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भाई-बहन के प्यार पर कभी ना हटने वाला सीमाओं का पहरा
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Mon, 07 Aug 2017 01:04 PM IST
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अपने भाई की तस्वीर पर राखी बांधती एक बहन
- फोटो : amar ujala
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ऐसा केवल भारत में ही संभव है कि एक महीन रेशम के धागे से दिन की अनंत गहराईयों में छिपे प्यार को बयां किया जा सके। भाई और बहन के अनमोल रिश्ते को समर्पित यह त्यौहार मन में उमंग की सुरीली घंटियां बजा देता है। और यही कारण है कि कलाई पर बंधने वाली राखी का सौन्दर्य रिश्ते की सादगी पर जीत जाती है। लेकिन कई बदनसीब भाई और बहन ऐसे भी हैं जो इस दिन भीगी आँखों से अपनों का इंतज़ार करते हैं मगर सरहदों के पहरे में इन भाई बहनों की भावनाएं दब कर रह जाती है।
ऐसा ही कुछ नजारा जैसलमेर जिले के पाक विस्थापित भील समुदाय के कई परिवारों में देखने को मिल रहा है जहां पर कई भाई ऐसे हैं जिनकी बहनें पाकिस्तान ब्याही हुई हैं और राखी पर भारत आ नहीं सकती और कई बहनें ऐसी है जिनके भाई पाकिस्तान में बसर कर रहे हैं और बहनें इस पावन त्यौहार पर भाई का फोटो देख कर ही काम चला रही है।
रक्षाबंधन के इस सौंदर्य से परिपूर्ण त्यौहार का यह पहलू जैसलमेर की पाक विस्थापित भील बस्ती में किसी दर्द से कम नहीं हैं और जब इस दर्द को हमने जाना तो इन परिवारों के बीच का नजारा वास्तव में पीड़ा से भरा था जहां एक बहन ने पिछले छः सालों से अपने भाई को नहीं देखा है क्योंकि वह पाकिस्तान में निवास कर रहे हैं।
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ऐसा ही कुछ नजारा जैसलमेर जिले के पाक विस्थापित भील समुदाय के कई परिवारों में देखने को मिल रहा है जहां पर कई भाई ऐसे हैं जिनकी बहनें पाकिस्तान ब्याही हुई हैं और राखी पर भारत आ नहीं सकती और कई बहनें ऐसी है जिनके भाई पाकिस्तान में बसर कर रहे हैं और बहनें इस पावन त्यौहार पर भाई का फोटो देख कर ही काम चला रही है।
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रक्षाबंधन के इस सौंदर्य से परिपूर्ण त्यौहार का यह पहलू जैसलमेर की पाक विस्थापित भील बस्ती में किसी दर्द से कम नहीं हैं और जब इस दर्द को हमने जाना तो इन परिवारों के बीच का नजारा वास्तव में पीड़ा से भरा था जहां एक बहन ने पिछले छः सालों से अपने भाई को नहीं देखा है क्योंकि वह पाकिस्तान में निवास कर रहे हैं।
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आंसूओं के जरिए बह भी जातें हैं जज्बात
भाई की तस्वीर के सामने सजा राखी का थाल
- फोटो : amar ujala
रक्षा बंधन पर राखियों को देखकर अपना मन मसोस कर रह जाने वाली महिलाएं आज के दिन रो पड़ती हैं। ये बताती है की वह 6 भाईयों की बहन है और शादी से पहले हर रक्षाबंधन पर वह अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधती थी और इस त्यौहार की खुशियां मनाती थी लेकिन शादी के बाद भारत आकर बसी इस बहिन के प्यार पर देश की सीमाओं का पहरा होने के चलते न तो यह पाकिस्तान जा पाई है और न ही इसके भाई भारत आ पाये हैं ऐसे में रक्षा बंधन पर औरों की कलाई पर राखी देख कर इस बहिन के पास आंसु बहाने के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहता है।
भाईयों ने भी बयां की अपनी पीड़ा
अपनी बहनों की तस्वीरें देखकर यादों में डूबा एक भाई
- फोटो : amar ujala
जैसलमेर में बसे भील परिवारों में ये केवल एक उदाहरण नहीं है जो अपने भाईयों के लिये आंसू बहा रही है। इसी बस्ती के भीख चंद भील की कहानी भी ऐसी ही है। पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर यहाँ आकर बसने के तीन साल गुज़र जाने के बाद आज भी वो पकिस्तान में अपनी बहनों के साथ बिताए पलों को भुला नहीं पा रहे हैं।
सरहदों के पहरे में उनकी बहनें आज भी अपने इस भाई का इंतज़ार कर रही है। भीख चंद कहते हैं की वो हैदराबाद सिंध में रहते थे तथा वहां वे इस दिन कहीं भी होते तुरंत अपनी बहनों के पास पहुंच जाते। उनके कुनबे में उनके रिश्तेदारों से मिलकर उनकी इतनी बहनें हैं की उस दिन उनकी कलाई राखियों से भर जाती थी।
वो मंजर आज भी उनके दिन में ताज़ा है और वे भीगी आँखों से उनको याद कर रहे हैं। अपनी बहनों के फोटो के साथ उन दिनों को याद करते रोते हैं। रंग बिरंगी राखियों से सजी कलाईयां देख कर बचपन की यादों के सहारे इस त्यौहार को मनाने को मजबूर ये परिवार ही असल में पीड़ा भोग रहे हैं।
सीमाओं पर खींची दरारों की और उम्मीद भर नजर से देख रहे हैं कि कोई तो दिन ऐसा अवश्य ही आयेगा जब ये दरारें भरेंगी और प्यार के रंग इन सीमाओं पर भारी पड़ेंगे और भाई बहनों से व बहिनें भाईयों बेखौफ मिल सकेंगी और त्यौहारों के रंग इनकी दुनियां में भी खुशियां बिखेरने वाले हो सकेंगे।
त्यौहार रिश्तों की खूबसूरती को बनाए रखने का एक बहाना होते हैं। यूं तो हर रिश्ते की अपनी एक महकती पहचान होती है लेकिन भाई बहन का रिश्ता एक भावुक अहसास होता है जिस पर रक्षाबंधन के त्यौहार के छींटे पड़ते ही एक ऐसी सौंधी सुगंधित बयार लाता है जो मन के साथ साथ पोर पोर को महका देती है लेकिन भील बस्ती के इन परिवारों की पीडा देख कर ये शब्द बेकार से लगते हैं जहां भाई बहन के प्यास पर सीमाओं का पहरा लगा है और मजबूर है ये भाई और बहन राखी पर राखी बांधने व बंधवाने के लिए अपने पाकिस्तान में निवास कर रहे भाई बहनों से मिल नहीं पा रहे लोग हुकुमरानों को कोसते हैं।
सरहदों के पहरे में उनकी बहनें आज भी अपने इस भाई का इंतज़ार कर रही है। भीख चंद कहते हैं की वो हैदराबाद सिंध में रहते थे तथा वहां वे इस दिन कहीं भी होते तुरंत अपनी बहनों के पास पहुंच जाते। उनके कुनबे में उनके रिश्तेदारों से मिलकर उनकी इतनी बहनें हैं की उस दिन उनकी कलाई राखियों से भर जाती थी।
वो मंजर आज भी उनके दिन में ताज़ा है और वे भीगी आँखों से उनको याद कर रहे हैं। अपनी बहनों के फोटो के साथ उन दिनों को याद करते रोते हैं। रंग बिरंगी राखियों से सजी कलाईयां देख कर बचपन की यादों के सहारे इस त्यौहार को मनाने को मजबूर ये परिवार ही असल में पीड़ा भोग रहे हैं।
सीमाओं पर खींची दरारों की और उम्मीद भर नजर से देख रहे हैं कि कोई तो दिन ऐसा अवश्य ही आयेगा जब ये दरारें भरेंगी और प्यार के रंग इन सीमाओं पर भारी पड़ेंगे और भाई बहनों से व बहिनें भाईयों बेखौफ मिल सकेंगी और त्यौहारों के रंग इनकी दुनियां में भी खुशियां बिखेरने वाले हो सकेंगे।
त्यौहार रिश्तों की खूबसूरती को बनाए रखने का एक बहाना होते हैं। यूं तो हर रिश्ते की अपनी एक महकती पहचान होती है लेकिन भाई बहन का रिश्ता एक भावुक अहसास होता है जिस पर रक्षाबंधन के त्यौहार के छींटे पड़ते ही एक ऐसी सौंधी सुगंधित बयार लाता है जो मन के साथ साथ पोर पोर को महका देती है लेकिन भील बस्ती के इन परिवारों की पीडा देख कर ये शब्द बेकार से लगते हैं जहां भाई बहन के प्यास पर सीमाओं का पहरा लगा है और मजबूर है ये भाई और बहन राखी पर राखी बांधने व बंधवाने के लिए अपने पाकिस्तान में निवास कर रहे भाई बहनों से मिल नहीं पा रहे लोग हुकुमरानों को कोसते हैं।