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सत्संग में प्रवेश से बढ़ने लगता है विवेक रूपी प्रकाश
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कठुआ। मकर संक्रांति पर अखंड परम धाम आश्रम नौनाथ घगवाल में सत्संग का आयोजन किया गया। इस मौके पर सुभाष शास्त्री ने संगत को अपने प्रवचन से निहाल किया। सुभाष शास्त्री ने सत्संग में कहा कि माघ मकरगत रवि जब होई। तीर्थ पतिहिं आव सब कोई। अर्थात सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर संत-महात्मा और आस्थावान लोग तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी-संगम में स्नान करते हैं तथा वहां वास करने से कल्पवास का फल प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है। इस दिन सूर्यदेव उत्तरायण होकर विशेष फलदायक हो जाते हैं। जैसे सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश होने से रातें छोटी और दिन लंबे होने लगते हैं अर्थात अंधकार घटने और प्रकाश बढ़ने लगता है। ऐसे ही मनुष्य का सत्संग में प्रवेश करने से अज्ञान का अंधकार घटने और विवेक रूपी प्रकाश बढ़ने लगता है।
शास्त्रों में उत्तरायण की अवधिकों देवताओं का दिन बताया गया है। इस संक्रांति के पुण्य काल में स्नान-दान, जप- होम आदि करने का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान दाता को सौ गुना होकर प्राप्त होता है। मकर संक्रांति को खिचड़ी का दान एवं खिचड़ी खाने की भी परंपरा है। तिल से बने पदार्थों का दान भी लोग करते हैं। न्याय-नीतिपूर्वक कमाए गए धन का दान करने से कल्याण होता है। दान सुपात्र को दिया जाए। जो प्राप्त धन को श्रेष्ठ कार्य में लगा सके, वही दान पुण्य फल देने में समर्थ है।
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सत्संग की महिमा को बताते हुए सुभाष शास्त्री ने कहा कि ध्यान से ज्ञान मिलेगा और सत्संग से मुक्ति मिलेगी। जिसे सत्संग मिल जाता है, उसे कल्याण के लिए अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है। लिहाजा सत्संग सर्वोपरि है।
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उन्होंने कहा कि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है। इस दिन सूर्यदेव उत्तरायण होकर विशेष फलदायक हो जाते हैं। जैसे सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश होने से रातें छोटी और दिन लंबे होने लगते हैं अर्थात अंधकार घटने और प्रकाश बढ़ने लगता है। ऐसे ही मनुष्य का सत्संग में प्रवेश करने से अज्ञान का अंधकार घटने और विवेक रूपी प्रकाश बढ़ने लगता है।
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शास्त्रों में उत्तरायण की अवधिकों देवताओं का दिन बताया गया है। इस संक्रांति के पुण्य काल में स्नान-दान, जप- होम आदि करने का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान दाता को सौ गुना होकर प्राप्त होता है। मकर संक्रांति को खिचड़ी का दान एवं खिचड़ी खाने की भी परंपरा है। तिल से बने पदार्थों का दान भी लोग करते हैं। न्याय-नीतिपूर्वक कमाए गए धन का दान करने से कल्याण होता है। दान सुपात्र को दिया जाए। जो प्राप्त धन को श्रेष्ठ कार्य में लगा सके, वही दान पुण्य फल देने में समर्थ है।
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सत्संग की महिमा को बताते हुए सुभाष शास्त्री ने कहा कि ध्यान से ज्ञान मिलेगा और सत्संग से मुक्ति मिलेगी। जिसे सत्संग मिल जाता है, उसे कल्याण के लिए अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है। लिहाजा सत्संग सर्वोपरि है।