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हर उर्स से पहले 130 किमी. दूर से झंडा लेकर अजमेर आता है ये परिवार
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Thu, 23 Mar 2017 05:28 PM IST
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अकबरी मस्जिद के पास हुजरे में बैठे गौरी परिवार के लोग
- फोटो : amar ujala
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अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में 1944 से हर वर्ष गौरी परिवार उर्स का झंडा लेकर आता रहा है और इस झंडे की रस्म के बाद चांद दिखने पर उर्स शुरू हो जाता है। यह परिवार 130 किलोमीटर दूर भीलवाड़ा का रहने वाला है।
देश में अमन—चैन की दुआ लेकर भीलवाड़ा के गुलमंडी का रहने वाला गौरी परिवार 805वें उर्स के लिए झंडा लेकर बृहस्पतिवार को अजमेर पहुंचा। अब शुक्रवार को दरगाह में असर की नमाज के बाद निशान मुबारक की रस्म अदा की जाएगी। इससे पहले बाकायदा जुलूस निकाला जाएगा, जो दरगाह गेस्ट हाउस से शुरू होकर लंगरखाना गली होते हुए दरगाह के बुलंद दरवाजा पहुंचेगा। यहां निशान मुबारक की रस्म के साथ उर्स की औपचारिक शुरुआत होगी।
बताया जाता है कि उर्स के मौके पर झंडा चढ़ाने की परम्परा का निर्वाह गौरी परिवार वर्ष 1944 से निभाता आ रहा है। उर्स का झंडा लेकर आए फखरुद्दीन गौरी ने बताया कि पुराने जमाने में इमारतें ज्यादा ऊंची नहीं होने के कारण उर्स शुरू होने की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए 1928 से दरगाह में उर्स का झंडा लगाने की शुरुआत हुई।
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पीर सैयद अब्दुल सत्तार बादशाह जान ने उनके दादा लाल मोहम्मद को 1944 में यहां झंडा चढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद 1991 तक उनके दादा ने यह परम्परा निभाई और उनके बाद 2006 तक वालिद मोइनुद्दीन गौरी ने यहां झंडा चढ़ाया। फखरुद्दीन ने बताया कि उनके वालिद के बाद अब वे यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
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देश में अमन—चैन की दुआ लेकर भीलवाड़ा के गुलमंडी का रहने वाला गौरी परिवार 805वें उर्स के लिए झंडा लेकर बृहस्पतिवार को अजमेर पहुंचा। अब शुक्रवार को दरगाह में असर की नमाज के बाद निशान मुबारक की रस्म अदा की जाएगी। इससे पहले बाकायदा जुलूस निकाला जाएगा, जो दरगाह गेस्ट हाउस से शुरू होकर लंगरखाना गली होते हुए दरगाह के बुलंद दरवाजा पहुंचेगा। यहां निशान मुबारक की रस्म के साथ उर्स की औपचारिक शुरुआत होगी।
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बताया जाता है कि उर्स के मौके पर झंडा चढ़ाने की परम्परा का निर्वाह गौरी परिवार वर्ष 1944 से निभाता आ रहा है। उर्स का झंडा लेकर आए फखरुद्दीन गौरी ने बताया कि पुराने जमाने में इमारतें ज्यादा ऊंची नहीं होने के कारण उर्स शुरू होने की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए 1928 से दरगाह में उर्स का झंडा लगाने की शुरुआत हुई।
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पीर सैयद अब्दुल सत्तार बादशाह जान ने उनके दादा लाल मोहम्मद को 1944 में यहां झंडा चढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद 1991 तक उनके दादा ने यह परम्परा निभाई और उनके बाद 2006 तक वालिद मोइनुद्दीन गौरी ने यहां झंडा चढ़ाया। फखरुद्दीन ने बताया कि उनके वालिद के बाद अब वे यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं।