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ज्वाला मां के जयकारों से गूंजी ढग्गर की वादियां
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कठुआ/बनी। बनी के दूरदराज ढग्गर इलाके में बुधवार तड़के पूरा इलाका मां ज्वाला के जयघोष से गूंज उठा। पारंपरिक ढोल और बांसुरी की धुन पर श्रद्धालु रातभर झूमते हुए मां का आह्वान करते रहे। दूरदराज के पहाड़ों पर मशाल ऐसे जल रही थीं, मानो किसी ने एक बड़ी ज्योति प्रज्ज्वलित की हो।
मां ज्वाला के मंदिर की परिक्रमा और फिर एक साथ मशाल को जलाकर उठे अंगार के बीच से गुजरे मंदिर के पुजारी हुक्म चंद ने लोगों को अचंभित कर दिया। इसी के साथ बनी के ढग्गर में ज्वाला मां की वार्षिक जागरण यात्रा संपन्न हो गई। क्षेत्र की सुख समृद्धि और मां ज्वाला की कृपा क्षेत्र के लोगों पर बनी रहे इसी की कामना लिए बड़ी संख्या भक्त यात्रा में शामिल हुए।
स्थानीय लोगों की माने तो ढग्गर के ज्वाला मां मंदिर की मान्यता हिमाचल के ज्वालाजी धाम से जुड़ी है। यहीं से लाकर मां की मूर्ती ढग्गर में स्थापित की गई थी। लोगों ने बताया कि सदियों से गांव में ज्वाला मां की पूजा होती है और क्षेत्र के लोग हर साल यात्रा निकालते हैं। इसमें रात के समय लोग घरों से मशाल लेकर मां का जयघोष करते हुए मंदिर प्रांगण में एकत्र होते हैं।
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सभी मंदिरों की परिक्रमा के उपरांत भक्तों की मशाल एक जगह पर दहन की जाती है, जिससे निकलते अंगारों से पुजारी पैदल सकुशल बाहर निकलते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार बुधवार रात दादा बलिदानू नाग देवता के जागरण के बाद वीरवार को कुड नृत्य से इसका समापन होगा।
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मां ज्वाला के मंदिर की परिक्रमा और फिर एक साथ मशाल को जलाकर उठे अंगार के बीच से गुजरे मंदिर के पुजारी हुक्म चंद ने लोगों को अचंभित कर दिया। इसी के साथ बनी के ढग्गर में ज्वाला मां की वार्षिक जागरण यात्रा संपन्न हो गई। क्षेत्र की सुख समृद्धि और मां ज्वाला की कृपा क्षेत्र के लोगों पर बनी रहे इसी की कामना लिए बड़ी संख्या भक्त यात्रा में शामिल हुए।
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स्थानीय लोगों की माने तो ढग्गर के ज्वाला मां मंदिर की मान्यता हिमाचल के ज्वालाजी धाम से जुड़ी है। यहीं से लाकर मां की मूर्ती ढग्गर में स्थापित की गई थी। लोगों ने बताया कि सदियों से गांव में ज्वाला मां की पूजा होती है और क्षेत्र के लोग हर साल यात्रा निकालते हैं। इसमें रात के समय लोग घरों से मशाल लेकर मां का जयघोष करते हुए मंदिर प्रांगण में एकत्र होते हैं।
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सभी मंदिरों की परिक्रमा के उपरांत भक्तों की मशाल एक जगह पर दहन की जाती है, जिससे निकलते अंगारों से पुजारी पैदल सकुशल बाहर निकलते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार बुधवार रात दादा बलिदानू नाग देवता के जागरण के बाद वीरवार को कुड नृत्य से इसका समापन होगा।