षण हासिल होता है, इसलिए उनकी तलाश में वक्त ज्यादा लगता है।

एलओसी पर हर चुनौती का सामना करने के लिए जवानों को खास तरीके का प्रशिक्षण दिया जाता है। कोर बैटल स्कूल की स्थापना इसी मकसद से की गई है।

इन केंद्र पर पतली रस्सी पर चलकर खाई पार करना, लंबी कूद से खाई पार करना, टनल के बीच तंग रास्ते से गुजरना, मकड़ी नेट पर हथियार लेकर चढ़ना उतरना, एक-दूसरे से बंधे टायरों के सहारे ऊंची चोटी पर पहुंचना, करवट के सहारे लोटते हुए नंगी तारों के बीच में से निकलने जैसे प्रशिक्षण दिए जाते हैं।

यह प्रशिक्षण सीआरपीएफ, बीएसएफ और आर्मी के सभी यूनिटों के जवानों के लिए होता है। अब तक 12 हजार से अधिक जवान यहां से प्रशिक्षण पा चुके हैं। चूंकि अपने समाज के ही गुमराह लोगों से मुकाबला होता है इसलिए जावानों को दिल और दिमाग को जीतने की कला भी सिखाई जाती है।


22 मिनट में 23 बाधाएं दूर
स्कूल में प्रशिक्षण के दौरान 23 बाधाओं को 22 मिनट में पार करना होता है। इसके अलावा काउंटर इंसरजेंसी और घुसपैठ रोकने के अन्य तरीकों के अलावा स्नाइपर्स शाट जैसे खतरों से खुद को बचाने का प्रशिक्षण भी जवान लेते हैं। जवानों को मनोवैज्ञानिक तरीके से भी मजबूत बनाया जाता है।

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