{"_id":"59ff0ef64f1c1b6a678b99b2","slug":"mohan-bhagwat-s-big-statement-should-end-the-caste-system-in-india","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"मोहन भागवत ने किया आरक्षण का समर्थन, कहा-विषमता दूर होने तक मिलना चाहिए लाभ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मोहन भागवत ने किया आरक्षण का समर्थन, कहा-विषमता दूर होने तक मिलना चाहिए लाभ
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sun, 05 Nov 2017 08:19 PM IST
विज्ञापन
डॉ. मोहन भागवत जयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ
- फोटो : Amar Ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आरएसएस के सर संघचालक डॉ.मोहनराव भागवत ने जातिगत आरक्षण का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि जब तक देश में जातिगत विषमताएं दूर नहीं हो जातीं, तब तक संवैधानिक लाभ जातियों को मिलना चाहिए।
डॉ. मोहन भागवत आज राजस्थान की राजधानी जयपुर के चित्रकूट स्टेडियम में आयोजित स्वर गोविंदम कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में आरएसएस के सर संचालक डॉ.मोहनराव भागवत, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी समेत भाजपा और आरएसएस के पदाधिकारी मौजूद थे।
उन्होंने कहा कि जातिप्रथा देश का दुर्भाग्य है और यह समूलनष्ट होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सबके सामूहिक हित को ध्यान में रखते हुए समाज में समरसता का संस्कार जरूरी है।
विज्ञापन
इसके साथ ही उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों का समर्थन भी किया। उन्होंने कहा कि जाति भेद के चलते एक बड़ा वर्ग पिछड़ गया। इस विषमता को दूर करने के लिए जाति प्रथा समाप्त होनी चाहिए, लेकिन साथ ही संवैधान में जो प्रावधान किए हैं उनका लाभ ये विषमता दूर होने तक मिलता रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह देश हिंदू राष्ट्र है, लेकिन हिंदू किसी भाषा, समाज या जाति विशेष को लेकर नहीं बना है। इसमें समरसता का भाव है। सबको साथ लेकर चलने और सबको साथ लेकर जीने का संदेश है। इसी लिए तो 'वासुधैव कुटुम्बकम' अखंड भारत की पहचान है। हमारी इस पहचान को किसी ने अस्वीकार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि समरसता ही मानवता का रूप है।
विज्ञापन
डॉ. मोहन भागवत आज राजस्थान की राजधानी जयपुर के चित्रकूट स्टेडियम में आयोजित स्वर गोविंदम कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में आरएसएस के सर संचालक डॉ.मोहनराव भागवत, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी समेत भाजपा और आरएसएस के पदाधिकारी मौजूद थे।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि जातिप्रथा देश का दुर्भाग्य है और यह समूलनष्ट होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सबके सामूहिक हित को ध्यान में रखते हुए समाज में समरसता का संस्कार जरूरी है।
विज्ञापन
इसके साथ ही उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों का समर्थन भी किया। उन्होंने कहा कि जाति भेद के चलते एक बड़ा वर्ग पिछड़ गया। इस विषमता को दूर करने के लिए जाति प्रथा समाप्त होनी चाहिए, लेकिन साथ ही संवैधान में जो प्रावधान किए हैं उनका लाभ ये विषमता दूर होने तक मिलता रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह देश हिंदू राष्ट्र है, लेकिन हिंदू किसी भाषा, समाज या जाति विशेष को लेकर नहीं बना है। इसमें समरसता का भाव है। सबको साथ लेकर चलने और सबको साथ लेकर जीने का संदेश है। इसी लिए तो 'वासुधैव कुटुम्बकम' अखंड भारत की पहचान है। हमारी इस पहचान को किसी ने अस्वीकार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि समरसता ही मानवता का रूप है।
भागवत ने बताया संगीत और सुर से समरसता कैसे आती है...
मोहन भागवत
- फोटो : SELF
स्वर गोविंदम कार्यक्रम में डॉ. भागवत ने संगीत और सुरों के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि भारत का संगीत मनुष्य को करुणा और पवित्रता की तरफ ले जाता है।
ध्रुपद का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इसका प्रचलन कम हो गया है क्योंकि इसमें मेहनत होती है। जब तक गाने वाले को अनुभूति नहीं होती तब तक उसमें आनंद नहीं आता। ये केवल संगीत सुनने वालों की भीड़ जुटाने वाला साध्य नहीं है।
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस ने अपनी कार्य पद्धति में संगीत के महत्व को देखते हुए स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि संगीत संस्कार है। जब किसी गीत को सब मिलकर गाते है तो उसके संस्कार का असर सब पर होता है और इससे सब को साथ लेकर चलने की भावना पैदा होती है। यही समरसता है। संगीत समरसता का संसार है। सुर-ताल दोनों साथ चलते हैं। सब मिलकर गाते हैं और जुगलबंदी होती है।
ध्रुपद का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इसका प्रचलन कम हो गया है क्योंकि इसमें मेहनत होती है। जब तक गाने वाले को अनुभूति नहीं होती तब तक उसमें आनंद नहीं आता। ये केवल संगीत सुनने वालों की भीड़ जुटाने वाला साध्य नहीं है।
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस ने अपनी कार्य पद्धति में संगीत के महत्व को देखते हुए स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि संगीत संस्कार है। जब किसी गीत को सब मिलकर गाते है तो उसके संस्कार का असर सब पर होता है और इससे सब को साथ लेकर चलने की भावना पैदा होती है। यही समरसता है। संगीत समरसता का संसार है। सुर-ताल दोनों साथ चलते हैं। सब मिलकर गाते हैं और जुगलबंदी होती है।
चमड़ी घिसते है और फिर राष्ट्रहित के लिए गाते हैं
मोहन भागवत
संघ में जिन गीतों का प्रचलन है उसमें पहली बात सबको साथ जोड़ने की होती है। रंग-रूप आकार से विविधिता से भरी इस दुनिया में विविधिता का आंनद लेते हुए एकता को देखा जाता है। संघ में गाने और वादन करने वालों को कोई मुआवजा नहीं मिलता और ना हीं वे पेशवर गायक-वादक हैं।
वे पहले चमड़ी घिसते हैं और वादन सीखते हैं। यह सोचकर कि मुझे राष्ट्र के योग्य बनना है, अपनी जेब से खर्च करते और मेहनत करते हैं। फिर संघ की योजनानुसार उसे प्रकट करते हैं। हमारे घोषवादन का कार्य हो, इसलिए जनता में नहीं जाते। घोषवदन कब होगा और कहां होगा, यह संघ तय करता है।
वे पहले चमड़ी घिसते हैं और वादन सीखते हैं। यह सोचकर कि मुझे राष्ट्र के योग्य बनना है, अपनी जेब से खर्च करते और मेहनत करते हैं। फिर संघ की योजनानुसार उसे प्रकट करते हैं। हमारे घोषवादन का कार्य हो, इसलिए जनता में नहीं जाते। घोषवदन कब होगा और कहां होगा, यह संघ तय करता है।
महफिल में गा सकते हैं, लेकिन...
मोहन भागवत
- फोटो : SELF
डॉ. भागवत ने कहा कि देश हमें सब कुछ देता है। हमे बिना किसी स्वार्थ देश को कुछ देना चाहिए। देश की उन्नति का ठेका किसी विशेष को नहीं दिया जाता है। इसका दायित्व संपूर्ण समाज और समुदाय को लेना होगा।
उन्होंने कहा कि रागरागनी अपनी संगीत परम्परा का हिस्सा है, परंतु इसमें अब एक कमी उत्पन्न हो गई। महफिल में गाना बजाना तो आप कर सकते हैं। मैदान में एकत्र होकर नाच भी सकते हैं, लेकिन इस संगीत में शौर्य, बल और वीरता की कमी खलती है। उन्होंने कहा कि शिवराजा रचना को आज भी सेना में बजाया जाता है।
उन्होंने कहा कि रागरागनी अपनी संगीत परम्परा का हिस्सा है, परंतु इसमें अब एक कमी उत्पन्न हो गई। महफिल में गाना बजाना तो आप कर सकते हैं। मैदान में एकत्र होकर नाच भी सकते हैं, लेकिन इस संगीत में शौर्य, बल और वीरता की कमी खलती है। उन्होंने कहा कि शिवराजा रचना को आज भी सेना में बजाया जाता है।