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मंत्री-अधिकारियों के 'रखवाले' बिल को हाईकोर्ट में चुनौती
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Mon, 23 Oct 2017 07:26 PM IST
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राजस्थान विधानसभा
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राजस्थान में विधानसभा का सत्र शुरू होते ही हंगामे के बीच सरकार ने आज विवादित बिल सदन के पटल पर रख दिया गया। वहीं, इस बिल के पेश होने के साथ इसके खिलाफ हाईकोर्ट में तीन याचिकाएं दायर की गई हैं।
दरअसल, दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश, 2017 को चुनौती देते हुए आज राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता श्रंजना श्रेष्ठ व अधिवक्ता पीसी भंडारी ने अध्यादेश को जनहित याचिका के जरिए चुनौती दी है। वहीं अधिवक्ता भगवत गौड़ की ओर से याचिका दायर कर अध्यादेश रद्द करने की गुहार की गई है।
जानकारी के अनुसार, अधिवक्ता भगवत गौड़ की ओर से आज याचिका दायर कर अदालत से मामले में जल्दी सुनवाई की गुहार की गई। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया सीआरपीसी और आईपीसी में संशोधन के लिए विधानसभा में बिल पेश हो चुका है। ऐसे में याचिका पर जल्दी सुनवाई की जाए। इस पर न्यायाधीश अजय रस्तोगी और न्यायाधीश दीपक माहेश्वरी की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलील को खारिज करते हुए याचिका को नियमित सुनवाई की प्रक्रिया के तहत ही सूचीबद्ध करने को कहा है। ऐसे में अदालत अब 27 अक्टूबर को याचिका पर सुनवाई करेगी।
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दरअसल, दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश, 2017 को चुनौती देते हुए आज राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता श्रंजना श्रेष्ठ व अधिवक्ता पीसी भंडारी ने अध्यादेश को जनहित याचिका के जरिए चुनौती दी है। वहीं अधिवक्ता भगवत गौड़ की ओर से याचिका दायर कर अध्यादेश रद्द करने की गुहार की गई है।
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जानकारी के अनुसार, अधिवक्ता भगवत गौड़ की ओर से आज याचिका दायर कर अदालत से मामले में जल्दी सुनवाई की गुहार की गई। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया सीआरपीसी और आईपीसी में संशोधन के लिए विधानसभा में बिल पेश हो चुका है। ऐसे में याचिका पर जल्दी सुनवाई की जाए। इस पर न्यायाधीश अजय रस्तोगी और न्यायाधीश दीपक माहेश्वरी की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलील को खारिज करते हुए याचिका को नियमित सुनवाई की प्रक्रिया के तहत ही सूचीबद्ध करने को कहा है। ऐसे में अदालत अब 27 अक्टूबर को याचिका पर सुनवाई करेगी।
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एफआईआर दर्ज करवाना नहीं होगा आसान, कांग्रेस बोली - काना कानून
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने हाल ही में एक अध्यादेश जारी कर दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करने और आईपीसी में धारा 228बी जोड़ने का प्रावधान किया है। इसके चलते लोक सेवक के खिलाफ केस दर्ज कराने से पहले सरकार से अभियोजन स्वीकृति लेने की बाध्यता रखी गई है। स्वीकृति देने की समय सीमा 180 दिन तय है। इसके अलावा अभी तक राजपत्रित अधिकारी को ही लोक सेवक माना जाता था, लेकिन अध्यादेश में सरकार ने लोक सेवक का दायरा भी बढ़ा दिया है।
अभियोजन स्वीकृति से पहले संबंधित लोक सेवक का नाम सार्वजनिक करने पर दो साल की सजा का प्रावधान भी अध्यादेश में किया गया है।
ऐसे में अध्यादेश यदि कानून बन जाता है तो राजस्थान में सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ मामला दर्ज करवाना आसान नहीं होगा। इनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होगी। उधर, कांग्रेस ने इस अध्यादेश को 'काला कानून' कहते हुए विरोध दर्ज कराया है।
अभियोजन स्वीकृति से पहले संबंधित लोक सेवक का नाम सार्वजनिक करने पर दो साल की सजा का प्रावधान भी अध्यादेश में किया गया है।
ऐसे में अध्यादेश यदि कानून बन जाता है तो राजस्थान में सांसद-विधायक, जज और अफसर के खिलाफ मामला दर्ज करवाना आसान नहीं होगा। इनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाने से पहले सरकार से इजाजत लेनी होगी। उधर, कांग्रेस ने इस अध्यादेश को 'काला कानून' कहते हुए विरोध दर्ज कराया है।