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मौत के बाद मिला न्याय, दोषी IAS अफसरों से वसूली होगी वसूली
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Tue, 29 Aug 2017 07:51 PM IST
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राजस्थान हाईकोर्ट ने 21 साल पहले गबन का आरोप लगाकर निलंबित किए गए कर्मचारी के निलंबन आदेश को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने मृत कर्मचारी के परिजनों को वेतन और पदोन्नति सहित समस्त परिलाभ चार माह में अदा करने के आदेश दिए हैं।
अदालत ने निलंबन करने वाले अधिकारी तत्कालीन आईएएस दामोदर शर्मा और अपीलीय अधिकारी उमराव सालोदिया को इसके लिए दोषी मानते हुए उनकी पेंशन या पीडीआर एक्ट के तहत वसूली के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश एसपी शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश शशिमोहन माथुर के परिजनों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में अधिवक्ता रामरख शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता 1991 में हैडलूम कार्पोरेशन में जूनियर ट्रेनी के पद पर नियुक्त हुआ था। विभाग ने 1996 में उस पर गबन का आरोप लगाते हुए निलंबित कर दिया।
इस आदेश के खिलाफ दायर विभागीय अपील को भी अपीलीय अधिकारी उमराव सालोदिया ने वर्ष 2000 में खारिज कर दिया। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गुहार की गई। वहीं याचिका के लंबित रहने के दौरान वर्ष 2008 में याचिकाकर्ता की मौत हो गई। इस पर उसके विधिक उत्तराधिकारियों ने याचिका को जारी रखा। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने निलंबन आदेश को गलत मानते हुए समस्त परिलाभ अदा करने के आदेश देते हुए इस राशि को दोनों अधिकारियों से वसूलने के आदेश दिए हैं।
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अदालत ने निलंबन करने वाले अधिकारी तत्कालीन आईएएस दामोदर शर्मा और अपीलीय अधिकारी उमराव सालोदिया को इसके लिए दोषी मानते हुए उनकी पेंशन या पीडीआर एक्ट के तहत वसूली के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश एसपी शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश शशिमोहन माथुर के परिजनों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में अधिवक्ता रामरख शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता 1991 में हैडलूम कार्पोरेशन में जूनियर ट्रेनी के पद पर नियुक्त हुआ था। विभाग ने 1996 में उस पर गबन का आरोप लगाते हुए निलंबित कर दिया।
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इस आदेश के खिलाफ दायर विभागीय अपील को भी अपीलीय अधिकारी उमराव सालोदिया ने वर्ष 2000 में खारिज कर दिया। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गुहार की गई। वहीं याचिका के लंबित रहने के दौरान वर्ष 2008 में याचिकाकर्ता की मौत हो गई। इस पर उसके विधिक उत्तराधिकारियों ने याचिका को जारी रखा। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने निलंबन आदेश को गलत मानते हुए समस्त परिलाभ अदा करने के आदेश देते हुए इस राशि को दोनों अधिकारियों से वसूलने के आदेश दिए हैं।
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