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वनस्थली विद्यापीठ का भूमि आवंटन रद्द करने का फैसला सही, कोर्ट ने माना
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Wed, 02 Aug 2017 08:28 PM IST
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राजस्थान हाईकोर्ट ने वनस्थली विद्यापीठ को सिंधी कैंप बस स्टैंड के पास आवंटित भूमि के आवंटन को निरस्त करने के आदेश को सही मानते हुए इस संबंध में दायर याचिका को खारिज कर दिया है।
न्यायाधीश मनीष भंडारी की एकलपीठ ने यह आदेश वनस्थली विद्यापीठ की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि भले ही सरकार ने शर्तों की पालना नहीं की हो, लेकिन संस्था को आवंटित भूमि का अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। याचिकाकर्ता को 1994 में मांग पत्र जारी किया गया था, लेकिन उसने राशि जमा नहीं कराई। मामले के अनुसार 9 जनवरी 1951 को सिंधी कैंप के पास याचिकाकर्ता को 8888 वर्गगज भूमि दी गई थी। वहीं कई विवादों के बाद 29 मई 2014 को जेडीए ने याचिकाकर्ता को नोटिस दिया कि क्यों न भूमि का आवंटन रद्द कर दिया जाए। इसके बाद जेडीए ने 6 जून 2014 को भूमि का आवंटन रद्द कर दिया और भूमि की नीलामी निकाल दी।
जेडीए न्यायाधीकरण में प्रकरण जाने पर न्यायाधीकरण ने प्रकरण में यथास्थिति के आदेश देते हुए मामले को वापस जेडीए को भेज दिया। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जिसे सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ने जेडीए न्यायाधीकरण को भेज दिया। जहां गत 12 मई को अधिकरण ने अपील निरस्त कर दी। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता फिर से हाईकोर्ट पहुंचे।
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याचिका में कहा गया कि जेडीए की ओर से रूपान्तरण शुल्क तय नहीं करने के कारण वे शुल्क जमा नहीं करा सके। याचिकाकर्ता ने भूमि का संस्थागत उपयोग की अनुमति मांगी थी, लेकिन जेडीए ने आवंटन ही रद्द कर दिया। जिसके जवाब में जेडीए की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता को हॉस्टल के लिए भूमि दी गई थी, लेकिन वे इसका व्यावसायिक उपयोग कर रहे थे। याचिकाकर्ता को भूमि पर दो साल में निर्माण करना था, लेकिन बीस साल में भी निर्माण नहीं किया गया। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने आवंटन रद्द करने को सही मानते हुए याचिका खारिज कर दी।
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न्यायाधीश मनीष भंडारी की एकलपीठ ने यह आदेश वनस्थली विद्यापीठ की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि भले ही सरकार ने शर्तों की पालना नहीं की हो, लेकिन संस्था को आवंटित भूमि का अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। याचिकाकर्ता को 1994 में मांग पत्र जारी किया गया था, लेकिन उसने राशि जमा नहीं कराई। मामले के अनुसार 9 जनवरी 1951 को सिंधी कैंप के पास याचिकाकर्ता को 8888 वर्गगज भूमि दी गई थी। वहीं कई विवादों के बाद 29 मई 2014 को जेडीए ने याचिकाकर्ता को नोटिस दिया कि क्यों न भूमि का आवंटन रद्द कर दिया जाए। इसके बाद जेडीए ने 6 जून 2014 को भूमि का आवंटन रद्द कर दिया और भूमि की नीलामी निकाल दी।
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जेडीए न्यायाधीकरण में प्रकरण जाने पर न्यायाधीकरण ने प्रकरण में यथास्थिति के आदेश देते हुए मामले को वापस जेडीए को भेज दिया। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जिसे सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ने जेडीए न्यायाधीकरण को भेज दिया। जहां गत 12 मई को अधिकरण ने अपील निरस्त कर दी। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता फिर से हाईकोर्ट पहुंचे।
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याचिका में कहा गया कि जेडीए की ओर से रूपान्तरण शुल्क तय नहीं करने के कारण वे शुल्क जमा नहीं करा सके। याचिकाकर्ता ने भूमि का संस्थागत उपयोग की अनुमति मांगी थी, लेकिन जेडीए ने आवंटन ही रद्द कर दिया। जिसके जवाब में जेडीए की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता को हॉस्टल के लिए भूमि दी गई थी, लेकिन वे इसका व्यावसायिक उपयोग कर रहे थे। याचिकाकर्ता को भूमि पर दो साल में निर्माण करना था, लेकिन बीस साल में भी निर्माण नहीं किया गया। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने आवंटन रद्द करने को सही मानते हुए याचिका खारिज कर दी।