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कलशयात्रा के साथ भागवत कथा हुई शुरू
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हीरानगर के देबो चक में श्रीमद् भगवत कथा के शुभारंभ निकाली गई शोभायात्रा में शामिल संत सुभाष शास्?
- फोटो : KATHUA
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कठुआ। हीरानगर के गांव देबोचक में श्रीमद् भागवत कथा का कलश यात्रा के साथ शुभारंभ किया गया। संत सुभाष शास्त्री की अगुवाई में ढोल नगाड़े के साथ निकाली गई शोभायात्रा में शामिल भक्तों के जयघोष और भजन कीर्तन से माहौल भक्तिमय हो गया था। विधि विधान से पूजन के बाद कलशों की स्थापना के साथ श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ हुआ।
इस मौके पर संत सुभाष शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को श्रीमद् भागवत पुराण महात्म की जानकारी देते हुए कहा कि इसके श्रवण मात्र से हमारे एक जन्म नहीं अपितु हमारे कई जन्मों के पापों का नाश हो जाता है। उपस्थित श्रद्धालुओं को शास्त्री ने बताया कि यदि हमें आंतरिक शांति चाहिए तो अपने कर्तव्य का सदा ही शुद्ध मन से करने की चेष्टा बढ़ानी होगी। साथ ही उस परमात्मा को याद करने के लिए हमें कुछ समय अवश्य निकालना होगा, ताकि हमारे अंदर स्वच्छ विचारों का उदय हो सके। उन्होंने कहा कि हमें अहंकार को त्याग कर ईश्वर की भक्ति करनी होगी, इसी से शांति की प्राप्ति होगी। संत श्री ने कहा कि व्यक्ति के पास सुख सुविधाओं के बहुत साधन हो पर मन को शांति ना हो तो उसे कुछ अच्छा नहीं लगता और जिसके मन में शांति हो उसे किसी भौतिक वस्तु की जरूरत नहीं होती। अगर मन शांत है तो कोई भी अवगुण हमारे अंदर प्रवेश नहीं कर सकता। मन के शांत होने का अर्थ इच्छाओं का समाप्त हो जाना है। जब हमारी इच्छाएं पूरी तरह से शांत हो जाती हैं, तो आम मनुष्य भी महान संत स्वरूप हो जाता है।
शास्त्री जी ने कहा कि कुछ सीमा तक इच्छाओं को नियंत्रण रखने में मन शांत हो सकता है। इच्छाओं से ही सारे अवगुण प्राप्त होते हैं। मोह-माया और अहंकार यह सब इच्छाओं से ही उत्पन्न होते हैं। जितनी अधिक इच्छाएं बढ़ती हैं उतना ही अधिक दुख भोगना पड़ता है। क्योंकि एक जन्म में सभी इच्छाएं मनुष्य की पूरी नहीं होती। मनुष्य के मन में संतोष होना स्वर्ग की प्राप्ति से भी बढ़कर है। मन में संतोष के भली-भांति प्रतिष्ठित हो जाने से जो सुख शांति की प्राप्ति होती है उससे बड़ा संसार में कुछ भी नहीं है। अंत में सामूहिक आरती और प्रसाद वितरण के साथ कथा संपन्न हुई।
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इस मौके पर संत सुभाष शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को श्रीमद् भागवत पुराण महात्म की जानकारी देते हुए कहा कि इसके श्रवण मात्र से हमारे एक जन्म नहीं अपितु हमारे कई जन्मों के पापों का नाश हो जाता है। उपस्थित श्रद्धालुओं को शास्त्री ने बताया कि यदि हमें आंतरिक शांति चाहिए तो अपने कर्तव्य का सदा ही शुद्ध मन से करने की चेष्टा बढ़ानी होगी। साथ ही उस परमात्मा को याद करने के लिए हमें कुछ समय अवश्य निकालना होगा, ताकि हमारे अंदर स्वच्छ विचारों का उदय हो सके। उन्होंने कहा कि हमें अहंकार को त्याग कर ईश्वर की भक्ति करनी होगी, इसी से शांति की प्राप्ति होगी। संत श्री ने कहा कि व्यक्ति के पास सुख सुविधाओं के बहुत साधन हो पर मन को शांति ना हो तो उसे कुछ अच्छा नहीं लगता और जिसके मन में शांति हो उसे किसी भौतिक वस्तु की जरूरत नहीं होती। अगर मन शांत है तो कोई भी अवगुण हमारे अंदर प्रवेश नहीं कर सकता। मन के शांत होने का अर्थ इच्छाओं का समाप्त हो जाना है। जब हमारी इच्छाएं पूरी तरह से शांत हो जाती हैं, तो आम मनुष्य भी महान संत स्वरूप हो जाता है।
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शास्त्री जी ने कहा कि कुछ सीमा तक इच्छाओं को नियंत्रण रखने में मन शांत हो सकता है। इच्छाओं से ही सारे अवगुण प्राप्त होते हैं। मोह-माया और अहंकार यह सब इच्छाओं से ही उत्पन्न होते हैं। जितनी अधिक इच्छाएं बढ़ती हैं उतना ही अधिक दुख भोगना पड़ता है। क्योंकि एक जन्म में सभी इच्छाएं मनुष्य की पूरी नहीं होती। मनुष्य के मन में संतोष होना स्वर्ग की प्राप्ति से भी बढ़कर है। मन में संतोष के भली-भांति प्रतिष्ठित हो जाने से जो सुख शांति की प्राप्ति होती है उससे बड़ा संसार में कुछ भी नहीं है। अंत में सामूहिक आरती और प्रसाद वितरण के साथ कथा संपन्न हुई।
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