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सब बंधन टूट जाते हैं, जब कान्हा के जन्म पर मुस्लिम शहनाई बजाते हैं..
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sat, 12 Aug 2017 09:34 AM IST
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धर्म के बंधन की दीवार उस वक्त टूट जाती है, जब कान्हा के जन्म पर एक मुस्लिम की शहनाई अपने सुर छेड़ती है। ऐसा कुछ सालों से नहीं बल्कि चार पीढ़ियों से लगातार हो रहा है। एक मुस्लिम परिवार के सदस्य गोविंददेव मंदिर में कृष्णजन्मोत्सव का आगाज अपने शहनाई वादन से करते हैं।
यह अनोखा मामला राजस्थान की राजधानी जयपुर के गोविंददेव मंदिर से जुड़ा है। मंदिर में पिछले कई सालों से रफीक मोहम्मद की शहनाई कान्हा के जन्म उत्सव की शुरुआत पर सुर बिखेरती है। रफीक बताते हैं कि गोविंददेव मंदिर में कृष्णजन्माष्टमी के पर्व की शुरुआत में सबसे पहले शहनाई वादन होता है। इस शहनाई वादन के लिए केवल चार पीढ़ियों से हमारे परिवार को ही बुलाया जाता है।
रफीर का परिवार भी इस मौके पर अपने पूरे समर्पण भाव से प्रस्तुति देते हैं। रफीन खुद पचास साल से मंदिर में आ रहे हैं। इससे पहले उनके पिता और नाना भी इस परम्परा को जारी रखते आए हैं। अब यही काम उनकी अगली पीढ़ि भी कर रही है।
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यह अनोखा मामला राजस्थान की राजधानी जयपुर के गोविंददेव मंदिर से जुड़ा है। मंदिर में पिछले कई सालों से रफीक मोहम्मद की शहनाई कान्हा के जन्म उत्सव की शुरुआत पर सुर बिखेरती है। रफीक बताते हैं कि गोविंददेव मंदिर में कृष्णजन्माष्टमी के पर्व की शुरुआत में सबसे पहले शहनाई वादन होता है। इस शहनाई वादन के लिए केवल चार पीढ़ियों से हमारे परिवार को ही बुलाया जाता है।
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रफीर का परिवार भी इस मौके पर अपने पूरे समर्पण भाव से प्रस्तुति देते हैं। रफीन खुद पचास साल से मंदिर में आ रहे हैं। इससे पहले उनके पिता और नाना भी इस परम्परा को जारी रखते आए हैं। अब यही काम उनकी अगली पीढ़ि भी कर रही है।
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मंदिर में खुश होते हैं भक्त
गोविंददेव मंदिर
- फोटो : फाइल फोटो
वे बताते हैं गोविंद देव मंदिर में शहनाई वादन करने के लिए वे किसी तरह के पैसे नहीं लेते। बिना किसी लोभ के वे शहनाई वादन करते हैं। उत्सव से पंद्रह दिन पहले से शहनाई वादन का ये सिलसिला शुरू होता है।
रफीक के बेटे शफीक, शाहिद, अतीक भी अपने पिता के साथ शहनाई वादन करने पहुंचते हैं। मंदिर के दरवाजों पर उनकी प्रस्तुति मंदिर में आने वाले भक्तों को मधुर अहसास कराती है।
रफीक के बेटे शफीक, शाहिद, अतीक भी अपने पिता के साथ शहनाई वादन करने पहुंचते हैं। मंदिर के दरवाजों पर उनकी प्रस्तुति मंदिर में आने वाले भक्तों को मधुर अहसास कराती है।