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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Kathua News ›   Gandhi Seva Sadan was deserted

कभी कारीगरों से गुलजार रहने वाली इमारत अब वीरान

Sun, 02 Oct 2016 12:42 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/कठुआ
ब्यूरो, अमर उजाला/कठुआ Updated Sun, 02 Oct 2016 12:42 AM IST
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स्वदेशी और खादी के प्रति लोगों की उदासीनता और पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण गांधी सेवा सदन कठुआ लगभग बंद होने के कगार पर है। कभी यहां लाखों का माल तैयार किया जाता था। वर्तमान में गांधी सेवा सदन की उत्पादन क्षमता घटकर मात्र कुछ हजार तक सिमट गई है। आलम यह है कि कभी कारीगरों से गुलजार रहने वाला गांधी सेवा सदन की कठुआ इकाई अब वीरान होती जा रही है।
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कारीगरों को गुमनामी का साया तो मिला ही साथ ही गांधी जी से प्रभावित होकर चलाई गई योजना सिमटने की कगार पर है। वर्ष 1955 में कठुआ में स्थापित श्री गांधी सेवा सदन को लोगों का अधिक सहयोग नहीं मिल रहा है। इसे कई प्रकार के उद्योगों को बढ़ावा देने के साथ ही रोजगार के विकल्प के रूप में भी विकसित किया जा सकता था।
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लोगों के खादी के प्रति घटते रुझान को देखते हुए सरकार ने भी विभाग की तवज्जो नहीं दी और धीरे-धीरे उत्पादन क्षमता घटने के साथ ही इमारत जर्जर स्थिति में पहुंच चुकी है। सात तरह के उत्पाद वर्तमान में भी तैयार किए जाते हैं, लेकिन बाजार में अन्य विकल्पों को देखते हुए गांधी सेवा सदन के उत्पादों को अपना अस्तित्व तलाशना मुश्किल हो गया है।
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एक सेल्समैन और उपलब्धता पर मात्र कुछ ताना बुनने वाले विभाग की साख को बचाए रखने के लिए कार्य कर रहे हैं। हथकरघा को बढ़ावा देने की बजाय हथकरघा के यंत्रों को धूल फांकने के लिए अपने हाल पर ही छोड़ दिया गया है। यही कारण है जिला के बसोहली और भड्डू में चलने वाले दो केंद्र तो बिल्कुल बंद ही हो चुके हैं जबकि कठुआ और हीरानगर में भी सेल नाममात्र ही है।


सिल्क यूनिट के प्रति उदासीन रवैया
लगभग सात साल पहले गांधी सेवा सदन के उत्थान के लिए सिल्क यूनिट स्थापित की गई, जो मात्र एक साल में ही बंद करनी पड़ी। इसके लिए बाकायदा बंगाल से कारीगर भी मंगवाए गए और जोर-शोर से काम शुरू हुआ। कायदे से चलता तो यह यूनिट विभाग का उद्धारक सिद्ध हो सकता था। चूंकि सिल्क को लेकर बाजार में डिमांड अधिक है, लेकिन स्थानीय लोगों के उदासीन रवैये और विभाग द्वारा कन्नी काट लेने से यह यूनिट मात्र एक साल में ही बंद हो गई।
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