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भगवान के बाल रूप की झांकी देख निहाल हुए भक्त
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हीरानगर। गांव देवो चक में जारी श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया। इस मौके पर कथावाचक सुभाष शास्त्री ने श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंद में प्रवेश करने के साथ जैसे ही कृष्ण के जन्म की घोषणा की, हर तरफ हर्ष का माहौल उत्पन्न हो गया। भगवान के आगमन की खुशी में कथावाचक सुभाष शास्त्री की ओर प्रस्तुत भजनों पर श्रद्धालु झूमने लगे। कथा स्थल पर जैसे ही कंस के कारागार से लेकर नंदबाबा के दरबार तक वासुदेव के आने की झांकी प्रस्तुत की गई तो उपस्थित भक्त भगवान के बाल रूप की भव्य झांकी देखने के लिए आतुर दिखे।
इस मौके पर शास्त्री जी ने कहा कि दुख किसी को पसंद नहीं है और सुख भी हम ऐसा चाहते हैं जो सदा रहे। परंतु चाहने पर भी वह नहीं मिल रहा है और दुख न चाहते हुए भी आ जाता है। इसी उधेड़बुन में मनुष्य परेशान है। यदि चाहने से सुख मिलता तो संसार में कोई भी प्राणी दुखी नहीं होता। सांसारिक सुख यदि टिकने वाला होता तो ईश्वर की ओर कोई मन नहीं लगाता। अर्थात असत से सुख होता तो कोई भी सत का संग नहीं करता। मुख्य रूप से हम मन की शांति दुखों की निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति चाहते हैं। लेकिन आनंद हमें केवल सत्संग द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। शास्त्री जी ने कहा कि सुख प्राप्ति की मांग जीव की स्वाभाविक है। दुख इसलिए पसंद नहीं क्योंकि दुख हमारा स्वभाव नहीं है। सुख सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा का अंश है। उसके मिले बिना हमें चैन नहीं मिलेगा।
अंत में उन्होंने कहा कि जैसे धरती से फेंका गया कोई भी पत्थर वापस नीचे धरती पर आता है, क्योंकि वह धरती का अंश है। जबकि दीपक की ज्योति ऊपर की ओर जाती है क्योंकि वह सूर्य का अंश है। ठीक इसी प्रकार जीव को ईश्वर से मिलने बिना शांति नहीं मिल सकती। इसलिए प्रभु की प्राप्ति के लिए सत्संग कर सुखी बने।
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इस मौके पर शास्त्री जी ने कहा कि दुख किसी को पसंद नहीं है और सुख भी हम ऐसा चाहते हैं जो सदा रहे। परंतु चाहने पर भी वह नहीं मिल रहा है और दुख न चाहते हुए भी आ जाता है। इसी उधेड़बुन में मनुष्य परेशान है। यदि चाहने से सुख मिलता तो संसार में कोई भी प्राणी दुखी नहीं होता। सांसारिक सुख यदि टिकने वाला होता तो ईश्वर की ओर कोई मन नहीं लगाता। अर्थात असत से सुख होता तो कोई भी सत का संग नहीं करता। मुख्य रूप से हम मन की शांति दुखों की निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति चाहते हैं। लेकिन आनंद हमें केवल सत्संग द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। शास्त्री जी ने कहा कि सुख प्राप्ति की मांग जीव की स्वाभाविक है। दुख इसलिए पसंद नहीं क्योंकि दुख हमारा स्वभाव नहीं है। सुख सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा का अंश है। उसके मिले बिना हमें चैन नहीं मिलेगा।
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अंत में उन्होंने कहा कि जैसे धरती से फेंका गया कोई भी पत्थर वापस नीचे धरती पर आता है, क्योंकि वह धरती का अंश है। जबकि दीपक की ज्योति ऊपर की ओर जाती है क्योंकि वह सूर्य का अंश है। ठीक इसी प्रकार जीव को ईश्वर से मिलने बिना शांति नहीं मिल सकती। इसलिए प्रभु की प्राप्ति के लिए सत्संग कर सुखी बने।
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