{"_id":"9d228a3109c551db8095b4096020c5e2","slug":"laddakh-bihar-songs","type":"story","status":"publish","title_hn":"लद्दाख में बसा मिनी बिहार जहां गूंजते हैं भोजपुरी गीत ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लद्दाख में बसा मिनी बिहार जहां गूंजते हैं भोजपुरी गीत
वंदना
Updated Wed, 09 Oct 2013 11:50 AM IST
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कहते हैं दुनिया गोल है। आज के दौर में आप किसी भी कोने में चले जाइए, आपको वहां किसी दूसरे छोर से आए लोग मिल ही जाएंगे। मेरे लद्दाख दौरे के दौरान भी ऐसा ही हुआ।
आमतौर पर वहां मुझे या तो स्थानीय लोग दिखे या विदेशी सैलानी और कुछ भारतीय पर्यटक। लेकिन एक दिन शाम को लेह कस्बे के बीचों-बीच गुजरते हुए कुछ अलग बोली कानों में पडी। मैने देखा कि एक चौराहे पर लोगों का बडा सा झुंड बैठा है।
पूछने पर पता चला कि बडी संख्या में लोग बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से लद्दाख की ठंड में काम करने आते हैं। कहां गंगा किनारे वाला बिहार और कहां कडाके की ठिठुरन वाले हिमालय में बसा लद्दाख।
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बस अगले दिन सुबह-सुबह पता ढूंढते ढूंढते मैं लद्दाख के उस इलाके में आ पहुंची जहां इन लोगों ने अपनी बस्ती बना रखी है। तंग गली से होते हुए मैं उनके किराए के मकान पर पहुंची।
छोटे-छोटे कमरे, उसी में रसोईघर, कुछ बर्तन, कपडे लत्ते।।। मानो पूरा घर एक छोटे से कमरे के एक कोने में सिमट गया हो। खैर मैंने अपना परिचय दिया और बातचीत शुरू हुई।
पहले सज्जन ने बताया, “मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं, लखनऊ से। पहले दो महीने के लिए आया था। वहां वेतन कम मिलता था। बस यही है।” बातचीत में हिचकिचाहट थी और बातचीत का सिलसिला शुरू में कुछ जमा नहीं।
लेकिन बात जब अपनी मिट्टी, अपने घर की हो तो दिल की बात बाहर आने में, अपनी टीस बताने में ज्यादा देर नहीं लगती।
अनूप कुमार ने बताया, "मैं सिवान जिला का रहने वाला हूं और तीन साल से यहां रहता हूं। यहां पलम्बिंग का काम करता हूं। पहली बार यहां आया तो अच्छा नहीं लगा था। पर क्या करें पैसे के लिए कहीं तो मन लगाना ही पडेगा।"
'बीवी बच्चे याद आते हैं'
वहीं बिस्तर पर बैठे शर्मा राम का कहना था, "मैं बेतिया जिले से हूं। पहले ड्राइवर का काम करता था, ट्रक ड्राइवर। लद्दाख में रहने वाले संदीप भइया ने मुझे यहां बुलाया। बस पहली बार यहां आया हूं। यहां बीवी भी याद आती है और बच्चे भी याद आते हैं। पर पैसे के लिए हम लोग दबकर रह जाते हैं। यही तो हम लोगों की बदनसीबी है।"
घर-परिवार से दूर रहने की टीस सबकी बातों में रह-रह कर बाहर आ रही थी। जैसे ही मैने पूछा कि कितने लोगों की शादी हो चुकी है तो प्रदीप कुमार का जैसे दर्द छलक गया।
वो हाथ में माइक लेते हुए बोले, "अभी इसी साल जनवरी में शादी हुई है। उनकी याद मुझे बहुत आती है। वो मुझे अच्छी लगती हैं लेकिन दुख की बात है कि शादी के कुछ समय बाद ही मैं लद्दाख चला आया। उनके दिल पर क्या गुजरती होगी। जो मेरे दिल पर गुज़रती है वो उनके दिल पर भी गुज़रती होगी।"
एक स्वर में सबने बताया कि कैसे बिहार में रोजगार की कमी के कारण वे मीलों दूर चंद पैसे कमाने के लिए लद्दाख में रहते हैं जहां का खान-पान, बोली, संस्कृति, मौसम बिल्कुल अलग है।
'लद्दाख के लोग बहुत अच्छे हैं'
कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके घर वाले बिहार से 30-40 साल पहले लद्दाख आए थे और यहीं के होकर रह गए। इन लोगों में बिहार और लद्दाख दोनों बसता है पर अब इनका दिल लद्दाख का हो चुका है।
संदीप उन्हीं लोगों में से एक हैं और बिहार से कई लोगों को लद्दाख लाने में उनकी भूमिका रही है। वे बताते हैं, "हमारे पिता जी कोई 35 साल से यहीं रहते आए हैं। वो बिहार नहीं गए इसलिए हम भी यहीं पले बढे। पढाई भी यहीं की है। इसलिए अब यहीं पर अच्छा लगता है। लद्दाख के लोग भी बहुत अच्छे हैं।"
संदीप जितने फर्रोटे से भोजपुरी बोल लेते हैं उतनी ही स्पष्टता से लद्दाख की बोली में भी बातचीत करते हैं। दबे स्वर में ही सही पर हमारी गुजारिश पर उन्होंने चंद लाइनें लद्दाख की भाषा में भी बोलकर सुनाई जिस पर खूब ताली बजी।
जाहिर है मुश्किलें कई हैं, लेकिन बहुत सी ऐसी बातें भी हैं जो बिहार के इन लोगों को लद्दाख में भा गई हैं। बिहार से ही आए ज्योतिष कुमार की बात मुझे सबसे अलग लगी। बडी मासूमियत से उन्होंने बताया, "काफी साल पहले एक फिल्म आई थी दिलजले जिसमें पहाडों का सीन आया था। वही सीन देखने के लिए मैं इधर आया।"
कइयों का मानना है कि बिहार में कई कमियां और दिक्कते हैं जो लद्दाख में झेलनी नहीं पडती।
शर्मा राम कहते हैं, "बिहार में हमारी पढाई लिखाई नहीं हो पाई, लालू राज का असर था। अब यहां आए हैं। जैसे लद्दाख का पानी साफ वैसे ही यहां के लोगों का दिल साफ है।"
वहीं संदीप का मानना है कि बिहार में चोरी-चकारी की बहुत शिकायतें रहती हैं पर लद्दाख में ऐसा कुछ भी नहीं।
'बिहार भी एक दिन जन्नत बन जाएगा'
प्रदीप कुमार ने पूरा समीकरण समझाते हुए कहा, "बिहार में कई दिक्कते थीं। जनसंख्या ज्यादा है, मां-बाप बच्चों को पढाते नहीं थे। सडक बिजली की बहुत तंगी रही है। शिक्षा की कमी है। लेकिन आज बिहार में बहुत बदलाव आया है। गरीब भी बच्चों को पढाना चाहता है। लोग सरकार से लडने के लिए तैयार हैं। पहले के हमारे बुजुर्ग बस जाते थे, मूंछ ऐंठ लेंगे और बैठे रहेंगे। लेकिन अब लोग मूंछ ऊपर कर के, सीना चौडा करके अपना हक मांगने लगे हैं। हमारे समय में तो नहीं लेकिन लगता है कि हमारे बच्चों के आते-आते अपना बिहार भी एक दिन जन्नत बन जाएगा।"
एक ओर पैसे कमाने की ललक और दूसरी ओर घर परिवार की याद। इन्हीं के बीच झूलते रहते हैं ये लोग। इसी में थोडी मस्ती, लिट्टी चोखा, भोजपुरी में हंसी ठट्ठा ये सब भी चलता रहा है। जब बात खाने और भोजपुरी गीत-संगीत की चली तो शर्मा राम की आंखों में जैसे चमक आ गई है।
पास में पडे म्यूजिक सिस्टम की ओर इशारा करते हुए वे भोजपुरी वे बोले, "उधर चलता है कि दुल्हिन रहे बीमार निरहुआ सटल रहे। उधर से लावे नी जा। हमनी के एहिजा बजावेनीजा। ओतने में हमनी के दिलचस्बी रहेगा। एहिजा के गाना एहिजा रहेला और हमनी के गाना अलगे रहेला। ओन्हिये से भराके ले आवे नि जा, एने बस मन लगावे ला।"
(कहने का मतलब ये कि यहां का गाना यहां रहता है और हम लोगों का गाना अलग ही होता है। उधर से ही भरा कर ले आते हैं, यहां तो वही मन लगाता है।)
इसी तरह बातें-बातें करते कब एक घंटा निकल गया पता ही नहीं चला। भारत में, भारत से बाहर ऐसे कितने ही लोग हैं जो रोजी रोटी की खातिर अपनों से दूर मुश्किलों में जीवन बिताते हैं। लेकिन कहीं न कहीं परदेस की खुशबु में रच बस भी जाते हैं। जैसे लद्दाख में बसा ये मिनी बिहार।।।
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आमतौर पर वहां मुझे या तो स्थानीय लोग दिखे या विदेशी सैलानी और कुछ भारतीय पर्यटक। लेकिन एक दिन शाम को लेह कस्बे के बीचों-बीच गुजरते हुए कुछ अलग बोली कानों में पडी। मैने देखा कि एक चौराहे पर लोगों का बडा सा झुंड बैठा है।
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पूछने पर पता चला कि बडी संख्या में लोग बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से लद्दाख की ठंड में काम करने आते हैं। कहां गंगा किनारे वाला बिहार और कहां कडाके की ठिठुरन वाले हिमालय में बसा लद्दाख।
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छोटे-छोटे कमरे, उसी में रसोईघर, कुछ बर्तन, कपडे लत्ते।।। मानो पूरा घर एक छोटे से कमरे के एक कोने में सिमट गया हो। खैर मैंने अपना परिचय दिया और बातचीत शुरू हुई।
पहले सज्जन ने बताया, “मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं, लखनऊ से। पहले दो महीने के लिए आया था। वहां वेतन कम मिलता था। बस यही है।” बातचीत में हिचकिचाहट थी और बातचीत का सिलसिला शुरू में कुछ जमा नहीं।
लेकिन बात जब अपनी मिट्टी, अपने घर की हो तो दिल की बात बाहर आने में, अपनी टीस बताने में ज्यादा देर नहीं लगती।
अनूप कुमार ने बताया, "मैं सिवान जिला का रहने वाला हूं और तीन साल से यहां रहता हूं। यहां पलम्बिंग का काम करता हूं। पहली बार यहां आया तो अच्छा नहीं लगा था। पर क्या करें पैसे के लिए कहीं तो मन लगाना ही पडेगा।"
'बीवी बच्चे याद आते हैं'
वहीं बिस्तर पर बैठे शर्मा राम का कहना था, "मैं बेतिया जिले से हूं। पहले ड्राइवर का काम करता था, ट्रक ड्राइवर। लद्दाख में रहने वाले संदीप भइया ने मुझे यहां बुलाया। बस पहली बार यहां आया हूं। यहां बीवी भी याद आती है और बच्चे भी याद आते हैं। पर पैसे के लिए हम लोग दबकर रह जाते हैं। यही तो हम लोगों की बदनसीबी है।"
घर-परिवार से दूर रहने की टीस सबकी बातों में रह-रह कर बाहर आ रही थी। जैसे ही मैने पूछा कि कितने लोगों की शादी हो चुकी है तो प्रदीप कुमार का जैसे दर्द छलक गया।
वो हाथ में माइक लेते हुए बोले, "अभी इसी साल जनवरी में शादी हुई है। उनकी याद मुझे बहुत आती है। वो मुझे अच्छी लगती हैं लेकिन दुख की बात है कि शादी के कुछ समय बाद ही मैं लद्दाख चला आया। उनके दिल पर क्या गुजरती होगी। जो मेरे दिल पर गुज़रती है वो उनके दिल पर भी गुज़रती होगी।"
एक स्वर में सबने बताया कि कैसे बिहार में रोजगार की कमी के कारण वे मीलों दूर चंद पैसे कमाने के लिए लद्दाख में रहते हैं जहां का खान-पान, बोली, संस्कृति, मौसम बिल्कुल अलग है।
'लद्दाख के लोग बहुत अच्छे हैं'
कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके घर वाले बिहार से 30-40 साल पहले लद्दाख आए थे और यहीं के होकर रह गए। इन लोगों में बिहार और लद्दाख दोनों बसता है पर अब इनका दिल लद्दाख का हो चुका है।
संदीप उन्हीं लोगों में से एक हैं और बिहार से कई लोगों को लद्दाख लाने में उनकी भूमिका रही है। वे बताते हैं, "हमारे पिता जी कोई 35 साल से यहीं रहते आए हैं। वो बिहार नहीं गए इसलिए हम भी यहीं पले बढे। पढाई भी यहीं की है। इसलिए अब यहीं पर अच्छा लगता है। लद्दाख के लोग भी बहुत अच्छे हैं।"
संदीप जितने फर्रोटे से भोजपुरी बोल लेते हैं उतनी ही स्पष्टता से लद्दाख की बोली में भी बातचीत करते हैं। दबे स्वर में ही सही पर हमारी गुजारिश पर उन्होंने चंद लाइनें लद्दाख की भाषा में भी बोलकर सुनाई जिस पर खूब ताली बजी।
जाहिर है मुश्किलें कई हैं, लेकिन बहुत सी ऐसी बातें भी हैं जो बिहार के इन लोगों को लद्दाख में भा गई हैं। बिहार से ही आए ज्योतिष कुमार की बात मुझे सबसे अलग लगी। बडी मासूमियत से उन्होंने बताया, "काफी साल पहले एक फिल्म आई थी दिलजले जिसमें पहाडों का सीन आया था। वही सीन देखने के लिए मैं इधर आया।"
कइयों का मानना है कि बिहार में कई कमियां और दिक्कते हैं जो लद्दाख में झेलनी नहीं पडती।
शर्मा राम कहते हैं, "बिहार में हमारी पढाई लिखाई नहीं हो पाई, लालू राज का असर था। अब यहां आए हैं। जैसे लद्दाख का पानी साफ वैसे ही यहां के लोगों का दिल साफ है।"
वहीं संदीप का मानना है कि बिहार में चोरी-चकारी की बहुत शिकायतें रहती हैं पर लद्दाख में ऐसा कुछ भी नहीं।
'बिहार भी एक दिन जन्नत बन जाएगा'
प्रदीप कुमार ने पूरा समीकरण समझाते हुए कहा, "बिहार में कई दिक्कते थीं। जनसंख्या ज्यादा है, मां-बाप बच्चों को पढाते नहीं थे। सडक बिजली की बहुत तंगी रही है। शिक्षा की कमी है। लेकिन आज बिहार में बहुत बदलाव आया है। गरीब भी बच्चों को पढाना चाहता है। लोग सरकार से लडने के लिए तैयार हैं। पहले के हमारे बुजुर्ग बस जाते थे, मूंछ ऐंठ लेंगे और बैठे रहेंगे। लेकिन अब लोग मूंछ ऊपर कर के, सीना चौडा करके अपना हक मांगने लगे हैं। हमारे समय में तो नहीं लेकिन लगता है कि हमारे बच्चों के आते-आते अपना बिहार भी एक दिन जन्नत बन जाएगा।"
एक ओर पैसे कमाने की ललक और दूसरी ओर घर परिवार की याद। इन्हीं के बीच झूलते रहते हैं ये लोग। इसी में थोडी मस्ती, लिट्टी चोखा, भोजपुरी में हंसी ठट्ठा ये सब भी चलता रहा है। जब बात खाने और भोजपुरी गीत-संगीत की चली तो शर्मा राम की आंखों में जैसे चमक आ गई है।
पास में पडे म्यूजिक सिस्टम की ओर इशारा करते हुए वे भोजपुरी वे बोले, "उधर चलता है कि दुल्हिन रहे बीमार निरहुआ सटल रहे। उधर से लावे नी जा। हमनी के एहिजा बजावेनीजा। ओतने में हमनी के दिलचस्बी रहेगा। एहिजा के गाना एहिजा रहेला और हमनी के गाना अलगे रहेला। ओन्हिये से भराके ले आवे नि जा, एने बस मन लगावे ला।"
(कहने का मतलब ये कि यहां का गाना यहां रहता है और हम लोगों का गाना अलग ही होता है। उधर से ही भरा कर ले आते हैं, यहां तो वही मन लगाता है।)
इसी तरह बातें-बातें करते कब एक घंटा निकल गया पता ही नहीं चला। भारत में, भारत से बाहर ऐसे कितने ही लोग हैं जो रोजी रोटी की खातिर अपनों से दूर मुश्किलों में जीवन बिताते हैं। लेकिन कहीं न कहीं परदेस की खुशबु में रच बस भी जाते हैं। जैसे लद्दाख में बसा ये मिनी बिहार।।।